एमपी धमाका, विदिशा
विद्युत मंडल स्थित श्री महाकालेश्वर मंदिर पर संचालित श्री महाकालेश्वर संस्कृत पाठशाला में प्रतिवर्ष अनुसार इस वर्ष भी आज गंगा दशहरे के पावन पर्व पर 25 ब्राह्मण बटुकों का यज्ञोपवीत संस्कार श्री महाकालेश्वर संस्कृत पाठशाला के आचार्य धर्माधिकारी पंडित विनोद शास्त्री के मार्गदर्शन में वेदोक्त रीति से संपन्न कराया गया। यज्ञोपवीत संस्कार में 8 वर्ष से लेकर 20 वर्ष के ब्राह्मण बालक सम्मिलित हुए।
सर्वप्रथम ब्राह्मण बटुकों का प्रायश्चित संकल्प, मुंडन संस्कार दश विधि स्नान कराया गया। नूतन पीत वस्त्र धारण कराए गए। इसके पश्चात भगवान गणेश, वरुण, षोडश मातृका, सप्तघृत मातृका, पुण्य योगिनी, वास्तु मंडल, क्षेत्रपाल, नवग्रह, सर्वतोभद्र मंडल आदि का विधिवत पूजन कराया गया। इसके पश्चात बटुकों को अंतर पट लगाकर मंगलाष्टक के पश्चात दंड धारण कराया गया। यज्ञ हवन कराने के पश्चात गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित यज्ञोपवीत धारण कराया गया। इसके पश्चात गायत्री मंत्र की दीक्षा दी गई। इसके बाद ब्राह्मण बटुकों ने अपने परिवार वालों से भिक्षा ली।
धर्माधिकारी पंडित विनोद शास्त्री ने बताया कि 22 वर्षों से प्रतिवर्ष श्री महाकालेश्वर संस्कृत पाठशाला के विद्यार्थियों एवं नगर के ब्राह्मण बालकों का निशुल्क यज्ञोपवीत संस्कार का आयोजन किया जाता है। अभी तक 800 से अधिक ब्राह्मण बालकों का यज्ञोपवीत संस्कार कराया जा चुका है।
यज्ञोपवीत धारण करते समय ब्राह्मण बटुकों के हाथ में एक दंड था। बगैर सिला हुआ वस्त्र था। गले में पीले रंग का दुपट्टा मुंडन के बाद शिखा रखी हुई थी। पैरों में खड़ाऊ मुंज का जनेऊ यज्ञोपवीत भी पीले रंग का विद्या अध्ययन के लिए हाथ में पुराण लिए हुए अति रमणीय दृश्य शोभा दे रहा था। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि साक्षात भगवान ब्राह्मण के रूप में आ गए हों।
जनेऊ क्यों करना चाहिए?
जनेऊ धारण करने की उम्र... जिस दिन गर्भधारण किया जाता है उसके आठवें वर्ष में बालक का उपनयन संस्कार किया जाना चाहिए। जनेऊ पहनने के बाद ही विद्या आरंभ करने का शास्त्रोक्त विधान है। यह 16 संस्कारों में से दसवां संस्कार उपनयन संस्कार होता है। वेद शास्त्रों का अध्ययन कर सकते हैं। गायत्री मंत्र का जाप कर सकते हैं। जो भी शुभ कर्म होते हैं उनका कई गुना फल प्राप्त होता है। बटुकों की बुद्धि तीव्र होती है। बटुकों का भाग्य उदय एवं उन्नति होती है।
जनेऊ क्या है
जनेऊ को संस्कृत में यज्ञोपवीत कहा जाता है। यह तीन धागों वाला सूत्र से बना है। जनेऊ में तीन सूत्र त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक हैं। देवॠण, पितृ ऋण और ऋषिॠण के प्रतीक हैं। सत्व रज और तम के प्रतीक हैं। जनेऊ के एक-एक तार में तीन-तीन तार होते हैं इनकी कुल संख्या नौ होती है।
जनेऊ की लंबाई 96 अंगुल होती है। नगर के विद्वानों में पंडित ब्रजमोहन शास्त्री, पंडित विष्णु प्रसाद शास्त्री, पंडित संतोष शास्त्री, पंडित चेतन शास्त्री, पंडित देवेंद्र शास्त्री, पंडित हर्ष शास्त्री, पंडित आशुतोष शास्त्री, पंडित अंशुल शर्मा एवं अनेक विद्वान उपस्थित थे। यज्ञोपवीत संस्कार के समय सैकड़ों की संख्या में ब्राह्मण बटुकों के माता-पिता एवं नगर के गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।