पारदर्शिता को ठेंगा दिखा रहा वन विभाग!
विदिशा, एमपी धमाका
सरकारी धन के खर्च में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए सूचना का अधिकार अधिनियम बनाया गया है, लेकिन जब सरकारी विभाग ही खर्च से जुड़े दस्तावेज उपलब्ध कराने से इनकार करने लगे, तो जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
ऐसा ही एक मामला विदिशा के सामान्य वन मंडल से सामने आया है, जहां वन्यजीवों की सुरक्षा पर खर्च की गई लाखों रुपये की राशि का हिसाब तो दे दिया गया, लेकिन खर्च से संबंधित देयक और नोटशीट उपलब्ध कराने से इनकार कर दिया गया।
प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार, वन विभाग से वन्यजीवों की सुरक्षा पर हुए खर्च की जानकारी सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 6(1) के तहत मांगी गई थी। इसके जवाब में विभाग ने वित्तीय वर्ष 2023-24, 2024-25 और 2025-26 में प्राप्त और खर्च की गई राशि का विवरण उपलब्ध कराया।
तीन वर्षों में 31 लाख 90 हजार 706 रुपये खर्च!
विभाग द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार, वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए तीन वित्तीय वर्षों में निम्न राशि खर्च की गई।
वर्ष 2023-24: 9 लाख 95 हजार 734 रुपये
वर्ष 2024-25: 10 लाख रुपये
वर्ष 2025-26: 11 लाख 94 हजार 972 रुपये
इस प्रकार तीन वर्षों में कुल 31 लाख 90 हजार 706 रुपये खर्च किए जाने की जानकारी दी गई है। विभाग ने बताया कि इन वर्षों में प्राप्त राशि और व्यय की राशि समान रही।
लाखों के खर्च का हिसाब, लेकिन बिलों पर चुप्पी!
मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जब विभाग ने लाखों रुपये के खर्च का विवरण उपलब्ध करा दिया है, तो उस खर्च से संबंधित मूल दस्तावेज, देयक और नोटशीट क्यों नहीं दिए गए? आवेदक द्वारा मांगी गई विस्तृत जानकारी के जवाब में विभाग ने सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8(1) के विभिन्न प्रावधानों का हवाला देते हुए संबंधित अभिलेख उपलब्ध कराने से इनकार किया है।
ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर वन्यजीवों की सुरक्षा के नाम पर खर्च की गई राशि का विस्तृत ब्यौरा सार्वजनिक करने में क्या बाधा है? क्या खर्च के दस्तावेजों की जांच से विभाग को कोई आपत्ति है या फिर सूचना रोकने के पीछे कोई अन्य प्रशासनिक कारण है?
पारदर्शिता और जवाबदेही पर उठे सवाल
सरकारी धन के उपयोग से संबंधित जानकारी मांगना नागरिकों का वैधानिक अधिकार है। हालांकि, सूचना का अधिकार अधिनियम में कुछ सूचनाओं को सार्वजनिक करने से छूट भी दी गई है। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि वन विभाग ने जिन प्रावधानों का हवाला देकर दस्तावेज देने से इनकार किया है, वे इस मामले में किस प्रकार लागू होते हैं।
वन्यजीवों की सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषय पर खर्च की गई राशि के दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने से विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं। अब देखना होगा कि इस मामले में प्रथम अपील या अन्य वैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से आवेदक को मांगी गई जानकारी मिल पाती है या नहीं।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब सरकारी खजाने से लाखों रुपये खर्च हुए हैं, तो उस खर्च का पूरा हिसाब देखने का अधिकार आखिर जनता को क्यों नहीं मिलना चाहिए?
एमपी धमाका की पड़ताल जारी...