केके उपाध्याय
किसी विचारक की प्रासंगिकता इस बात से तय नहीं होती कि उसके जन्म के कितने वर्ष बीत गए। वह इस बात से तय होती है कि समय बदलने के बाद भी उसके उठाए प्रश्न कितने जीवित हैं। 25 सितंबर को पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती पर यही कसौटी उनके विचारों को हमारे सामने फिर खड़ा करती है।
दुनिया बदल गई। अर्थव्यवस्था बदली। बाजार बदला। तकनीक ने जीवन की गति बदल दी। लेकिन एक प्रश्न आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है , इस पूरी प्रगति के केंद्र में मनुष्य कहां है? और विकास की रोशनी उस व्यक्ति तक कितनी पहुंची है, जो समाज की अंतिम पंक्ति में खड़ा है?
दीनदयाल उपाध्याय ने दशकों पहले इसी प्रश्न को भारतीय दृष्टि से देखा था। उनके लिए राजनीति केवल सत्ता पाने की कला नहीं थी। अर्थव्यवस्था केवल उत्पादन और संपदा बढ़ाने का गणित नहीं थी। और विकास केवल आंकड़ों की चमक नहीं था। इन सबके केंद्र में मनुष्य था- “पूरा मनुष्य” उसका शरीर, उसका मन, उसकी बुद्धि, उसकी आत्मा; उसका परिवार, समाज, संस्कृति और प्रकृति से संबंध।
इसी समग्र दृष्टि को उन्होंने ‘एकात्म मानववाद’ का स्वर दिया।
इसलिए दीनदयाल जी की जयंती केवल स्मरण का दिन नहीं है। यह उस प्रश्न को फिर से पूछने का दिन है , क्या हमारी व्यवस्था मनुष्य के लिए है ? क्या हमारी प्रगति अंतिम व्यक्ति तक पहुंच रही है?
मनुष्य केवल आर्थिक प्राणी नहीं। दीनदयाल जी जब एकात्म मानववाद की अवधारणा सामने रख रहे थे, तब दुनिया मुख्यतः दो विचारधाराओं के प्रभाव में थी। एक ओर पूंजीवाद था। दूसरी ओर साम्यवाद। एक व्यक्ति और बाजार को प्राथमिकता देता था, दूसरा वर्ग और सामूहिक आर्थिक व्यवस्था को।
दीनदयाल जी ने इन दोनों के बीच एक बुनियादी प्रश्न खड़ा किया- क्या मनुष्य केवल आर्थिक प्राणी है?
उनका उत्तर था .. नहीं।
मनुष्य केवल शरीर नहीं है। उसके पास मन है। बुद्धि है। आत्मा है। उसे रोटी चाहिए, लेकिन केवल रोटी पर्याप्त नहीं। रोजगार चाहिए, लेकिन सम्मान भी। भौतिक सुख चाहिए, लेकिन परिवार, समाज, संस्कृति और आत्मिक संतोष भी।
मनुष्य को उसकी इसी संपूर्णता में देखना एकात्म मानववाद का आधार है।