आनंद कुमार शर्मा पूर्व आईएएस
इन दिनों पितृपक्ष चल रहे हैं , हमारे देश में हिन्दू धर्म को मानने वाले इन पंद्रह दिनों यानी पखवाड़े में अपने पूर्वजों की स्मृति में पूजा अनुष्ठान आदि करते हैं । हम मानते हैं कि इन तिथियों में हमारे पुरखे अपने बच्चों से मिलने धरती पर आते हैं । दुनिया के हर एक धर्म में अपने पूर्वजों को याद करने या उनका शुक्रिया अदा करने की परम्पराएं हैं । इस्लाम में शब-ए- बारात के त्योहार में लोग अपने पूर्वजों की कब्र में जाकर नमाज़ पढ़ते हैं और उन्हें याद करते हैं । ईसाई समुदाय में भी ऑल सोल डे मनाया जाता है । पुरखे आते होंगे या नहीं , ये तो कोई नहीं जानता , पर अपने पूर्वजों को स्मरण करने का रिवाज़ जरूर अच्छा है । इन दिनों गया में भी भारी भीड़ उमड़ा करती है , जहाँ हिंदू धर्मावलंबी मानतें हैं कि अपने पूर्वजों का श्राद्ध करने के बाद , वे जन्म मृत्यु के बन्धनों से मुक्त हो जाते हैं । इस संबंध में मुझे एक दिलचस्प वाक़या याद आ रहा है ।
बात पुरानी है , मेरे माता-पिता के स्वर्गवास के बाद जब मैं और मेरा छोटा भाई पितृमोक्ष अमावश्या पर उनके श्राद्ध के लिये गया जा रहे थे तो हवाई जहाज में मेरी बाजू वाली कुर्सी पर एक विदेशी महिला विराजमान थीं जिनका नाम मार्गरिटा था । उसने मुझसे पूछा कि क्या आप गया से ही हैं ? मैंने कहा नहीं जी , मैं तो पहली बार जा रहा हूँ । मार्गरिटा कहने लगीं , मैं तो दसवीं बार जा रही हूँ लेकिन इस बार पता नहीं क्या बात है कि बड़ी मुश्किल से मुझे रहने की जगह मिल पायी है । मुझे आश्चर्य हुआ कि इतनी दफ़े वे क्योंकर गया गया जा रही हैं तो उसने बताया कि वे बौद्ध धर्मावलंबी हैं और ये तो उनका बड़ा तीर्थ है । मुझे ये जान कर भी आश्चर्य हुआ कि वे मेक्सिको से थीं क्योंकि मेक्सिको में भी बौद्ध धर्मावलम्बी हैं मुझे ये पता नहीं था । मैंने मार्गरीटा को बताया की इन दिनों पितृपक्ष के चलते हिन्दू धर्मावलम्बी अपने पूर्वजों के श्राद्ध कर्म के लिए यहाँ आते हैं , इसलिए आपको रहने के स्थान ढूंढने में असुविधा हुई है , तो उसने हिन्दुओं के इस कर्मकांड के विवरण को ध्यानपूर्वक सुना और बोली कि भविष्य में गया आने पर पितृपक्ष के दिनों को ना चुनेगी । बोध गया , "गया" से कुछ दस किलोमीटर की दुरी पर है और गया शहर की तुलना में बोधगया ज्यादा साफ़ सुथरा स्थान है और चूँकि बौद्ध धर्मावलम्बियों का यह बड़ा पवित्र स्थल है इसलिए यहाँ विश्व के अनेक देशों ने बौद्ध मठ व मंदिर बनवाये हैं जिनमें श्रीलंका , कोरिया , जापान , जर्मनी और बांग्लादेश प्रमुख हैं । बोध गया में ही अशोक महान द्वारा निर्मित महाबोधि मंदिर है जो विश्व धरोहर में गिना जाता है । यह वही स्थल है जहाँ ज्ञान प्राप्त होने के बाद बुद्ध सात सप्ताह तक रहे थे । सम्राट अशोक ने भी ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में यहाँ स्तूप का निर्माण कराया था और छटी शताब्दी में गुप्त राजाओं ने इस स्तूप पर मंदिर बना दिया बाद में पाली राजाओं के समय यहाँ बुद्ध की मूर्ति भी स्थापित हो गयी। महाबोधि मंदिर में वे पवित्र सात स्थल हैं जहाँ बुद्ध ने सारनाथ जाने के पूर्व सात सप्ताह गुजारे थे । उनके नाम हैं "महाबोधि वृक्ष , अनिमिष लोकना कनकमण , रतनधार , अजपाला , मुकलिन्द झील , राज्यतना । बोधि वृक्ष जहाँ बुद्ध को ज्ञान मिला वह श्रीलंका के अनुराधापुरम से लाये वृक्ष की टहनी से पल्ल्वित है , जहाँ उसे अशोक की पुत्री संघमित्रा ही यहाँ से ले गयी थी ।
गया में जहाँ हम श्राद्ध कर्म के लिए गए थे , अति प्राचीन विष्णुपद मंदिर है , जो भारतीय पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान विष्णु द्वारा गयासुर के वध की कथा कहता है । हिंदुस्तान के अनेक मंदिरों की तरह इसका भी पुनुरुद्धार इंदौर की महारानी देवी अहिल्या ने सन 1787 में कराया था । फल्गु नदी , जिसे नीरांजना भी कहते हैं , के तट पर स्थित इस मंदिर और इसके प्रांगण में स्थापित वट वृक्ष के समीप ही लाखों लाख लोग सर मुंडाए अपने पूर्वजों के मोक्ष हेतु श्राद्ध और पिंडदान करते आप को दिख जायेंगे । लेकिन महाबोधि मंदिर में घूमते हुए जब मैंने देखा कि इस मंदिर के प्रांगण में भी मुकलिन्द झील के समीप ढेरों हिन्दू धर्मावलम्बी घुटमुंडे होकर बैठे पुरखों का तर्पण करते हुए श्राद्ध कर रहे हैं तो मैंने आश्चर्य में भर कर अपने गाइड से पूछा ये क्या है ? गाइड ने कहा ये श्राद्ध कर रहे हैं , क्योंकि इन दोनों पितृपक्ष चल रहा है । मैंने कहा भाई ये तो मैं जानता हूँ कि ये श्राद्ध कर रहे हैं , पर यहाँ महाबोधि मंदिर में क्यों ? गाइड ने कहा जी हाँ बुद्ध भी तो आखिर विष्णु के दस अवतारों में शामिल हैं । मैंने विस्मय से इस नज़ारे को देखा और मन ही मन इस विशाल ह्रदय संस्कृति को प्रणाम किया जो अपने परम प्रतिद्वंदियों को भी अपने में शामिल कर लेती है |