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आयुर्वेद और जीवनशैली को अपनाकर सही तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है मधुमेह: डॉ. अनिल अग्रवाल

आज के भौतिक एवं आपाधापी वाले युग में एक ओर जहां आम आदमी की दिनचर्या में अत्यधिक परिवर्तन आया है वहीं बढ़ते हुए सुख साधनों तथा प्रदुषित वातावरण के कारण स्वास्थ्य पर भी काफी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है परिणाम स्वरूप वह कई प्रकार के स्थायी रोगों की गिरफ्त में फंसता चला जा रहा है। मधुमेह तेजी से बढ़ता हुआ एक ऐसा ही रोग है जिसके इलाज पर कई मध्यम एवं गरीब परिवारों को अपनी आमदनी का एक बड़ा भाग व्यय करना पड़ रहा है इसका सीधा-सीधा प्रभाव निश्चय तौर पर उनके घरेलू बजट पर पड़ रहा है। आधुनिकता की होड़ में विविध सुख साधनों जैसे टेलीविजन, मोबाइल फोन, फोमदार बिस्तर, जंक फूड, डिब्बाबंद आहार, टॉफी, बिस्कुट, आईस्क्रीम, फ्रीज में रखे पदार्थों का सेवन, कूलर एवं एयर कंडीशनर की शीतल हवा, आवागमन हेतु मोटर वाहनों की सवारी आदि के अत्यधिक उपयोग ने एक ओर जहां कई बीमारियों को जन्म दिया है वहीं शरीर की प्राकृतिक चयापचयी क्रियाओं को भी गड़बड़ा दिया है जिसके परिणाम स्वरूप व्यक्ति जाने अनजाने कुछ ऐसी बीमारियों की गिरफ्त में आ जाता है जिसका अंदाजा स्वयं उसे भी नहीं होता है बल्कि किसी बीमारी के ईलाज के समय परीक्षणों के उपरांत उसे अपनी मुख्य बीमारी के संबंध में पता चलता है। मधुमेह या डायबिटीज ऐसी ही एक बीमारी है जिसका पता प्राय: प्रारंभ में नहीं लगता बल्कि किसी अन्य समस्या जैसे चर्मरोग, घुटने में दर्द, पेशाब की अधिकता या बार-बार मूत्र त्याग की प्रवृति, दुर्बलता, चक्कर आना, प्यास की अधिकता, अधिक पसीना आना, शिश्नेन्द्रिय के अग्रभाग में खुजली आदि में से किसी लक्षण को लेकर जब रोगी चिकित्सक के पास जाता है तब परीक्षणों के उपरांत इस व्याधि का होना पाया जाता है।
व्याधि परिचय: हमारे द्वाराग्रहित सभी भोज्य पदार्थों में प्राय: अल्पाधिक अंश में शर्करा द्रव्य या कार्बोहाइड्रेड विद्यमान होते हैं, जिनका पाचन सैलाइवा (लार) एवं शरीर में पाई जाने वाली अग्न्याशय ग्रंथि (पैंक्रियास) के स्त्राव इंसुलिन द्वारा किया जाता है जिससे उत्पन्न ऊर्जा द्वारा हम शक्ति प्राप्त कर अपने दैनिक क्रिया कलाप संपन्न करते हैं। परन्तु किन्ही कारणाों से जब अग्न्याशय ग्रंथि के स्त्राव में कमी आ जाती है अथवा इंसुलिन के प्राकृत कार्य, शर्करा दहन में किन्हीं कारणाों से व्यवधान पैदा हो जाता है तब रक्त में पायी जाने वाली शर्करा की मात्रा बढ़ जाती है, निश्चित रक्त शर्करा की मात्रा के पश्चात बढ़ी हुई शर्करा वृक्क (गुर्दे) के द्वारा मूत्र में उत्सर्जित होने लगती है जिसे मधुमेह या डायबिटीज के नाम से जाना जाता है।
वर्तमान परिपेक्ष्य में मधुमेह प्राय: दो प्रकार का देखा जाता है -
1. इंसुलिन आश्रित या टाइप-1 डायबिटीज:- इस प्रकार ग्रसित मधुमेही में इंसुलिन का निर्माण अल्प मात्रा में या बिल्कुल ही नहीं होता है जिससे उसे इंसुलिन इंजेक्शन के माध्यम से लेना होती है, यह प्राय: कम उम्र के लोगों में पायी जाती है।
