एमपी धमाका
12 अक्टूबर 2005 को देश में सूचना का अधिकार अधिनियम लागू हुआ था। इस कानून का उद्देश्य सरकारी कामकाज में पारदर्शिता लाना और अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करना था। लेकिन आज, कानून लागू होने के 21 साल बाद, इसकी प्रभावशीलता पर सवाल उठ रहे हैं। सूचना आयोगों में रिक्त पद, लंबित अपीलें और लोक सूचना अधिकारियों की कथित लापरवाही के चलते नागरिकों को समय पर जानकारी पाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। सवाल यह है कि जब सूचना देने के लिए कानून में समय-सीमा तय है, तो फिर लोगों को जानकारी के लिए लंबा इंतजार क्यों करना पड़ रहा है?
सूचना का अधिकार अधिनियम आम नागरिक को सरकारी विभागों के कामकाज, योजनाओं पर खर्च, निर्माण कार्यों और प्रशासनिक निर्णयों से संबंधित उपलब्ध रिकॉर्ड मांगने का कानूनी अधिकार देता है। सामान्य परिस्थितियों में लोक सूचना अधिकारी को 30 दिनों के भीतर सूचना देनी होती है। जीवन और स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में 48 घंटे की समय-सीमा निर्धारित है।
लेकिन जमीनी स्तर पर कई आवेदकों को समय पर जानकारी नहीं मिलने, अधूरे जवाब मिलने या आवेदन पर कार्रवाई नहीं होने की शिकायतें रहती हैं। ऐसे में नागरिक प्रथम अपील और फिर सूचना आयोग में द्वितीय अपील का सहारा लेते हैं।
सूचना आयोगों में रिक्त पद बनी बड़ी चुनौती
सूचना के अधिकार को प्रभावी बनाने में केंद्रीय और राज्य सूचना आयोगों की महत्वपूर्ण भूमिका है। लेकिन आयोगों में पद रिक्त रहने और अपीलों के निस्तारण में देरी की समस्या नागरिकों की परेशानी बढ़ा सकती है। यदि अपीलों की सुनवाई समय पर नहीं होती, तो सूचना पाने का अधिकार व्यवहार में कमजोर पड़ने लगता है।
सरकारों के सामने चुनौती है कि सूचना आयोगों में रिक्त पदों को समय पर भरा जाए, लंबित मामलों के निस्तारण में तेजी लाई जाए और आयोगों की कार्यक्षमता बढ़ाई जाए। साथ ही, कितनी अपीलें लंबित हैं और उनका निस्तारण किस गति से हो रहा है, इसके आंकड़े भी नियमित रूप से सार्वजनिक किए जाने चाहिए।
लोक सूचना अधिकारियों की जवाबदेही पर भी सवाल
कानून में केवल सूचना देने की समय-सीमा ही नहीं, बल्कि लापरवाही के मामलों में दंड का प्रावधान भी है। सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 20 के तहत निर्धारित शर्तें पूरी होने पर संबंधित लोक सूचना अधिकारी पर प्रतिदिन 250 रुपये, अधिकतम 25 हजार रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।
इसके बावजूद सवाल उठता है कि समय पर सूचना नहीं देने वाले अधिकारियों की जवाबदेही कितनी प्रभावी ढंग से तय हो रही है? क्या आवेदकों को बार-बार अपील करने के लिए मजबूर होना चाहिए? और क्या सरकारी विभाग सूचना के अधिकार को गंभीरता से लागू कर रहे हैं?
सरकार से सवाल
सूचना का अधिकार दिवस पर सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब कानून मौजूद है, समय-सीमा निर्धारित है और लापरवाही पर दंड का प्रावधान भी है, तो इसके प्रभावी क्रियान्वयन में बाधाएं क्यों बनी हुई हैं?
सूचना आयोगों में रिक्त पद भरना, लंबित अपीलों का शीघ्र निस्तारण करना, लोक सूचना अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करना और सरकारी रिकॉर्ड को व्यवस्थित रखना समय की जरूरत है।
सूचना का अधिकार केवल सरकारी दस्तावेज हासिल करने का माध्यम नहीं, बल्कि लोकतंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही की बुनियाद है। यदि नागरिक को अपने ही सरकारी तंत्र से जानकारी पाने के लिए वर्षों इंतजार करना पड़े, तो कानून के वास्तविक उद्देश्य पर सवाल उठना स्वाभाविक है।