धर्म, समता, विश्वास और पुरुषार्थ का समन्वय ही जीवन को बनाता है सफल, शांत और सार्थक
एमपी धमाका
-राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि धर्म-साधना किसी एक वर्ग या लिंग का विषय नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के आत्मकल्याण का मार्ग है। पुरुषों को यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि धर्म केवल महिलाओं के लिए है। धर्म, समता, विश्वास और पुरुषार्थ का समन्वय ही जीवन को सफल, शांत और सार्थक बनाता है।
गुणायतन मध्यभारत के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन 'विद्यावाणी' ने बताया कि गुणायतन में आयोजित दैनिक शंका समाधान कार्यक्रम में मुनि श्री ने देश के विभिन्न महानगरों एवं नगरों से उपस्थित श्रद्धालुओं तथा देश-विदेश से ऑनलाइन जुड़े हजारों जिज्ञासुओं के धार्मिक, सामाजिक और पारिवारिक जीवन से जुड़े अनेक प्रश्नों का अत्यंत सहज, तार्किक एवं व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत किया।
मुनि श्री ने कहा कि नई पीढ़ी को धर्म एवं संस्कारों से जोड़ने में परिवार की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। माता-पिता के साथ-साथ दादा-दादी बच्चों के जीवन में नैतिक मूल्यों और धार्मिक संस्कारों का बीजारोपण कर सकते हैं। यदि परिवार में धर्म का वातावरण रहेगा तो समाज भी संस्कारित बनेगा।
उन्होंने कहा कि सुख और शांति का सबसे सरल मार्ग समता है। सुख में आसक्त और दुःख में विचलित होने के बजाय इष्ट-अनिष्ट दोनों परिस्थितियों में मन को स्थिर रखना ही वास्तविक आध्यात्मिक साधना है।
विश्वास के विषय में मुनि श्री ने कहा कि अधूरी जानकारी, पूर्वाग्रह और दूसरों की बातों में आकर निर्णय लेना विश्वास को कमजोर करता है। बिना सत्य जाने किसी के प्रति धारणा नहीं बनानी चाहिए। समग्र चिंतन और सकारात्मक दृष्टिकोण ही स्वस्थ संबंधों की आधारशिला है।
विवाह संस्कार पर उन्होंने कहा कि विवाह भगवान की साक्षी में पवित्र वातावरण में संपन्न होने वाला धार्मिक संस्कार है। तीर्थ एवं मंदिरों में विवाह के नाम पर अशास्त्रीय आयोजन, रात्रिकालीन कार्यक्रम, प्री-वेडिंग शूट तथा फिल्मी परंपराओं से बचना चाहिए और शास्त्रीय मर्यादाओं के अनुरूप ही विवाह संपन्न करना चाहिए।
समाज सेवा के संदर्भ में मुनि श्री ने महिला संगठनों का आह्वान करते हुए कहा कि वे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की पहचान कर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने का अभियान चलाएं। पात्र लोगों तक सरकारी योजनाओं एवं सुविधाओं की सही एवं तथ्यपूर्ण जानकारी पहुँचाना भी श्रेष्ठ समाज सेवा है।
भाग्य और पुण्य पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि भाग्य हमारे पूर्वकृत कर्मों का परिणाम है, जबकि पुण्य भाग्य का उज्ज्वल पक्ष है। यदि भविष्य को श्रेष्ठ बनाना है तो वर्तमान में शुभ पुरुषार्थ और पुण्य का संचय करना होगा। अतीत के पुण्य से अधिक वर्तमान के सद्कर्म ही आने वाले जीवन का श्रेष्ठ भाग्य निर्मित करते हैं।
शंका समाधान कार्यक्रम का संचालन मुनि श्री संधान सागर महाराज ने किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे, जबकि देश-विदेश से ऑनलाइन जुड़े हजारों श्रद्धालुओं ने भी मुनि श्री के प्रेरक मार्गदर्शन, जीवनोपयोगी प्रसंगों और सत्य घटनाओं पर आधारित उदाहरणों के माध्यम से धर्म, संस्कार, समता और पुरुषार्थ का प्रेरक संदेश प्राप्त किया।