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मिल रहा नेतापुत्रों का थोपा हुआ नेतृत्व...!


आनंद कुमार शर्मा, पूर्व आईएएस 
पुराने समय का शायद ही कोई छात्र होगा जिसने कॉलेज के जमाने में छात्र राजनीति में हिस्सा न लिया हो पर ना जाने किस बुद्धिमत्तता के फेर में आकर कालेज में पदाधिकारियों को सीधे चुनने की प्रथा समाप्त कर दी गई , वरना आज के जमाने के लगभग सभी प्रभावशाली नेता, छात्र राजनीति से ही प्रदेश और देश की राजनीति में आए हैं। मुझे लगता है मेरिट में ज़्यादा नंबर पाने वाले छात्रों को अध्यक्ष और सचिव बनाने के फ़ैसले के कारण ही स्वाभाविक नेतृत्व के बजाए, हमको नेतापुत्रों का थोपा हुआ नेतृत्व मिल रहा है जो पिता की छाया के हटते ही बेनूर हो जाते हैं। 
मैंने अपने कॉलेज की पढ़ाई जबलपुर के जीएस कॉलेज से की है। जब मैं कॉलेज में था , तब उनदिनों छात्र राजनीति की धूम थी , कॉलेज के प्रेसिडेंट को हर कोई अलग निगाहों से देखा करता था , और यूनिवर्सिटी प्रेसिडेंट का तो जलवा ही अलग था । उस दौर में ही शरद यादव जबलपुर से चुनाव लड़ कर सांसद हुए थे । उन्होंने “हलधर” चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ा था और जो आगे चलकर जनता पार्टी का चुनाव चिह्न बना था । सेठ गोविंददास और कांग्रेसी राजनीति की जबलपुर से विदाई का अध्याय लिखने वाले शरद छात्र राजनीति से ही आये थे सो हम कॉलेज के छात्र इसी बात पे फूले रहते थे । यूनिवर्सिटी के चुनावों में स्वर्गीय रत्नेश सालोमन , श्री प्रहलाद पटेल और श्री लखन घनघोरिया हमारे सामने ही अध्यक्ष बने । शरद यादव के उत्तराधिकारी के रूप में सुखदेव यादव का नाम चलता था , जिनकी श्याम टॉकीज़ के पास एक होटल में बैठक रहा करती थी । पिताजी के सरकारी नौकरी में ट्रांसफर के कारण मैं कटनी आ गया था , और कटनी से जबलपुर के विभिन्न कालेजों में पढ़ने हम छात्र जबलपुर जाया करते थे । कटनी से सैकड़ों की संख्या में छात्र जबलपुर पढ़ने जाते , शायद इसी से प्रभावित होकर हमें जीएस कॉलेज के छात्रसंघ के चुनाव में चुनाव लड़ने का प्रस्ताव मिला । नरेश सराफ जो बाद में विधायक भी बने , हमारे साथ ही कॉलेज में थे , उनकी पैनल से पहली बार ही कॉलेज में मेरे सीनियर श्री गोपी विश्वकर्मा को सचिव और मुझे सहसचिव के रूप में चुनाव में उतारा गया । चुनाव का रिजल्ट निकला ,और हम सभी चुनाव हार गये । मैं मातम पुरसी के लिए नरेश सराफ के हनुमान ताल स्थित घर गया तो वे भरे बैठे थे , मुझसे कहने लगे , आपके कटनी वालों ने मुझे वोट नहीं दिया इसलिये चुनाव हार गया । मैंने आश्चर्य से कहा “पर मेरी जानकारी में तो ऐसा नहीं है” तो वो कहने लगे गोपी विश्वकर्मा से जाकर पूछो उसने ही सबको संदेश कहलवाया है । मैं इतना ही कह पाया कि मैं और मेरे साथियों ने तो ऐसा नहीं किया , पर वे अपनी जानकारी पर कायम थे , बहरहाल बाद में पता चला वे सच बोल रहे थे । एम.काम. के बाद जब लॉ कॉलेज कटनी में एडमीशन हुआ तो गोपी विश्वकर्मा जी ने , जो तबतक सक्रिय रूप से छात्र राजनीति करने लगे थे , मुझे और मेरे साथी ओमप्रकाश सोनी को क्रमशः अध्यक्ष और सचिव के रूप में लॉ कॉलेज का चुनाव लड़वाया । इसी बीच एक दिलचस्प घटना घटी । कटनी में जलप्रदाय के लिए कटनी नदी पर बनाया गया स्टॉप डैम कटाये घाट पिकनिक स्पॉट के रूप में भी प्रसिद्ध है । चुनाव के एक दिन पहले हम सब कटाए घाट पिकनिक मनाने गए , स्टॉप डैम में स्नान के बाद गक्कड़ भर्ते की पार्टी थी । स्टॉपडैम पर कुछ अन्य नवयुवक भी नहा रहे थे । स्टॉपडैम से तैरने वाले छात्र छलाँग लगाते और तैर कर दूसरी और निकल जाते , इन सभी करतबों को देखते एक नवयुवक पवन बजाज को ना जाने क्या सूझी कि तैरना जाने बिना वो भी औरों की तरह पानी में कूद गया । कूदने पर जब वो डूबने लगा तो मैंने अपने साथी ओमप्रकाश सोनी उर्फ पल्लू को आवाज लगाई जो अच्छा तैराक था । ओमप्रकाश ने छलाँग लगाई और पवन बजाज़ को सिर के बालों से पकड़ किनारे ले आया। जान बचाने के लिए पवन बजाज और उसके साथियों ने पल्लू सोनी को हाथ जोड़ कर धन्यवाद दिया , पर दूसरे दिन जब कालेज में चुनाव के लिए वोट डल रहे थे , तो हमने देखा, पवन बजाज पल्लू सोनी के विरोधी उम्मीदवार का प्रचार कर रहा था । पल्लू सोनी बोला “देख यार इसकी जान मैंने बचाई और प्रचार ये दूसरे का कर रहा है” । मैंने कहा भाई राजनीति ऐसी ही होती है । संयोग देखें कि वो चुनाव भी हम चार वोट से हार गये , मुझे लगा राजनीति में जैसे समझ होनी चाहिए वैसी मुझमें है नहीं सो राजनीति को अलविदा कह मैंने नौकरी के लिये प्रतियोगी परीक्षाओं की ओर अपना ध्यान मोड़ दिया।

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