प्रथम अपीलीय अधिकारी ने जिला आपूर्ति अधिकारी को लगाई फटकार, निशुल्क सूचना उपलब्ध कराने के दिए आदेश
एमपी धमाका, विदिशा
सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त दस्तावेजों ने विदिशा जिले की सार्वजनिक वितरण प्रणाली (राशन व्यवस्था) पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरटीआई से हुए खुलासे के अनुसार, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के तहत गठित की जाने वाली जिला स्तरीय खाद्य सुरक्षा सतर्कता समिति का गठन ही नहीं किया गया। ऐसे में वर्षों से राशन वितरण व्यवस्था की निगरानी और उपभोक्ताओं के हितों की सुरक्षा किसके भरोसे होती रही, यह बड़ा सवाल बन गया है।
एमपी धमाका ने जिला आपूर्ति अधिकारी से समिति के गठन से लेकर आवेदन के निराकरण तक हुई बैठकों की सत्यापित प्रतियां मांगी थीं। निर्धारित समय सीमा में जानकारी नहीं मिलने पर प्रथम अपील दायर की गई।
प्रथम अपीलीय अधिकारी (अपर कलेक्टर) द्वारा पारित आदेश में यह स्पष्ट उल्लेख किया गया कि लोक सूचना अधिकारी ने सूचना का अधिकार अधिनियम की समय सीमा का पालन नहीं किया। सुनवाई के दौरान जिला आपूर्ति अधिकारी की ओर से यह स्वीकार किया गया कि संबंधित आवेदन पर समय पर कार्रवाई नहीं हुई और वर्तमान में जिला स्तरीय खाद्य सुरक्षा सतर्कता समिति गठित नहीं है, इसलिए बैठकों का कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।
इतना ही नहीं, रिकॉर्ड में उपलब्ध एक शासकीय पत्र से यह भी सामने आया कि वर्ष 2024 में तत्कालीन कलेक्टर द्वारा प्रभारी मंत्री को समिति के पुनर्गठन के लिए नामांकन भेजने का अनुरोध किया गया था, लेकिन इसके बाद भी समिति का गठन नहीं हो सका।
प्रथम अपीलीय अधिकारी ने अपने आदेश में जिला आपूर्ति अधिकारी को निर्देश दिए हैं कि कार्यालय में उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार अपीलकर्ता को समस्त वांछित सूचना निःशुल्क उपलब्ध कराई जाए तथा इसकी जानकारी न्यायालय को भी भेजी जाए।
अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि जिला स्तरीय खाद्य सुरक्षा सतर्कता समिति का गठन ही नहीं हुआ, तो राशन दुकानों की निगरानी, उपभोक्ताओं की शिकायतों की समीक्षा और खाद्यान्न वितरण की पारदर्शिता की जिम्मेदारी आखिर किसके कंधों पर थी? यह मामला जिले की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रशासनिक लापरवाही की ओर संकेत करता है।
धमाका सवाल
जब समिति बनी ही नहीं, तो राशन वितरण की निगरानी कौन कर रहा था?
उपभोक्ताओं की शिकायतों की समीक्षा किस मंच पर होती रही?
शासन के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद समिति का गठन क्यों नहीं किया गया?
इस लापरवाही के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर क्या कार्रवाई होगी?