26 जनवरी मेरे लिए केवल एक राष्ट्रीय पर्व नहीं है। यह वह दिन है, जिसने मुझे बार-बार यह सोचने पर मजबूर किया है कि स्वतंत्रता के बाद जिम्मेदारी का अर्थ क्या होता है। वर्षों तक शिक्षा, शोध, अध्यापन और आध्यात्मिक अध्ययन से जुड़े रहने के बाद मैं यह कह सकती हूँ कि गणतंत्र दिवस को समझना, वास्तव में स्वयं को समझने जैसा है।
जब हम 26 जनवरी 1950 की बात करते हैं, तो हम केवल संविधान के लागू होने की तिथि नहीं स्मरण करते, बल्कि उस राष्ट्रीय चेतना के जन्म को स्मरण करते हैं, जिसमें अधिकार और कर्तव्य एक-दूसरे से अलग नहीं हैं।
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संविधान : केवल कानून नहीं, एक जीवित दर्शन
एक शिक्षाविद् और शोधार्थी के रूप में मैंने संविधान को केवल राजनीतिक दस्तावेज़ की तरह नहीं देखा। मेरे लिए भारतीय संविधान एक जीवित दर्शन है—
जो हमें समानता सिखाता है,
न्याय की चेतना देता है,
और स्वतंत्रता को अनुशासन से जोड़ता है।
अपने अकादमिक जीवन में मैंने देखा है कि जब तक हम संविधान को पाठ्यक्रम की वस्तु मानते हैं, तब तक उसका प्रभाव सीमित रहता है। लेकिन जब हम उसे जीवन के व्यवहार में उतारते हैं, तभी सच्चा गणतंत्र जीवित होता है।
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मेरे अनुभव : शिक्षा, स्त्री और गणतंत्र
एक महिला होने के नाते, और विशेषकर एक शिक्षिका व शोधकर्ता होने के नाते, मैंने गणतंत्र के अर्थ को बहुत निकट से महसूस किया है।
मैंने देखा है—
कैसे शिक्षा महिलाओं को आवाज़ देती है
कैसे संविधान उन्हें पहचान देता है
और कैसे जागरूकता उन्हें नेतृत्व की ओर ले जाती है
गणतंत्र दिवस मुझे बार-बार यह स्मरण कराता है कि स्त्री सशक्तिकरण केवल नारा नहीं, संवैधानिक दायित्व है। जब एक महिला शिक्षित होती है, तो वह केवल स्वयं आगे नहीं बढ़ती, वह आने वाली पीढ़ियों का लोकतांत्रिक संस्कार भी गढ़ती है।
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26 जनवरी और वैदिक दृष्टि : एक आंतरिक अनुभव
मेरे ज्योतिष और वैदिक अध्ययन के अनुभव बताते हैं कि यह संयोग नहीं है कि 26 जनवरी के समय सूर्य मकर राशि में होता है।
वैदिक दृष्टि से—
सूर्य राष्ट्र की आत्मा है
मकर राशि अनुशासन, शासन और उत्तरदायित्व का प्रतीक है
और शनि कर्म, न्याय तथा समानता का ग्रह है
यही कारण है कि भारत का गणतंत्र केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि धर्म-आधारित नैतिक व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। यह व्यवस्था हमें यह सिखाती है कि स्वतंत्रता तभी स्थायी होती है, जब वह कर्तव्य से बंधी हो।
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आज का भारत और हमारी भूमिका
आज, जब भारत वैश्विक मंच पर अपनी पहचान मजबूत कर रहा है, तब 26 जनवरी का महत्व और भी बढ़ जाता है।
हमारे लिए प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि संविधान हमें क्या देता है, बल्कि यह होना चाहिए कि—
👉 हम संविधान को क्या लौटा रहे हैं?
👉 हम नागरिक के रूप में कितने ईमानदार हैं?
मेरे अनुभव कहते हैं कि राष्ट्र निर्माण बड़े नारों से नहीं, बल्कि दैनिक जीवन के छोटे-छोटे नैतिक निर्णयों से होता है।
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निष्कर्ष : गणतंत्र एक दिन नहीं, एक साधना
मेरे लिए गणतंत्र दिवस— एक पर्व नहीं,
एक विचार नहीं,
बल्कि एक निरंतर साधना है।
यह साधना हमें सिखाती है—
सोच में स्वतंत्रता
कर्म में अनुशासन
और जीवन में उत्तरदायित्व
मेरी यही कामना है कि हम सभी 26 जनवरी को केवल झंडा फहराने तक सीमित न रखें, बल्कि इसे अपने आचरण में उतारें।
यही सच्चा गणतंत्र है।
यही भारत की आत्मा है।
आचार्य डॉ. सरिता मिश्रा
PhD | Gold Medalist
8383904847