आनंद कुमार शर्मा, पूर्व आईएएस
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घूमने फिरने का शौक मुझे शुरू से रहा है , इसलिए सरकारी नौकरी में जब भी मौका मिला ये अवसर मैंने कभी नहीं छोड़ा । जहाँ दूसरे साथी प्रशिक्षण या चुनाव के ड्यूटी में मामले में बचते फिरते थे मैं बड़े उत्साह से इसके लिए तैयार रहता था । इस आदत के चलते नार्थ ईस्ट के कुछ राज्यों को छोड़कर भारत के लगभग प्रदेशों का भ्रमण मैं कर चुका हूँ । विदेश की कसर थी , सो रिटायरमेंट के बाद सेवानिवृत साथियों के साथ विदेश भ्रमण के कोई मौके हम पति-पत्नी ने नहीं छोड़े , पर सच कहें तो हमारा देश ही इतनी प्राकृतिक विविधताओं और सौन्दर्य से भरा है कि उसे घूमना ही एक अद्भुत अनुभूति को जन्म देता है । सांस्कृतिक विविधता और उसकी भारतीय आत्मा के साथ साम्यता के अनुभव आप इन सुदूर प्रदेशों की यात्राओं में ही अनुभव कर पाते हो । जैसा की मैंने कहा यात्राओं के अवसर मैं नहीं छोड़ता , तो इससे जुड़ा एक किस्सा याद आ रहा है । उन दिनों मैं भोपाल में अनुसूचित जाति विभाग में आयुक्त के पद पर था और मेरे बैचमेट श्री डीडी अग्रवाल मध्यप्रदेश के माननीय राज्यपाल के सचिव के पद पर थे । एक दिन हम चाय पर बैठे थे तो मैंने उन्हें चढ़ाया कि भाई आप तो महामहिम के सचिव हो कहीं घूमने चलें और गवर्नर हाउस के गेस्ट हाउस में रुकें , तब तो कोई बात होगी । सीधे सरल डीडी भाई मन गए और हम सपरिवार सिक्किम की यात्रा पर निकल पड़े । सिक्किम के गवर्नर हाउस का गेस्ट हाउस सचमुच अद्भुत था , बड़ा ही सुंदर , और सर्दियों के लिए अपने रूम हीटर के साथ तैयार । जहाँ हम रुके वह संभवतः सिक्किम में रुकने के लिहाज़ से सबसे सुंदर और आरामदायक जगह थी । गवर्नर हाउस का प्रांगण था सो पूरा इतिहास और भौगोलिक जानकारी का प्रामाणिक विवरण भी देखने को मिला , और मुझे ये जानकार आश्चर्य हुआ कि सिक्किम एक ऐसा राज्य है जहाँ साक्षरता दर अत्यधिक है और प्रति व्यक्ति आय की दृष्टि से ये देश के पाँच प्रथम राज्यों में से है । एक और दिलचस्प तथ्य यह कि सिक्किम भारत में 1975 में शामिल हुआ था , उसके पहले 1948 से यह भारत का संरक्षित राज्य था , यानी विदेश नीति और रक्षा के कुछ मामलों को छोड़ , यहाँ हमारा कोई दख़ल नहीं था । सिक्किम की अपनी मुद्रा , अपना राजा और अपना प्रधानमंत्री होता था , यहाँ तक की तिब्बत और चीन जैसे पड़ोसी मुल्कों से इनका बेरोकटोक व्यापार होता था । लेकिन आमजन भारत देश से जुड़ना चाहते थे सो 1973 में एक प्रदर्शन राजशाही के ख़िलाफ़ चोंग्याल राजा के महल के सामने हुआ और चूँकि 1962 के चीन युद्ध के पश्चात हमारी सेना यहाँ मोर्चा सम्हाल चुकी थी तो तुरंत स्थिति को भारत सरकार ने सम्भाल लिया । बाद में एक वृहद जनमत सर्वे कराया गया कि लोग भारत में शामिल होना चाहते हैं या ऐसे ही राजशाही के अधीन रहना चाहते हैं और 97.5% लोगों ने भारत में शामिल होने के लिए वोट किया और 16 मई 1975 को सिक्किम भारत का 22 वाँ राज्य बन गया । गंगटोक जो की राज्य की राजधानी भी है , यहाँ का सबसे बड़ा शहर है । गंगटोक से 60 किलोमीटर की दूरी पर पश्चिमी भाग में छोंगु झील है जो बड़ी पवित्र मानी जाती है , और इससे कुछ ही दूरी पर बाबा हरभजन सिंह का मंदिर है जो वास्तव में फ़ौज में सिपाही थे और सत्तर के दशक में अपना फ़र्ज़ अदा करते शहीद हो गए थे । कहते हैं कि बॉडी मिली नहीं और