आनंद कुमार शर्मा, पूर्व आईएएस
जब हम लोग राज्य प्रशासनिक सेवा में चयनित होकर प्रशासन अकादमी भोपाल में पहुँचे, तो बाक़ी बातों के अलावा हमें पढ़ाने आने वाले गुरुओं ने ये भी सलाह दी कि हमें श्री आरसीवीपी नरोन्हा कि लिखी पुस्तक “अ टेल टोल्ड बाय एन इडियट” ज़रूर पढ़नी चाहिए । श्री नरोन्हा मध्यप्रदेश केडर के मूर्धन्य आईएएस अफसर थे और ये किताब उनके प्रशासनिक अनुभवों पर आधारित एक बड़ा रोचक वृतांत है । किताब का शीर्षक शेक्सपियर की प्रसिद्ध कृति मैकबेक के एक संवाद से लिया गया है और पूरी पुस्तक दिलचस्प वृत्तांतों से भरी हुई है । बहरहाल किताब तो तब मैंने पढ़ ली थी पर इसके शीर्षक का कोई और पहलू भी सामने आयेगा ये तब मैंने न सोचा था ।
अपनी पहली पदस्थापना राजनांदगाँव जिले में जो अब छत्तीसगढ़ का भाग है , में मुझे बहुत जल्द एसडीएम का दायित्व दे दिया गया । उन दिनों ट्रेनिंग के दौरान परिवीक्षाधीन अधिकारी को छुट्टी पर जाने वाले मैदानी अफसरों का चार्ज भी दे दिया जाता था । मुझे भी इसी कारण ट्रेनिंग के साथ साथ बीडीओ बोड़ला और कवर्धा का चार्ज भी दे दिया गया था । डोंगरगढ़ के एसडीएम को किसी विवाद के कारण सब-डिवीजन से हटाने के कारण ही मुझे डोंगरगढ़ का एसडीएम भी बड़े जल्द बना दिया गया । तब तक न तो मेरी ट्रेनिंग पूरी हुई थी और ना ही मैं राजस्व विषय की परीक्षा में उत्तीर्ण हुआ था तो ये इंतिजाम किए गया कि प्रशासनिक कामकाज तो मैं ही संभालूँगा पर राजस्व प्रकरणों में मैं केवल प्रतिवेदन लिखूँगा और उसका अंतिम आदेश पारित करने के लिए श्री जीएस धनंजय को अधिकृत कर दिया गया । धनंजय साहब मुझसे बड़े काफ़ी सीनियर अधिकारी थे जो ना केवल मुझे क़ानूनी बारीकियों को समझाया करते थे बल्कि मुझ पर बड़े भाई सदृश स्नेह भी रखते थे ।
एक दिन हमारे क्षेत्र में एक मंत्राणी जी का दौरा हुआ जो तत्कालीन सरकार में बड़ी प्रभावशाली मानी जातीं थीं । मैं नया नया था सो मेरे साथ साथ कलेक्टर ने धनंजय साहब की भी ड्यूटी लगा दी कि दौरे में प्रोटोकॉल के अंतर्गत वे भी मार्गदर्शन करेंगे । मेरे लिए ये बड़ा मुफीद था क्योंकि उनके पास जीप थी , और मेरे पास तो केवल मोटरसायकल ही थी सो उनके साथ रहने से मंत्री महोदया के साथ भ्रमण में जीप में घूमने की सुविधा मिल गई । शायद कोई चुनाव पास रहे होंगे सो मेरी तहसील में तीन चार जगहों पर उनकी सभाएँ थीं । हम दोनों पुलिस के अफ़सरों के साथ मंत्री महोदया की प्रोटोकाल ड्यूटी कर रहे थे । दूसरी या तीसरी सभा में मंत्री महोदया का भाषण चल रहा था कि अचानक समय काटने के लिए होने वाली बातचीत के बीच मैंने धनंजय साहब से पूछा “ सर ये नरोन्हा साहब से अपनी किताब का शीर्षक ए टेल टोल्ड बाय एन इडियट क्यों लिखा ? धनंजय साहब बोले “ हम इडियट ही तो हैं “। मैंने कहा ऐसा क्यों कह रहे हैं ? धनंजय साहब मुस्कुरा कर बोले “ यार ये जो मंत्री महोदया है , जब हम पढ़ते थे तो बस्तर में हमारे छात्रावास में खाना बनाने आती थी । पढ़ लिख कर हम डिप्टी कलेक्टर बन गए और ये नेता बन गईं । अब आज हम इनके पीछे घूम रहे हैं , तो इडियट ही तो हुए “। तब तक सभा समाप्त हो चुकी थी और हम हँसते हँसते अगली सभा की ओर चल दिए ।