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पंजाब-हरियाणा के वर्चस्व को चुनौती, किसान हितों की नई राजनीति गढ़ रहे डॉ मोहन यादव


 
देश का नया अन्न भंडार बनता मध्यप्रदेश
कृष्णमोहन झा/

देश में जब भी सरकारी गेहूं खरीदी की चर्चा होती थी तो सबसे पहले पंजाब और हरियाणा का नाम लिया जाता था। हरित क्रांति के बाद इन दोनों राज्यों ने दशकों तक देश की खाद्य सुरक्षा की रीढ़ के रूप में अपनी भूमिका निभाई। बाद के वर्षों में राजस्थान और उत्तरप्रदेश भी इस व्यवस्था का हिस्सा बने, लेकिन आज जिस राज्य ने सबसे तेज़ी से अपनी स्थिति मजबूत की है, वह मध्यप्रदेश है।
10 मई 2026  तक मध्यप्रदेश में गेहूं खरीदी के जो आंकड़े सामने आए हैं, वे केवल प्रशासनिक सफलता की कहानी नहीं कहते, बल्कि यह संकेत भी देते हैं कि प्रदेश अब राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा व्यवस्था का नया केंद्र बनता जा रहा है।
अब तक राज्य में 14 लाख 82 हजार 865 स्लॉट आरक्षित  किए जा चुके हैं। 10 लाख 959 किसानों ने अपनी उपज बेची है। कुल 63 लाख 19 हजार 675 मीट्रिक टन गेहूं की खरीदी हो चुकी है। राज्य की अधिकतम खरीदी क्षमता 1 करोड़ 22 लाख 28 हजार 122 मीट्रिक टन तक पहुंच चुकी है। किसानों को अब तक 11 हजार 623 करोड़ 43 लाख रुपये का भुगतान किया जा चुका है। केवल एक दिन पहले ही *55 हजार 380 किसानों से 4 लाख 86 हजार 368 मीट्रिक टन गेहूं खरीदा गया।
इन आंकड़ों की तुलना यदि अन्य राज्यों से की जाए तो मध्यप्रदेश की उपलब्धि और अधिक स्पष्ट हो जाती है। पंजाब में इस वर्ष लगभग 122 लाख मीट्रिक टन  गेहूं खरीदी का लक्ष्य रखा गया है और वह अभी भी देश में शीर्ष पर है। हरियाणा में लगभग 70 लाख मीट्रिक टन के आसपास खरीदी हो रही है। राजस्थान का लक्ष्य लगभग 21 लाख मीट्रिक टन  है, जबकि उत्तरप्रदेश लगभग 10 लाख मीट्रिक टन  के आसपास है। बिहार, गुजरात, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में सरकारी गेहूं खरीदी बेहद सीमित है।
स्पष्ट है कि पंजाब के बाद यदि कोई राज्य सबसे तेज़ी से अपनी भूमिका मजबूत कर रहा है तो वह मध्यप्रदेश है।
पहले केंद्र सरकार ने मध्यप्रदेश के लिए 78 लाख मीट्रिक टन गेहूं खरीदी का लक्ष्य निर्धारित किया था, लेकिन मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव के लगातार प्रयासों के बाद यह लक्ष्य बढ़ाकर एक करोड़ मीट्रिक टन* कर दिया गया। यह केवल आंकड़ों में वृद्धि नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि केंद्र सरकार को मध्यप्रदेश की कृषि क्षमता और यहां की खरीदी व्यवस्था पर भरोसा है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मुख्यमंत्री केवल बैठकों और घोषणाओं तक सीमित नहीं हैं। वे लगातार खरीदी केंद्रों का औचक निरीक्षण कर रहे हैं। खरगौन के कतरगांव से लेकर शाजापुर के मकोड़ी तक उनका अचानक पहुंचना यह संदेश देता है कि सरकार किसान हितों के मामले में किसी प्रकार की लापरवाही स्वीकार नहीं करेगी।
उन्होंने स्वयं तौल व्यवस्था देखी, बारदाने की उपलब्धता की समीक्षा की, किसानों से सीधा संवाद किया और अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि किसानों को किसी प्रकार की परेशानी नहीं होनी चाहिए। खरीदी अवधि बढ़ाने का निर्णय भी इसी संवेदनशीलता को दर्शाता है।
यह सक्रियता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मध्यप्रदेश वर्ष 2017 के मंदसौर किसान आंदोलन के राजनीतिक प्रभाव को भूल नहीं सकता। उस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया था कि किसान केवल घोषणाओं से संतुष्ट नहीं होता। उसे समय पर खरीदी, समय पर भुगतान और सम्मानजनक व्यवहार चाहिए।
मोदी सरकार द्वारा मध्यप्रदेश को बढ़ा हुआ खरीदी लक्ष्य दिया जाना और राज्य सरकार की लगातार जमीनी निगरानी यह दर्शाती है कि केंद्र और राज्य के बीच बेहतर समन्वय है।
आज जब कई राज्यों में किसान खरीदी व्यवस्था को लेकर शिकायत कर रहे हैं, तब मध्यप्रदेश एक सफल मॉडल के रूप में उभर रहा है। यदि यही गति बनी रही तो आने वाले वर्षों में मध्यप्रदेश केवल देश का सबसे बड़ा गेहूं उत्पादक राज्य ही नहीं, बल्कि सबसे बड़ा सरकारी गेहूं खरीदी राज्य भी बन सकता है।
यह केवल कृषि क्षेत्र की उपलब्धि नहीं होगी, बल्कि मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव के नेतृत्व की एक बड़ी प्रशासनिक और राजनीतिक सफलता के रूप में भी दर्ज होगी।
(लेखक राजनैतिक विश्लेषक है)

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