भोपाल रेफर प्रसूति महिलाओं समेत निरीक्षण की जानकारी देने में आनाकानी कर रहा स्वास्थ्य विभाग
दीपक तिवारी, विदिशा
भ्रष्टाचार रोकने, अफसरों की जवाबदेही तय करने और सरकारी कामों में पारदर्शिता रखने के लिए बने आरटीआई कानून का पालन करने में अधिकारी भारी लापरवाही बरत रहे हैं। जिसके चलते सूचना आयोग में लंबित अपीलों की संख्या बढ़ रही है। हालत यह है कि अधिकारियों को ना प्रथम अपील अधिकारियों का डर है और ना सूचना आयोग की परवाह है। जिसके चलते अधिकारी सूचना का अधिकार अधिनियम में मनमानी कर रहे हैं। आरटीआई के प्रावधानों को ताक पर रखकर आम नागरिक के आरटीआई कानून को चुनौती दी जा रही है।
सिविल सर्जन विदिशा से भोपाल रिफर प्रसूति महिलाओं की जानकारी तीन साल पूर्व मांगी गई थी। मामले का निराकरण ना होने पर राज्य सूचना आयोग में अपील की गई थी। 3 साल पुराने इस मामले में सिविल सर्जन ने रस्म अदायगी करते हुए ऐसे क्लर्क को सूचना आयोग की सुनवाई में भेज दिया जिसे प्रकरण का कोई ज्ञान नहीं था। मुख्य सूचना आयुक्त ने इस मामले में गहरी नाराजगी जताते हुए सिविल सर्जन को दस्तावेज लेकर खुद हाजिर होने का आदेश दिया है। मामले की आगामी सुनवाई 17 मार्च को है।
भोपाल रेफर प्रसूता महिलाओं की मांगी थी जानकारी
अपीलार्थी ने श्रीमंत माधवराव सिंधिया जिला चिकित्सालय विदिशा के लोक सूचना अधिकारी से भोपाल रेफर प्रसूति महिलाओं की सूची मांगी थी। तत्कालीन सिविल सर्जन संजय खरे द्वारा सभी बिंदुओं का निराकरण नहीं किए जाने पर पहले प्रथम अपील और फिर सूचना आयोग में द्वितीय अपील की गई थी।
3 साल के लंबे इंतजार के बाद सूचना आयोग में सुनवाई हुई। जिसमें सिविल सर्जन द्वारा खानापूर्ति करने का प्रयास किया गया।
आरटीआई से उड़ी सिस्टम में बैठे लोगों की नींद
भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 एक ऐसा मील का पत्थर है, जिसने पहली बार आम नागरिक को सत्ता के गलियारों में झांकने की ताक़त दी। इस अधिनियम के लागू होते ही देशभर में जागरूक नागरिकों ने सरकारी भ्रष्टाचार, पद के दुरुपयोग और अवैध निर्णयों को उजागर करना शुरू किया।
धीरे-धीरे जब भ्रष्टाचारियों की परतें खुलने लगीं, तब सिस्टम में बैठे अनेक लोगों की नींद उड़ गई।
आज स्थिति यह है कि लोक सूचना अधिकारी अपने वैधानिक कर्तव्यों से विमुख हो चुके हैं अधिनियम की स्पष्ट परिभाषाओं को मनमाने ढंग से तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है।
लोक सूचना अधिकारियों को न दण्ड का भय है न अधिनियम की मर्यादा का। प्रथम अपीलीय अधिकारी स्वयं ढाल बनकर दोषी लोक सूचना अधिकारियों को बचा रहे हैं। सूचना आयोग, जहां से जवाबदेही सुनिश्चित होनी चाहिए, वहां दंड वसूली नहीं हो पा रही।
यह भी सामने आ रहा है कि जिन पीआईओ पर शास्ति और दाण्डिक कार्यवाही अनिवार्य है, उन्हें संरक्षण दिया जा रहा है। ऐसे अधिकारी, जिनके पास विधिक ज्ञान नहीं, आवश्यक योग्यता नहीं, उन्हें निर्णयकारी पदों पर बैठाया गया है।
चारों ओर से ऐसा प्रतीत होता है कि आरटीआई अधिनियम को अपंग बनाकर समाप्त करने का प्रयास जारी है।