उनके साथी को स्वप्न आया की फ़लाँ जगह उनका शव पड़ा है । सपने में बतायी जगह पर शरीर मिला और फिर उनकी याद में एक मंदिर बना दिया गया पर ये वास्तव में मंदिर नहीं है बल्कि एक प्रतीकात्मक चेकपोस्ट है जहाँ उनका ऑफ़िस , आराम करने का कमरा आदि सब है । किवदंती है कि आज भी वे सरहद की हिफ़ाज़त , घोड़े पे बैठ के करते , चीनी सैनिकों को दिखाई दे जाते हैं । आज भी इनकी तनख़्वाह इनके चेकपोस्ट पर ही ख़र्च होती है , और इस जगह पर मिलने वाले पानी को पीने से असाध्य रोग भी ठीक हो जाते हैं और ऐसी ना जाने कितनी कहानियाँ उन्हें सेल्यूट करते फ़ैज़ियों के पीछे लोग फुसफुसा कर सुनाते रहते हैं |
सिक्किम के उत्तरी भाग में यदि आप जाएँ तो लगेगा जैसे स्विट्जरलेंड में आ गए हैं , यहाँ लाचेन से कुछ दूर गरूडोंगमर नामक प्रसिद्ध झील है जो 17800 वर्गफीट की ऊँचाई पर तिब्बतन प्लेट्यू पर स्थित है और दुनिया की सबसे ऊँचाई पर स्थित झीलों में से एक है । इसका नाम बौद्ध धर्म के प्रसिद्ध भिक्षु गुरु पद्मसंभव के नाम पर रखा गया है ,जिन्होंने इस क्षेत्र और तिब्बत में बौद्ध धर्म की स्थापना की थी , ये आठवीं शताब्दी में यहाँ आए थे | यह सिक्खों और हिन्दुओं के लिए भी पवित्र स्थल माना जाता है । इतनी ऊँचाई पर जहाँ सब ओर बर्फ़ जमी हुई है इस झील का पानी तरल अवस्था में रहता है , जो प्रकृति का कमाल तो है ही पर इसके पीछे यह भी कथा है की गुरु नानकदेव ने जानवरों के पानी पीने की तकलीफ़ के मद्देनज़र इसके पानी को छू दिया था तबसे उनके स्पर्श के प्रभाव से इसके उस भाग का पानी नहीं जमता । उत्तर सिक्किम में ही लाचूँग है जहाँ से आगे युँमथोंग फ़्लॉवर वैली है यहाँ आप रोहदोरा ( क्रिसमस फ़्लॉवर ) नाम के दुर्लभ फूलों की चादर और गर्म पानी के सोतों से रूबरू होते हैं , उसके कुछ आगे ज़ीरो पोईंट है जहाँ बर्फ़ से ढके पर्वत आपका मन मोह लेते हैं ।
गंगटोक में हम श्री रविंद्र तैलंग से भी मिले जो सिक्किम केडर के आईएएस अधिकारी हैं और भोपाल के ही रहने वाले हैं । वे एक ज़िंदादिल इंसान हैं और प्रदेश से आने वाले हम जैसे परिचित लोगों से दिल खोल कर मिलते हैं । उन्होंने हमें बताया कि यहाँ के लोग यहाँ सीधे और आत्मसम्मानी हैं , आबादी का अधिकांश हिस्सा जनजातियों का है (37.5%) तो कल की चिंता करना यहाँ के लोगों में नहीं है । अच्छा खाना अच्छा पहनना यहाँ के लोगों का शौक़ है । यद्यपि यहाँ बोलचाल की भाषा नेपाली है लेकिन उत्तर पूर्वी अन्य प्रदेशों की तुलना में यहाँ लोग हिंदी ज़्यादा बेहतर बोलते और समझते हैं क्योंकि हिंदी यहाँ के स्कूलों में आठवीं कक्षा तक पढ़ाई भी जाती है | एक और बात कि यहाँ कभी अंग्रेज़ रहे नहीं तो कोई वर्गविभिन्नता जैसी नहीं है यानी छोटा कर्मचारी भी अपेक्षा रखता है की आप उससे आदर से पेश आओ । आम नागरिक सीधे सादे पर जागरूक हैं माने कोई कलेक्टर से मिलने आया है, मतलब आपको उससे मिलना ही पड़ेगा , आप उसे टाल नहीं सकते , क्यूँकि यदि आप नहीं मिलोगे तो वो सीएम से जाकर मिल लेगा , फिर सीएम आपको फ़ोन करेगा की आप लोगों से मिल क्यों नहीं रहे हो ? बाक़ी अपराध यहाँ ना के बराबर है , पहले तो एकदम नहीं था पर अब दस बारह साल से जबसे मैदानी भाग से लोग आने लगे हैं तब से कुछ चोरी चकारी शुरू हो गयी है | हम लोग सुन कर धीमे से झेंपे , मैंने विषय बदलने के लिहाज़ से कहा आप जब भी भोपाल आएँ तो हमें ज़रूर ख़बर करें।