शनि और चंद्र की युति को ज्योतिष में 'विष योग' कहा जाता है, जो मन पर शनि के अनुशासन और उदासी का प्रभाव डालता है, जिससे मानसिक तनाव, निराशा और अकेलापन महसूस हो सकता है, लेकिन यह योग समय के साथ व्यक्ति को परिपक्वता और आध्यात्मिकता की ओर भी ले जा सकता है, खासकर अगर यह योग कुंडली के विशिष्ट भावों में हो या इसके कुछ शर्तें पूरी न हों, जिससे यह शुभ फल भी दे सकता है.
विष योग के प्रभाव (नकारात्मक)
मानसिक प्रभाव: तनाव, चिंता, अवसाद, अकेलापन और निराशा.
भावनात्मक प्रभाव: प्रेम और स्नेह की अभिव्यक्ति में कमी, बार-बार विश्वासघात का सामना.
जीवन में बाधाएँ: करियर में रुकावटें, पारिवारिक कलह, आर्थिक अस्थिरता, और काम में असफलता.
शारीरिक कष्ट: कमर और पैरों में दर्द.
आध्यात्मिक झुकाव: तंत्र-मंत्र, गलत साधनाओं की ओर झुकाव (यदि युति प्रबल हो).
विष योग के सकारात्मक पहलू (शुभ)
आध्यात्मिकता: व्यक्ति को आध्यात्मिक मार्ग पर ले जा सकता है, मन पर अनुशासन लाता है.
परिपक्वता: जीवन की वास्तविकताओं को समझने और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाने में मदद करता है.
सफलता: कुछ स्थितियों में धन, सम्मान, ज्ञान और प्रशासनिक क्षेत्रों में सफलता भी दे सकता है (यदि अन्य योग हों).
कब बनता है विष योग?
जब शनि और चंद्रमा एक ही भाव में हों, या चंद्रमा पर शनि की तीसरी, सातवीं, या दसवीं दृष्टि हो.
कभी-कभी गोचर में जब चंद्रमा शनि या राहु की राशि में आता है, तब भी इसका प्रभाव दिखता है.
उपाय
भगवान शिव की पूजा और उन्हें जल अर्पित करना.
मां या मां समान स्त्री का सम्मान और सेवा करना.
नियमित रूप से सूर्य को जल देना.
शनि देव के मंत्रों का जाप करना.
संक्षेप में, शनि-चंद्र युति मन और कर्म का संयोजन है, जो ज्यादातर निराशा और चुनौतियां देता है, लेकिन सही मार्गदर्शन और उपायों से इसे सकारात्मक बनाया जा सकता है।
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