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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस विशेष...मैं आज की वुमनिया हूं...! मंजुला दूसी..

सबल हूं, सक्षम हूं, अद्वितीय हूं, अद्भुत हूं
लेकिन किंतु परंतु की दीवारोंं को तोड़
हर दिन एक नई मिसाल कायम करती हूं..
मैं आज की वुमनिया हूं..!
कहीं घूंघट तो कहीं हिजाब में लिपटी हुई  
कल आज और कल का
बेजोड़ संगम हूं.. 
मैं आज की वुमनिया हूं        
कभी सवाल हूं तो कभी 
कई सवालों के जवाब हूं.. 
गीता हूं, कुरान हूं
अगर पढ़ सको मुझे 
तो खुली किताब हूं  
मैंआज की वुमनिया हूं..! 
कभी हंसती खिलखिलाती
कभी अपना दर्द छुपाती
माँ ,बहन, बेटी,पत्नी हर किरदार बखूबी निभाती
हर स्त्री का प्रतिबिंब हूं.. 
मैं आज की वुमनिया हूं..! 
अगर घर सम्हालती हूं 
तो चाँद को छूकर आने 
का भी जज्बा रखती हूं. 
अपनी संस्कृति अपनी तहजीब 
को सम्हाले हुए, नए जमाने से
कदम से कदम मिला कर चलती हूं 
मै आज की वुमनिया हूं..!
परवाह है मुझे सबकी, सबकी फिक्र भी करती हूँ
सबके सपनो के संग संग एक कदम अपने सपनों की ओर भी बढ़ती हूं..
बेचारी नहीं हूं अब न मैं अबला हूं 
मैं आज की वुमनिया हूं..!

मंजुला दूसी, हैदराबाद 

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