2. इंसुलिन अनाश्रित या टाइप-2 डायबिटीज:- इस प्रकार से ग्रसित मधुमेही में इंसुलिन स्त्रवित तो होती है परन्तु वह अपना प्राकृत कार्य करने में समर्थ नहीं होती इसलिये उसे मुख द्वारा औषधियाँ लेनी होती हैं यह प्रकार अधिकांश लोगों में वंशानुगत रूप में देखा जाता है परन्तु कुछ लोगों में यह उत्तर कालज (एक्वायर्ड) भी होता है। नियंत्रित खानपान, प्राणायाम, आसन, व्यायाम एवं पैदल भ्रमण द्वारा इसे नियंत्रित किया जा सकता है।
उत्पत्ति के कारण: आदिकाल से आज तक भी मधुमेह उत्पत्ति के ठोस कारणों को जानना चिकित्सक वर्ग एवं अनुसंधान कर्ताओं के लिए एक प्रश्न बना हुआ है कारण कि मधुमेह उत्पत्ति का कोई एक ठोस कारण न होकर बहुविध कारण हैं जो मधुमेह को जन्म देते हैं और यही वजह है कि दीर्घकाल से सैकड़ों अनुसंधानों के बावजूद भी अनुसंधानकर्ता एक मत नहीं हो सके हैं।
मधुमेह उत्पत्ति के संबंध में जो तथ्य सामने आये हैं उनमें प्रमुख निम्न प्रकार हैं -
1. आयुर्वेद मतानुसार:- यद्यपि आयुर्वेद में मधुमेह नाम से पृथकत: किसी रोग का उल्लेख नहीं मिलता है तथापि प्रमेह रोग के अन्तर्गत ही मधुमेह को समाविष्ट किया गया है और बताया गया है कि प्रमेह (जिन्हें 20 प्रकार का माना गया है) रोग को नजर अंदाज किये जाने पर समस्त प्रकार के प्रमेह मधुमेह में बदल जाते हैं। 
इस प्रकार से मधुमेह उत्पत्ति के बहुविध कारण होने का स्पष्टीकरण मिलता है। आयुर्वेद में आहार-बिहार की विषमता को ही मुख्य रूप से प्रमेह एवं मधुमेह उत्पत्ति का कारण माना गया है।
2. आनुवांशिक:-यह रोग प्राय: रोगी के निकट संबंधियों में भी देखा जाता है। यदि माता पिता मधुमेह रोग से पीडि़त हैं तो उनके बच्चों में भी रोग उत्पन्न होने की प्रबल संभावना होती है।
3. मोटापा एवं आहार व्यवस्था जन्य:- प्राय: स्थूलकाय लोगों में मधुमेह अधिकता से पाया जाता है इसका कारण इंसुलिन की कार्यक्षमता में कमी का होना होता है।
आहार संबंधी कारणों में मिष्ठान, गरिष्ठ, चिकनाई युक्त पदार्थ, दही-दूध एवं लवण युक्त पदार्थों का अति सेवन, नये अनाज, मांसाहार, खट्टे एवं चरपरे द्रव्यों का अति सेवन, जंक फूड, शीतल पेय बार-बार खाने की प्रवृत्ति आदि से पाचन विकृति होकर मधुमेह होने की संभावनाबढ़ जाती है।
4. अकर्मण्यता:- जो व्यक्ति आराम तलवी दिन में सोने वाले, शारीरिक परिश्रम से जी चुराने वाले, सुविधा परस्त, अति सहवासी होते हैं उनमें भी मधुमेह अधिकता से पाया जाता है।
5. अन्य कारण:- शोक, चिंता, भय, क्रोध, तनाव आदि मानसिक आक्षेप, स्नायु दुर्बलता, पिट्यूटरी, थाइरॉइड, एड्रीनल ग्रंथि से निकलने वाले हारमोन्स के असंतुलन, यकृत रोग, पैंक्रियास में संक्रमण या चोट ग्रस्त होना, गर्भावस्था आदि के कारण भी मधुमेह उत्पत्ति देखी जाती है।
मधुमेह के लक्षण: मधुमेह के प्रारंभिक लक्षण
1. हाथ पैर के तलवों में जलन का महसूस होना ।
2. शरीर के विविध अंगों में सुन्नता महसूस करना।
