सस्ती दारु, पोर्न फ़िल्में, मोबाइल फोन में आती अनचाही अर्धनग्न तस्वीरें, नंगे रील्स, सस्ता नशा, देश में फैले हुए ड्रग माफिया, जातिवादी हिंसा, हर वस्तु में हो रही मिलावट, नकली घी, तेल, दाल, चावल, आटा, सब्जियां, लगातार प्राकृतिक संसाधनों का निजीकरण पर्वत पहाड़ जल, वन, पशुओं की हत्या, बेरोजगारी, भूख.. क्या यही हमारा भारत है? तो फिर नर्क किसे कहते हैं? गुगल पर मुफ़्त में पोर्न साइट, फिर ओयो होटेल, 14 फरवरी पूर्व नियोजित संभोग दिवस, यही तो नर्क है ! देश के युवा सिर्फ सुरा सुन्दरी में डूब गए हैं!
फिर live_in_relationships ( विवाह पूर्व संभोग ) आया है, लोगों के 25- 25 वर्ष के रिश्ते टूट गए, कोई सुनवाई नहीं, कोई कानून का भय नहीं, कोई शर्म लिहाज नहीं, रोटी मिले ना मिले सुरा सुन्दरी मिल जाए बस यही ख्वाहिश होती है, अश्लीलता रोकने के बजाय इतनी फैला दी गई है कि अब वैश्यालयों की आवश्यकता नहीं होती है, किसी देश का बेड़ा गर्क करना है तो वहां की परम्पराओं को तोड़ दीजिए और यही किया जा रहा है। फिल्मी हीरोइन हीरो यही कर रहे हैं, अब तो स्त्रियों ने चड्डी की रंग बताते बताते पहनना भी बंद कर दिया है, स्तन के नीपल्स ढ़ांक कर बाकी सब कुछ दिखा देना फैशन बन गया है , नग्नता सीधे घरों में आ रही है, पहले फ़िल्में थोड़ी साफ सुथरी होती थीं। रेडियो पर लता, आशा, किशोर, मुकेश के कर्णप्रिय गीत होते थे, जो आत्मा को प्रेम की पवित्रता से भर देते थे, आजकल संगीत ही फूहड़ है चोली के पीछे क्या है? चने के खेत में, मुझको राना जी माफ करना क्यों की रात में किसी और के साथ सो गयी इत्यादि द्विअर्थी और उत्तेज़क गीतों ने लोगों के मस्तिष्क में गन्दगी भर दी है, जब विचार गंदे होते हैं तभी कामुकता जन्म लेती है, विचारों को गीतों द्वारा नग्न स्त्रियों द्वारा जानबूझकर भड़काया जाता है, और फिर अपराध बलात्कार होने पर कड़े कानून का ना होना अपराधी का छूट जाना उसके हौसले बुलंद करता है, कितना हास्यास्पद है कि जमीन के नीचे पानी का दोहन टनों में किया जाता है और लोगों को टूथपेस्ट करते वक्त पानी बचाने की सलाह दी जाती है, उसी प्रकार लोगों की सेक्स भावनाओं को जानबूझकर उत्तेजित किया जा रहा है और फिर बलात्कार के लिए निर्दोष स्त्रियों को दोषी ठहराया जाता है, जातिवाद समाप्त नहीं किया जाता है सरकारी रिकार्ड में सबसे पहले जन्म लेते ही फार्म भरवा लिया जाता है और फिर असमानता कि बात कही जाती है, कैसे आएगी समानता कौन लाएगा? सदियां बीत गई लेकिन हम लोग भारतीय नहीं बन सके.... लोग ब्राह्मण , क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र है लेकिन अफसोस भारतीय कोई नहीं है, और जाते जाते कड़वा सच - नेताओं के बच्चे विदेश में पढ़ते हैं और लेकिन बर्बाद होंगे, आप और हम और हमारी आने वाली पीढ़ी !
विचार अवश्य कीजिये , आपकी ज़ेनरेशन आपके हाथ।
नीलम त्रिपाठी