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काशी है... कालातीत, अडिग और मुक्त...!


के के उपाध्याय 

पिछले कई दिनों से देख रहा हूँ “निष्पक्ष कांग्रेसी पत्रकार” आज काशी पर बहुत रुदाली कर रहे हैं । यह वही “निष्पक्ष कांग्रेसी पत्रकार” हैं जो 2014 से पहले यहां मंदिर जीर्णोद्धार का विरोध कर रहे थे । मैं काशी पिछले ढाई दशक से लगातार जा रहा हूँ । मैंने देखा है उस काशी विश्वनाथ को जहां मंदिर के पास कीचड़ भरा रहता था । गलियाँ नाली बनी हुई थी । सडांध से चारों ओर का वातावरण दूषित होता था । इन्हीं गलियों में मंदिर के लिए लाईन लगती थी । सरकारें मंदिर के नाम से ही बिदकती थीं । काशी विश्वनाथ का नाम उन सरकारों के समय बड़ा हिक़ारत की दृष्टि से लिया जाता था । निष्पक्षनुमा पत्रकार औरंगज़ेब की गौरव गाथा लिख रहे थे । अहिल्याबाई होल्कर का नाम तो सांप्रदायिक था ।

आज काशी बदल गई है । दर्शन करने का अनुभव अद्भुत है । एक व्यवस्था है । सौंदर्य है । शिव नाम है । काशी की जयकार है । रोप वे बन रहा है । गंगा की धारा  में पांव पखार कर दर्शन को जाते हैं । न रास्ते जाम हैं न लोग परेशान । काशी में देसी विदेशी पर्यटक भी बढ़े हैं । आस्थावान भी ।
अब इन्हें मणिकर्णिका घाट का जीर्णोद्धार भी नहीं सुहा रहा । यह वही मणिकर्णिका है, जहाँ दशकों तक अव्यवस्था, गंदगी और अमानवीय हालात को इन्होंने “परंपरा” के नाम पर स्वीकार कर रखा था। आज उसी मणिकर्णिका में घाट को सुरक्षित किया जा रहा है। रास्तों को सुव्यवस्थित किया जा रहा है। श्रमिकों और परिजनों की सुविधा का ध्यान रखा जा रहा है। तब ये झूठ फैला रहे हैं। अधूरे वीडियो बनाए जा रहे हैं, संदर्भ काटकर दिखाए जा रहे हैं, और यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि आस्था पर हमला हो रहा है।
सच यह है कि मणिकर्णिका का विनाश नहीं, संरक्षण हो रहा है। मृत्यु की इस पवित्र स्थली की गरिमा बनाए रखते हुए उसे अव्यवस्था से मुक्त किया जा रहा है — और यही बात इन्हें सबसे अधिक चुभ रही है।

अहिल्याबाई होल्कर पर हल्ला मचाने वाले आज विचलित हैं । बदलती काशी देखकर । दरअसल मंदिरों का विकास इन्हें नहीं सुहाता । इन्हें झूठ पसंद है । बकवास पसंद है । काशी विश्वनाथ में जाने पर आप गौरवान्वित होंगे । शर्मिंदा नहीं । यह काशी है यहाँ मुक्ति की राह है । भस्म की होली है । इसे समझना आसान नहीं । काशी की आध्यात्मिकता को समझना इतना आसान नहीं ।

कांग्रेसी और वामपंथी आज जिस बेचैनी में वीडियो और अफ़वाहें फैला रहे हैं, वह विकास या आस्था की चिंता नहीं है — यह उस वैचारिक पराजय की घबराहट है, जिसमें काशी अपने मूल स्वरूप के साथ लौट रही है।
काशी न उनके झूठ से बदलेगी, न उनके कैमरे से डरेगी।
काशी है — कालातीत, अडिग और मुक्त।

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