प्रायः मनुष्यों की आसक्ति अपने द्वारा उपार्जित धन में होती है। जिसमें आसक्ति हो जो वस्तु अपने को अति प्रिय हो उसी वस्तु को अपने इष्ट को अर्पण करना चाहिए। शरीर, परिवार अति प्रिय होता है। इसी से उसे अर्पण करने पर राम राघव प्रसन्न हो जाते हैं। "दाता ग्रहीता" (अर्थात् लेने वाला) इस संबंध में राजा बलि और वामन भगवान का स्मरण करना चाहिए। वामन भगवान ने छल कपट किया। छोटे रूप से माँगा । नापते समय विशाल हो गये। सर्वस्व लेकर भी गरुड़ के द्वारा नागपाश में बाँध दिया पर बलि ने धैर्य नहीं छोड़ा। भगवान में दोष नहीं देखा। हमने सर्वस्व दान कर दिया। इसका अहंकार नहीं किया। पुण्य का अहंकार करने पर पुण्य नष्ट हो जाता है। राजा ययाति स्वर्ग में पहुँचे वहाँ देवताओं ने पूछा आपने कौन-कौन से पुण्य किए थे जिसके फलस्वरूप आपको स्वर्ग मिला। राजा ने अपने सब यज्ञों का अपने मुख से वर्णन किया। इससे राजा का पुण्य नष्ट हो गया। स्वर्ग से पृथ्वी पर गिर गये। अतः अपने मुंह से अपने पुण्य का वर्णन नहीं करना चाहिए।
पूज्य गुरुदेव श्री राजेंद्र दास जी महाराज
सूर श्याम गौशाला
परासोली, गोवर्धन,