3. शरीर पर चींटी चलने जैसी अनुभूति।
4. अत्यधिक प्यास का लगना।
5. बार-बार मूत्र त्याग की प्रवृत्ति।
6. भूख का अधिक लगना।
7. वजन का कम होना एवं कमजोरी महसूस करना।
8. स्वेदाधिक्य (पसीना अधिक आना) शरीर में चिपचिपापन तथा दुर्गन्ध युक्त लगना।
9. शरीर तथा जननांगों में खुजली चलना।
10. दृष्टि का धुंधला पडऩा।
11. त्वचा रोग फोड़े फुन्सी का होना।
12. घाव का धीरे-धीरे भरना।
13. पिंडलियोंएवं एड़ी में दर्द का रहना।
14. खुले स्थान पर मूत्र त्याग करने पर चींटियों का लगना तथा श्वेत द्रव्य का जमना पाया जाता है।
मधुमेह में उपद्रव एवं जटिलताएं:
मधुमेह एक मात्र ऐसा रोग है जिसमें शरीर के सभी प्रमुख अंग प्रभावित होते हैं। मधुमेह के उपरोक्त लक्षणों की उपेक्षा किये जाने पर शनै: शनै: शरीर की समस्त धातु उपधातुयें क्षींण होने लगती हैं एवं ओज का क्षय होने से व्यक्ति तेजहीन एवं दुर्बल दिखने लगता है साथ ही इंद्रिय शिथिलता भी उत्पन्न होती है।
इस प्रकार यदि मधुमेह को अनदेखा किया जाये तो कई सारी शारीरिक जटिलताएं उत्पन्न हो सकती हैं जिनमें निम्न लिखित प्रमुख हैं 
1. गुर्दों की विकृति:- मधुमेह रोगियों में यह सबसे अधिक प्रभावित होने वाला अंग है। गुर्दे की नलिकायें मोटी व अनियमित आकार की हो जाती हैं। जिससे एल्ब्यूमिन नामक प्रोटीन मूत्र के साथ आने लगता है यह गुर्दे के खराब होने की प्रारंभिक स्थिति होती है इससे शरीर में प्रोटीन की कमी होने से हाथ पैर पेट व चेहरे पर सूजन आने लगती है। रक्त में यूरिया की मात्रा बढऩे से यूरिमिया हो सकता है और गुर्दे की कार्यक्षमता कम होती है जिससे मधुमेह रोगियों को हीमोडायलेसिस कराने की आवश्यकता पडऩे लगती है।
2. आँखों संबंधी जटिलता:- दीर्घकाल तक रक्त शर्करा का स्तर बढ़े रहने पर मधुमेह रोगी के नेत्र पटल में खराबी आ जाती है जिससे दृष्टि धुंधली पड़ जाती है यहाँ तक कि कभी अंधापन भी हो सकता है। मधुमेह रोगियों में मोतिया बिन्द भी अपेक्षाकृत शीघ्र बनते हुये देखा जाता है।
3. तंत्रिका तंत्र संबंधी जटिलताऐं:-हाथ पैर में बार-बार सुई चुभने, चींटी चलने, जलन अथवा सुन्नपन जैसा लगना तंत्रिका तंत्र के प्रभावित होने का लक्षण है। मांसपेशियों व पिंडलियों में दर्द पाया जाता है। रक्त शर्करा के नियंत्रित न रहने पर पक्षाघात एवं नपुंसकता भी हो सकती है।
4. त्वचा संबंधी जटिलताऐं:-मधुमेह रोगी को बड़े-बड़े फोड़े फुन्सी हो जाते हैं जिन्हें मधुमेह पिंडिका कहा जाता है तथा यह मुश्किल से ठीक होते हैं।
5. कीटो एसिडोसिस:-यदि मधुमेही रोगी लापरवाही बरतते हैं तथा नियमित उपचार नहीं लेते हैं तो कीटो एसिडोसिस हो जाने की संभावना होती है। इसमें मूत्र के साथ कीटोन बॉडीज् जाने लगती है तथा रोगी कमजोर एवं सुस्त हो जाता है कभी-कभी रोगी की स्थिति गंभीर हो जाती है एवं वह बेहोश तक हो सकता है ऐसी परिस्थिति में तुरन्त चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए। 
