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पत्थर से एक प्रतिमा का प्रकट होना......

विजयमनोहर तिवारी
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"हर पत्थर में एक प्रतिमा छिपी होती है। एक कुशल शिल्पी यह जानता है कि उसे पत्थर का कौन सा हिस्सा काट, छीलकर अलग करना है। वह छैनी-हथौड़े का इस्तेमाल करता है। ठोकता-पीटता है। तब कहीं जाकर पत्थर में छिपी प्रतिमा प्रकट हो पाती है।'
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जो मध्यप्रदेश में रहते हैं, उनके लिए महेश श्रीवास्तव का नाम अपरिचित नहीं है। दैनिक भास्कर के संपादक वे तब रहे जब यह अखबार अपनी एक लंबी उड़ान शुरू करने की तैयारी में आया। वह 1984 का साल था। दिसंबर का यही महीना, जब यूनियन कार्बाइड से रिसी गैस ने पूरी दुनिया में इस शहर को बेहिसाब बदनामियाँ दीं। 

तब टीवी चैनल नहीं थे। अखबार ही आइना थे। केंद्र और राज्यों में कांग्रेस की अखंड सत्ताओं का बारहमासी मौसम बहार पर था। इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद 40 वर्षीय राजीव गाँधी विमान उड़ाते हुए अचानक बने प्रधानमंत्री थे, क्योंकि भारत के भावी प्रधानमंत्री कहे जाने वाले 34 वर्षीय सांसद संजय गाँधी की चार साल पहले विमान हादसे में मृत्यु हो गई थी और राहुल, प्रियंका का बाल्यकाल था। यानी वे किसी पद पर लाए नहीं जा सकते थे। मध्यप्रदेश में तब अपने राजनीतिक गांभीर्य के लिए प्रसिद्ध अर्जुन सिंह चार साल पुराने मुख्यमंत्री थे। 

विकट समय हो सामान्य, मीडिया से सहयोग की सरकारों की अपेक्षा हमेशा ही रही है। जनमानस में छवि और ज्यादा खराब न हो, गैस हादसे के मुश्किल दौर में मीडिया संतुलित बना रहे, तब अर्जुनसिंह सरकार भी यही चाहती थी। लेकिन दैनिक भास्कर में महेश श्रीवास्तव के पैने संपादकीय सरकार के लिए खटके। किसी भी सरकार के लिए खटकते। 

डीबी समूह के चेयरमैन स्वर्गीय रमेशचंद्र अग्रवाल अक्सर भोपाल में संपादकों की बैठकों में अखबार के जीवन में आए उस कठिन समय का स्मरण किया करते थे।  एक बार अर्जुन सिंह ने उन्हें बुलाया। वे अपने संपादक महेश श्रीवास्तव को साथ सीएम से मिलने गए। तब भोपाल में गैस हादसे में मारे गए हजारों बेकसूर लोगों, परिंदों और जानवरों की लाशें बिखरी हुई थीं। 

स्वाभाविक रूप से चार साल पुरानी अर्जुनसिंह सरकार कटघरे में थी। सरकार ने ऐसे कठिन समय में भास्कर से मदद की अपेक्षा की। बैठक से लौटकर रमेशजी ने महेशजी से मंत्रणा की। महेशजी ने कहा कि हमें ऐसे समय में जनता की आवाज रखनी चाहिए और ऐसा करके अखबार समाज में अपनी अकल्पनीय प्रतिष्ठा प्राप्त करेगा।

अधिक से अधिक सरकार क्या करेगी, विज्ञापन बंद करेगी, बिजली काटेगी, पानी कनेक्शन बाधित करेगी। जैसा कि इंडियन एक्सप्रेस के साथ इंदिराजी ने किया था। रमेशजी ने अपने एकाउंट सेक्शन से मंत्रणा करके हिसाब लगाया कि अगर सरकार सारे प्रतिबंध लगा देती है तो हम अपने बूते कितने महीने तक अखबार छाप सकते हैं। 

अंत में निर्णय हुआ कि दैनिक भास्कर केवल जनता का पक्ष लेगा। अर्जुनसिंह जैसे मुख्यमंत्री और कांग्रेस के किले से नेहरू परिवार के एकछत्र राजनीतिक साम्राज्य के शक्तिशाली समय में दो-ढाई शहरों से छपने वाला अखबार यह साहसपूर्ण निर्णय ले रहा था। 

मगर मैं यह सब आज क्यों लिख रहा हूं? 
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दरअसल कल ही महेश श्रीवास्तव 84 वर्ष के हुए हैं और उनके शिष्य मंडल ने भोपाल के अरेरा क्लब में एक दावत रखी। पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर, एनके सिंह और राजेंद्र शर्मा जैसे उनके समकालीन प्रतिष्ठित पत्रकारों की उपस्थिति में महेश श्रीवास्तव स्कूल के एलुमनाई अलीम बजमी, रवींद्र जैन और आरिफ मिर्जा जैसे अनेक शिष्य तीन घंटे के आयोजन में पुरानी स्मृतियों को कुरेदते रहे। 

