संत सहहिं दुख परहित लागी,
पर दुख हेतु असंत अभागी।
भूर्ज तरु सम संत कृपाला,
परहित निति सह बिपति बिसाला॥
गोस्वामी तुलसीदास जी बताते हैं—
संतजन दूसरों की भलाई के लिए स्वयं दुख सहते हैं,
जबकि दुष्ट लोग दूसरों को दुख देने के लिए ही जीते हैं।
सच्चे संत हमेशा दूसरों का भला सोचते हैं। खुद कष्ट सहकर भी परोपकार करते हैं और हर परिस्थिति में दया और करुणा बनाए रखते हैं। वहीं असंत दूसरों को पीड़ा देकर ही संतुष्ट होते हैं।