पतझड़ जरूरी हैं,,,,
नई शाख़ों को आने के लिए,
बसंत की बहार में नवीन ,
कोंपलों को खिलाने के लिए...!!
पतझड़ अंत नहीं मुक्ति है
नवीन संचार के माध्यम से,
प्रकृति की संरचना के
फिर जीवंत हो उठने के लिए ,,,,,,
पतझड़ भी ज़रूरी है
फिर से बसंत आने के लिए
क्योंकि चक्र यही चलता रहेगा
मुरझाए मन को खिलाने के लिए.....
रौशनी जरूरी है ,,,,
अंधकार को मिटाने के लिए
जीवन यह क्षण भंगुर मात्र
संतुष्टि जरूरी है यहाँ से जाने के लिए......
तलाश करते रहे सुकून हम
तलाशते रहे खुशियाँ मुस्कुराने के लिए
ये पतझड़ एहसास दिलाता है
एक जिंदगी काफी है मुस्कुराने के लिए ......
आशी प्रतिभा ( स्वतंत्र लेखिका)
मध्य प्रदेश, ग्वालियर
भारत