महेश श्रीवास्तव ने अस्सी-नब्बे के दशक के अपने संपादकीय समय के किस्सों को अपने चुटीले अंदाज में सुनाया और टेलीविजन चैनलों के शोरगुल से दूर अखबारों का एक शांत समय स्मृतियों में कौंधता रहा। जैसे प्राचीन काल के आश्रमों और गुरुकुलों को याद किया जा रहा हो। 

महत्वपूर्ण बात यह थी कि सरकार के प्रति कठोर संपादकीय लिखते रहने के बावजूद अर्जुनसिंह ने कभी दैनिक भास्कर या महेश श्रीवास्तव के प्रति कोई दुराभाव नहीं रखा। मन में कोई गाँठ बांधकर नहीं बैठे। बल्कि जब वे अपनी आत्मकथा लिख रहे थे तब महेशजी से भी कुछ लिखने का निवेदन किया। महेशजी ने अपने कॉलम पर छपी एक किताब उन्हें भेजी, जो उनके देहावसान के बाद उनकी लाइब्रेरी में पाई गई। अर्जुनसिंह ने उस किताब के कुछ पन्नों पर अपनी टिप्पणियाँ लिखी हुई थीं। 

मैं माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय में अपनी पढ़ाई करके अधिक समय भोपाल में नहीं रहा और नईदुनिया इंदौर चला गया। वहाँ रवींद्र शुक्ला जैसे वरिष्ठ पत्रकारों से राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी के समय के किस्से सुने, जो कभी उसी हॉल में बैठा करते थे, जहाँ एक कुर्सी मुझे मिली। 2006 में लौटकर भोपाल आया तो अलीम बजमी और राजेश चंचल जैसे पुराने पत्रकारों से महेश श्रीवास्तव के समय के वैसे ही किस्से सुने। 

रामायण और महाभारत के प्रसंगों को वर्तमान राजनीतिक-प्रशासनिक घटनाक्रमों में गूँथकर एक संग्रहयोग्य संपादकीय लिखने में महेश श्रीवास्तव का कोई मुकाबला नहीं था। जब दूसरी बार अर्जुनसिंह मुख्यमंत्री बने तो कांग्रेस की भावी राजनीति में स्वयं को असुरक्षित मानकर राजीव गाँधी ने उन्हें कतई बर्दाश्त नहीं किया और तत्काल पंजाब का राज्यपाल बनाकर उनका कद छोटा करने का प्रयास किया। एक नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री को अकारण राज्यपाल बनाने का ऐसा शायद पहला ही निर्णय था। कांग्रेस के किले में परिवार के लिए कभी कुछ भी असंभव नहीं था। तब महेश श्रीवास्तव ने दो संपादकीय लिखे। दूसरे संपादकीय का शीर्षक था-"हे अर्जुन, हर मनुष्य अपने कर्मों का फल भोगता है।'

मुझे याद है कि पत्रकारिता की पढ़ाई के पहले दैनिक भास्कर में पत्र संपादक के नाम में अक्सर मेरे पत्र छपते थे। मध्यप्रदेश में अपनी पत्रकारीय यात्रा आरंभ करने वाले मुझ जैसे अनेक पत्रकारों ने कभी महेश श्रीवास्तव सर के साथ काम नहीं किया। मगर उनकी कलम "डिस्टेंस लर्निंग' के रूप में हमें नए-नए पाठ सिखाती रही। इंदौर से भोपाल लौटने के बाद उनसे मेरा निरंतर संपर्क रहा। अपनी कुछ किताबें उन्हें बड़े ही संकोच के साथ दीं। वे मोबाइल पर अक्षर टाइप नहीं कर पाते लेकिन बाकायदा अपने लैटरहेड पर चिट्ठी लिखकर उसका फोटो व्हाट्सएप पर डालकर मार्गदर्शन करते हैं। 

हम जो भी भविष्य में बनते हैं, उस भवन में लगी ईंटों में बहुतों के प्रत्यक्ष और परोक्ष योगदान होते हैं। अरेरा क्लब की सभा में मंच की ओर कुछ विभूतियाँ ऐसी ही थीं। महेशजी के अलावा विजयदत्त श्रीधर, राजेंद्र शर्मा और एनके सिंह जिनके पास नई पीढ़ी को सिखाने के लिए बहुत कुछ है। आप केवल कुछ देर उनके निकट बिताइए और दो-चार मोती बटोरकर ही लौटेंगे। हम जैसों ने इन घाटों पर डुबकी भी लगाई है और आचमन भी किए हैं। वे पत्रकारिता के एक ऐसे श्रेष्ठ समय के मानक हैं, जो अब शायद ही कभी लौटे।

महेशजी को शतायु देखने की मंगलकामना सबने की।

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