6. रक्त प्रवाहिका तंत्र संबंधी जटिलताऐं:-मधुमेह के रोगियों में धमनियाँ मोटी एवं कड़ी हो जाती हैं। रक्त वाहिनियों की अंदरूनी परतों में वसा जमने के कारण वे संकरी हो जाती हैं जिससे कम उम्र में रक्तचाप, हार्ट अटैक एवं अंगुली में गैंगरीन जैसी जटिलतायें उत्पन्न हो सकती हैं।
7. आहार तंत्र संबंधी जटिलताऐं:-मधुमेही को प्राय: कब्ज या अतिसार (दस्त) की शिकायत हो जाती है। किसी-किसी रोगी को उदावर्त (इसोफेजियल रिगर्जिटेशन) की समस्या रहने से सीने में भारीपन बना रहता है।
8. संक्रमण:-सामान्यव्यक्ति की अपेक्षा मधुमेह रोगी की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने से जीवाणु, वायरल एवं फंगल संक्रमण होने की संभावना अधिक होती है।
9. पोषक तत्वों की कमी:-बार-बार मूत्र त्याग के परिणाम स्वरूप विविध खनिज लवण एवं जल की कमी बनी रहती है जिससे प्यास की अधिकता एवं कमजोरी बनी रहती है।
रोग की साध्यासाध्यता
यह एक कष्टसाध्य व्याधि है तथा इससे आजीवन छुटकारा पाना असंभव तो नहीं पर बड़ा मुश्किल है क्योंकि इससे मज्जा एवं ओज आदि सारभूत तत्वों का नाश होने से शरीर में अनेक कष्टप्रद लक्षण उत्पन्न होते हैं जिनकी शांति बड़ी कठिनाई से होती है साथ ही चिकित्सा विपरीतता के कारण व्याधि शमन कठिनाई से होता है।
वात शामक चिकित्सा किये जाने पर मेद वृ़द्धि होती है एवं मेदोहर औषधियों का प्रयोग करने पर वात की वृद्धि होती है इसलिए आयुर्वेद शास्त्रों में इसे याप्य या कष्टसाध्य व्याधि माना गया है। प्राय: यह रोग जड़ से नष्ट नहीं किया जा सकता परन्तु औषधियों के द्वारा इसके उपरोक्त लक्षणों एवं उपद्रवों की उत्पत्ति को रोका जा सकता है। जिससे रूग्ण व्यक्ति अधिक से अधिक समय तक सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर सकता है।
चिकित्सा:-आयुर्वेद शास्त्रों में चिकित्सा की दृष्टि से मधुमेह के रोगी दो प्रकार के होते हैं। एक स्थूल व बलवान तथा दूसरे कृश व दुर्बल। अत: रोगी के बलाबल अनुसार क्रमश: संशोधन एवं संशमन चिकित्सा का प्रावधान है। इस रोग में प्राय: कब्ज एवं अग्निमांद्य रहता है अत: दीपन पाचन औषधियों का प्रयोग चिकित्सा का प्रथम सोपान है। इस हेतु हल्दी चूर्ण एवं आंवला स्वरस का प्रयोग लाभप्रद रहता है।
काष्ठ औषधियों में बेलपत्र, जामनुपत्र, जामुन गुठली, नीमपत्र, मैथी बीज, विजयसार, तुलसी, करेला, सप्तरंगी, खदिर, हल्दी, आंवला, गुड़वेल, सदाबहार, गूलर, पलाश पुष्प, दारूहल्दी, कुटकी, कुटज, गोरख मुण्डी, गुड़मार, कालमेघ आदि औषधियों का आवश्यकतानुसार एकल अथवा संयुक्त रूप से प्रयोग किया जाता है।
शास्त्रोक्त औषधियों में - चंद्रप्रभा वटी, शिलाजत्वादिवटी, मामेजक वटी, शिवा गुटिका, प्रमेहगजकेशरी, हेमनाथ रस, जातिफलादि वटी, न्यग्रोधादि चूर्ण, त्रिफला चूर्ण, प्रमेहान्तक चूर्ण, मधुमेह हर चूर्ण, शक्ति संचय हेतु बसन्त कुसमाकर रस, त्रिवंग भस्म, अभ्रक भस्म, नागभस्म, स्वर्ण भस्म, यशद भस्म, मकरध्वज, वंगेश्वर रस, सिद्ध चंद्रोदय, ताप्यादि लौह आदि का प्रयोग लक्षणानुसार किया जाता है।
