एमपी धमाका, विदिशा
मप्र पंचायती राज अधिनियम एवं ग्राम स्वराज की धारा 89, 40 और 92 की शक्ति मप्र में पंचायत अधिनियम में संशोधन उपरांत के मप्र के समस्त CEO जिला पंचायत को सौंप दी गई है। लेकिन अर्ध न्यायिक प्रक्रिया के नाम पर इन मामलों की जानकारी आरटीआई में न देकर विदिशा जिला पंचायत जिले की ग्राम पंचायतों में हुए बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार को छिपाने का प्रयास कर रही है। अभी हाल ही में जिला पंचायत के सीईओ ने इसी आधार पर जानकारी देने से इंकार कर अपील खारिज कर दी। जबकि पारदर्शिता और भ्रष्टाचार को रोकने के लिए ये जानकारी दी जानी चाहिए।
इसलिए भ्रष्टाचार रोकने के लिए यह शक्ति कलेक्टर को दी जाना बहुत जरूरी है।
ग्राम पंचायतों, जनपद पंचायतों में जांच और निगरानी कार्यों की मॉनिटरिंग पंचायती व्यवस्था के सुपर विज़न के लिए मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत रखे गए हैं। सरपंच, सचिव और इंजीनियर और पंचायत विभाग से जुड़े हुए अधिकारी कर्मचारी सीईओ जिला पंचायत के अधीन में रहते हैं। सुबह से शाम तक यह कर्मचारी अधिकारी सीईओ जिला पंचायत के अधीन ही काम करते हैं। इसका मतलब यह हुआ की इनके अच्छे और भ्रष्ट दोनों कार्यों की जानकारी सीईओ जिला पंचायत के पास रहती है। जब गबन अनियमितता और भ्रष्टाचार की शिकायतें नागरिकों द्वारा की जाती हैं। उसकी जांच यही करवाते हैं। जांच में दोषी पाए जाने पर यदि जजमेंट की शक्ति भी उसी सजातीय विभाग/समूह और संस्था के अधिकारी अर्थात सीईओ जिला पंचायत को दे दी जाती है तो यह न्याय के नैसर्गिक सिद्धांत के बिलकुल विपरीत होगा। यदि पंचायतों में पहले भ्रष्टाचार और अनियमितता हुईं इसका मतलब जिला जनपद के वरिष्ठ अधिकारियों ने पर्याप्त मौक़ा दिया कि खूब जमकर भ्रष्टाचार हो तब जाकर भ्रष्टाचार हुआ अन्यथा यदि जिम्मेदारी ईमानदारी और निष्ठा से निगरानी तथा मोनिटरिंग होती तो ग्राम पंचायतों में इतना भ्रष्टाचार नहीं होता। अब वही मामला जब पंचायत अधिनियम की धारा 89 की सुनवाई (और तत्पश्चात धारा 40/92) के लिए सीईओ जिला पंचायत के पास आता है तो वह जनता के साथ क्या न्याय करेंगे? ग्राम पंचायतों में गरीब जनता और ग्रामीणों की मूलभूत बेसिक सुविधाओं सड़क, पानी, आवास अधोसंरचना विकास के लिए जनता के टैक्स से दिए जाने वाले पैसे का बंदरवाट हो रहा है और आरटीआई के तहत जानकारी रोकी जा रही है।
कलेक्टर को पूरे जिले का प्रभार रहता है। अतः कलेक्टर न्यायालय में धारा 89 की सुनवाई की शक्ति होने से कम से कम इतनी अपेक्षा की जाती है की कलेक्टर चूंकि सीधे पंचायतों से नहीं जुड़े होते हैं, अतः न्यायिक दृष्टि से वह सीईओ जिला पंचायत से बेहतर/रिलाएबल न्याय कर सकते हैं। लेकिन सीईओ जिला पंचायत के पास बिलकुल ही धारा 89 और 40/92 शक्तियां नहीं दी जानी चाहिए यह नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत के विरुद्ध होगा। मप्र में आज पंचायती राज व्यवस्था की जितनी दुर्दशा और भ्रष्टाचार है यह किसी से छुपा नहीं है।
यदि वास्तव में न्याय करना है तो न्यायिक सुनवाई की शक्तियां कलेक्टर को दी जाएं।