धीमे जहर का कारोबार, जिम्मेदार विभागों की चुप्पी और जनता की जिंदगी से खिलवाड़
लुटेरे किसी की जेब पर डाका डालते हैं, लेकिन मिलावटखोर लोगों की सेहत, संपत्ति और जिंदगी-तीनों को निशाना बनाते हैं। खाद्य पदार्थों में मिलावट का कारोबार केवल आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है। इसके बावजूद यदि जिम्मेदार विभागों की निगरानी कमजोर पड़ जाए और कार्रवाई महज कागजों तक सीमित रह जाए, तो ऐसे कारोबारियों के हौसले बुलंद होना स्वाभाविक है।
विदिशा जिले में खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता, शुद्धता और कथित मिलावट को लेकर प्रभावी निगरानी की जरूरत है। सवाल यह है कि जिन विभागों पर खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी है, वे इस दिशा में कितने गंभीर हैं? नियमित जांच, नमूनों की वैज्ञानिक परीक्षण प्रक्रिया और दोषियों के विरुद्ध समयबद्ध कार्रवाई के बिना मिलावट पर अंकुश लगाने के दावे कितने प्रभावी साबित होंगे?
मिलावटखोरी: मुनाफे के लिए सेहत से समझौता
खाद्य पदार्थों में मिलावट का सबसे भयावह पहलू यह है कि इसका शिकार कोई एक व्यक्ति नहीं, बल्कि पूरा समाज हो सकता है। दूध, घी, तेल, मसाले, मिठाइयां और अन्य खाद्य सामग्री में मिलावट उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है। कई मामलों में इसका असर तत्काल दिखाई नहीं देता, लेकिन लंबे समय तक दूषित या असुरक्षित खाद्य पदार्थों का सेवन स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याओं का कारण बन सकता है।
हत्यारा किसी व्यक्ति की जान लेता है और लुटेरा उसकी संपत्ति छीनता है, लेकिन मिलावटखोरी का दुष्परिणाम अनगिनत लोगों तक पहुंच सकता है। मिलावटखोर का ग्राहक कौन है, उसकी उम्र क्या है और उसका स्वास्थ्य कैसा है—इन बातों से उसे कोई सरोकार नहीं होता। उसके लिए सबसे बड़ा लक्ष्य मुनाफा होता है, चाहे उसकी कीमत आम आदमी की सेहत को ही क्यों न चुकानी पड़े।
समाजसेवा का मुखौटा और मुनाफे का खेल
मिलावटखोरी जैसी सामाजिक बुराई का एक चिंताजनक पहलू यह भी है कि किसी व्यक्ति की सार्वजनिक छवि और उसके कारोबारी आचरण में अंतर हो सकता है। समाजसेवा का प्रदर्शन किसी को कानून और नैतिक जिम्मेदारी से ऊपर नहीं कर देता। हालांकि, किसी व्यक्ति पर मिलावट का आरोप हो तो उसकी पुष्टि जांच और प्रमाणों के आधार पर ही होनी चाहिए।
समाज को भी यह समझना होगा कि वास्तविक समाजसेवा केवल मंचों पर सम्मान प्राप्त करने या सार्वजनिक कार्यक्रमों में दिखाई देने से नहीं होती। ईमानदारी से कारोबार करना, उपभोक्ताओं को शुद्ध खाद्य सामग्री उपलब्ध कराना और लोगों के स्वास्थ्य का सम्मान करना भी सामाजिक जिम्मेदारी का अहम हिस्सा है।
जिम्मेदार विभागों की जवाबदेही तय हो
खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए केवल छापेमारी की खबरें पर्याप्त नहीं हैं। जरूरी है कि नियमित निरीक्षण हो, संदिग्ध खाद्य पदार्थों के नमूने लेकर मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं में उनकी जांच कराई जाए और नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई की जाए। साथ ही, जांच और कार्रवाई की जानकारी सार्वजनिक होने से व्यवस्था में पारदर्शिता भी बढ़ सकती है।
यदि किसी क्षेत्र में मिलावट की शिकायतें लगातार सामने आती हैं, तो संबंधित अधिकारियों की भूमिका की भी समीक्षा होनी चाहिए। शिकायतों पर कार्रवाई में देरी, जांच में लापरवाही या दोषियों को अनुचित संरक्षण देने के प्रमाण मिलते हैं, तो जिम्मेदारी तय कर नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
सवाल बड़ा है: मिलावटखोरों पर शिकंजा कब कसेगा?
आम आदमी बाजार से खाद्य सामग्री खरीदते समय यह भरोसा करता है कि उसे जो दिया जा रहा है, वह सुरक्षित और शुद्ध है। इस भरोसे को तोड़ने वालों के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई करना प्रशासन और खाद्य सुरक्षा तंत्र की जिम्मेदारी है।
मिलावटखोरी के विरुद्ध लड़ाई केवल सरकार या किसी एक विभाग की नहीं, बल्कि पूरे समाज की है। उपभोक्ताओं को भी संदिग्ध खाद्य पदार्थों की शिकायत करनी चाहिए और बिना प्रमाण किसी पर आरोप लगाने से बचना चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर खाद्य पदार्थों की शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार व्यवस्था कितनी जवाबदेह बनेगी? मिलावटखोरों के विरुद्ध कानून का प्रभावी और निष्पक्ष इस्तेमाल कब होगा? और आम आदमी को शुद्ध भोजन का अधिकार केवल कागजों पर नहीं, बल्कि हकीकत में कब मिलेगा?
क्योंकि खाद्य पदार्थों में मिलावट महज मुनाफाखोरी नहीं, लोगों की जिंदगी से जुड़ा गंभीर मामला है। इस पर ढिलाई की कीमत पूरा समाज चुका सकता है।