यदि हमारे नियम सचमुच मजबूत होते, तो आज हम पॉलिथीन इस्तेमाल करने वाले आम आदमी को कटघरे में खड़ा करने के बजाय पॉलिथीन बनाने वाली फैक्ट्रियों पर ताले लगा रहे होते।
यदि शराबबंदी और नशामुक्ति हमारी वास्तविक प्राथमिकता होती, तो लोगों से बार-बार यह कहने की जरूरत नहीं पड़ती कि “शराब मत पीजिए, नशा मत कीजिए।” सवाल यह होना चाहिए कि वह शराब और नशे का सामान बाजार तक पहुंच ही कैसे रहा है? उत्पादन कौन कर रहा है? सप्लाई कौन कर रहा है? तस्करी का नेटवर्क किसके संरक्षण में चल रहा है?
व्यवस्था का सबसे आसान काम है—उपभोक्ता को ज्ञान देना।
कठिन काम है उस व्यवस्था पर हाथ डालना, जो प्रतिबंधित या नुकसानदायक वस्तु को पैदा करती है, पहुंचाती है और उससे मुनाफा कमाती है।
पॉलिथीन के खिलाफ अभियान चलता है। दुकानदार से पॉलिथीन जब्त होती है। ग्राहक को समझाया जाता है। चालान काटे जाते हैं। लेकिन बड़ा सवाल वहीं खड़ा रहता है—जिस पॉलिथीन पर रोक है, वह बाजार में आती कहां से है?
नशे के खिलाफ अभियान चलता है। स्कूल-कॉलेजों में जागरूकता कार्यक्रम होते हैं। युवाओं से अपील की जाती है कि नशे से दूर रहें। यह जरूरी भी है। लेकिन क्या केवल नशा करने वाले को समझाने से समस्या खत्म हो जाएगी? जब तक नशे की आपूर्ति की जड़ पर प्रहार नहीं होगा, तब तक शाखाओं को काटते रहने से पेड़ कैसे खत्म होगा?
यही सवाल शराब के मामले में भी है।
आम नागरिक को कानून का डर दिखाना आसान है। गरीब, छोटे दुकानदार, रेहड़ी वाला या मजदूर नियम तोड़ता है तो कार्रवाई तुरंत दिखाई देती है। लेकिन असली सवाल यह है कि बड़े स्तर पर नियमों का उल्लंघन करने वालों तक कानून की पहुंच कितनी है?
कानून की ताकत का पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि उसने कितने गरीबों के चालान काटे। असली पैमाना यह होना चाहिए कि उसने अवैध उत्पादन, तस्करी, कालाबाजारी और संगठित नेटवर्क के खिलाफ कितनी प्रभावी कार्रवाई की।
कानून अगर सिर्फ कमजोर को डराता है और ताकतवर को रास्ता देता है, तो फिर सवाल कानून की किताब पर नहीं, उसके क्रियान्वयन की नीयत और निष्पक्षता पर उठेंगे।
हमें जागरूकता भी चाहिए और सख्ती भी। प्रतिबंध भी चाहिए और उसके पीछे प्रभावी कार्रवाई भी। लेकिन कार्रवाई की दिशा ऊपर से नीचे की ओर होनी चाहिए—सिर्फ उपभोक्ता तक नहीं, बल्कि उत्पादन और आपूर्ति की पूरी श्रृंखला तक।
आखिर कब तक हम जनता से कहते रहेंगे—
“पॉलिथीन मत इस्तेमाल करो।”
“शराब मत पियो।”
“नशा मत करो।”
कभी यह भी पूछा जाना चाहिए—
“पॉलिथीन बना कौन रहा है?”
“अवैध शराब पहुंचा कौन रहा है?”
“नशे का कारोबार चला कौन रहा है?”
क्योंकि किसी भी समस्या का समाधान केवल उसके शिकार को समझाने से नहीं होता।
समस्या की जड़ पर प्रहार करना पड़ता है।
और शायद यही वह जगह है जहां हमारे नियमों की असली परीक्षा होती है—
क्या कानून वास्तव में सबके लिए बराबर है, या उसकी सख्ती सिर्फ उस व्यक्ति तक पहुंचती है जो सबसे कमजोर है?
सवाल बड़ा है… और जवाब व्यवस्था को देना होगा।