वर्तमान में नित्य नये-नये अनुसंधान एवं औषधीय निर्माण के कारण मधुमेह रोगियों को मधुमेह के साथ जीवन व्यतीत करना बहुत ही सुगम हो गया है। सुषेण हर्बल फार्मा द्वारा निर्मित डायबागोन पावडर मधुमेह रोगियों के लिये काफी लाभप्रद सिद्ध हो रहा है एवं कमजोरी में उक्त पावडर के साथ रेजुवा केप्सूल का सेवन विशेष लाभकारी होता है। 
मधुमेह में पथ्यापथ्य
मधुमेह से ग्रस्त व्यक्ति को निदान परिवर्जन (रोगोत्पादक कारण) पर पूरा ध्यान देना चाहिये जिस तरह के आहार विहार से रोग वृ़िद्ध हो उसे छोड़ देना चाहिये जैसे दूध, घी की बनी मिठाईयाँ, मालपुआ, खीर, हलुआ, मावे आदि से बनी मिठाईयाँ अधिक शर्करा या कार्बोहाईड्रेड युक्त पदार्थ जैसे चावल, मक्का, गन्ना, गुड़, आलू, अरबी, शकरकंद, मीठे फल, अंगूर, अंजीर, अनार, खजूर, आम आदि का त्याग करना चाहिये या अल्प मात्रा में सेवन करना चाहिये।
शराब, अति मैथुन, दिवास्वप्न, रात्री जागरण, अति चिकनाई युक्त पदार्थ, तेज मिर्च मसाले आदि भी त्यागदेना चाहिये।
जबकि जौं का दलिया, गेहूँ व चने की मिस्सी रोटी, कुलथी की दाल, चोकर युक्त आटा, मैथी, चौलाई, बथुआ, पालक, मूलीपत्र, करेला, परवल, कुन्दरू आदि सब्जियाँ, आंवला, हल्दी, धनिया, जीरा, काली मिर्च, मैथीदाना आदि मसाले, गाय अथवा बकरी का मलाई रहित दूध लाभ दायक होते हैं।
मधुमेह से बचाव
पूरी दुनिया में मधुमेह के रोगियों की संख्या मे ंसाल दर साल तेजी से वृद्धि हो रही है, यदि मधुमेह की उत्पत्ति के वास्तविक कारणों पर ध्यान दिया जाये और कुछ सावधानियाँ बरती जायें तो निश्चय से मधुमेह रोगियों की बढ़ती हुई संख्या को रोका जा सकता है। मधुमेह से ग्रसित व्यक्तियों की संतानों में मधुमेह होने का सर्वाधिक खतरा रहता है इसलिये वह निम्न सावधानियाँ बरतें तो इस रोग की गिरफ्त में आने से बच सकते हैं।
1. वर्तमान काल में स्वादु प्रवृत्ति के कारण हमारी भोजन की थाली से प्राय: कटु रस (कड़वा) प्रधान सब्जियाँ गायब सी हो गई हैं जोकि हमें न केवल मधुमेह बल्कि अन्य कई रोगों से बचाती हैं अत: भोजन व्यवस्था में कम से कम सप्ताह में एक बार करेला, मैथी, बथुआ, सहिंजन फली, परवल, कुन्दरू आदि में से किसी का समावेश जरूर करें।
2. भोजन के लिये प्र्याप्त समय दे:- आज की भागम भाग वाली जीवनचर्या में धनार्जन के लोभ या अन्य कारण से समयाभाव वश हम खाने के लिये भी प्र्याप्त समय नहीं देते हैं जिससे शीघ्रता से किये गये भोजन में आवश्यक मात्रा में लार (सैलाइवा) न मिलने से कार्बोहाइडेऊड का पाचन सुचारू रूप से ना होने के कारण पाचन तंत्र की गड़बड़ी पैदा हो जाती है जिससे मधुमेह होने की प्रबल संभावना रहती है अत: भोजन के लिये पर्याप्त समय दें।
3. अधिक वसा युक्त भोजन से बचें।
4. शीतलपेय, आईस्क्रीम, चाकलेट आदि के सेवन से बचें।
5. तम्बाकू, गुटका, धूम्रपान एवं शराब सेवन से बचें।
6. नियमित व्यायाम, प्राणायाम, पैदल भ्रमण एवं भरपूर शारीरिक परिश्रम करें।
7. 35 वर्ष की आयु होने पर वर्ष में एक बार रक्त शर्करा का स्तर अवश्य जाँच करावें, इससे मधुमेह होने पर तत्काल जानकारी हो सकती है और मधुमेह की गंभीरता से बचा जा सकता है।

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