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सिर्फ ज्ञान बांटने के लिए नहीं बल्कि खुद में बदलाव के लिए भी लिखें...!


नवीन रचनाएं लिखना यह आपको सृजनात्मक एवं कलात्मक बनाता है परंतु वैचारिक रूप से लिखने पर हमें जीवन स्पष्टता से समझ में आने लगता है कई चीजों को हम मूलतः मना नहीं कर पाते ,या सीधे न कहना। परंतु उसका प्रभाव कभी ना कभी हम पर ही पड़ता है जिस कार्य को हम अच्छी तरह कर नहीं सकते, वह हमें वास्तविक रूप से किसी को दिखाने के लिए नहीं करना चाहिए। कहने का अर्थ है हमें किसी और के लिए नहीं अपितु हमें स्वयं के दृष्टिकोण को सटीक रखते हुए, खुद में ही सुधार लाना चाहिए।
कई लोग सामाजिक भेदभाव के ऊपर लिखते हैं परंतु सत्य में क्या वह यह भेदभाव खुद भी करते हैं, तो पहले हमें यह भेदभाव स्वयं से ही मिटाना चाहिए। तब हम सामाजिक रूप से कह सकेंगे कि हम भेदभाव नहीं करते, परंतु आज कुछ सामाजिक विषय ऐसे हैं जहां सामाजिक समरसता की जगह, जाति परिवर्तन एवं भेदभाव रखना कट्टर रूप ले चुका है जो की मानवीय भावनाओं के लिए अत्यंत दुखद है।
एक आम व्यक्ति सबसे पहले अपनी आजीविका को चुनता है, जाति और समाज से पहले उसका कर्म ही उसे जीवन जीने के लिए जरूरी होता है। किसी भी धर्म या जाति का होने के बाद भी मनुष्य को जीवन हेतु अपनी व्यवसाय, अपने कर्म पर निर्भर होना पड़ता है। रोटी, कपड़ा, और मकान इंसान की प्रथम जरूरत है। जब हम धर्म का चयन करते हैं तब सनातन धर्म के अनुसार भी मानवता ही मनुष्य जाति के लिए सबसे बड़ा धर्म है।
आज हमें राम के पद चिन्ह पर चलने की आवश्यकता है क्योंकि वह एक आदर्श है पर यहां समाज में रहने के लिए हमें कृष्ण बनना ही होगा। यह एक सतत यात्रा है जो आपको आदर्श सिखाती है परंतु आपके जीवन में जब उतार चढ़ाव आते हैं तो कृष्ण की भांति हर परिस्थिति को संभालने की शक्ति भी देती है।

©आशी प्रतिभा ✍️ 
मध्य प्रदेश, ग्वालियर

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