पिछले कुछ सालों से विजय जी को जानने वाले उन्हें मध्यप्रदेश के पूर्व सूचना आयुक्त, पंडित माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर या लेखक के रूप में जानते हैं। पर सालों से उन्हें जानने वाले यायावर पत्रकार के रूप में ही याद करते हैं । मैं भी उन्हें उसी रूप में जानता हूँ । जिन वर्षों में विजय जी भोपाल दैनिक भास्कर में रिपोर्टिंग कर रहे थे, उन्हीं वर्षों में मैं भी छत्तीसगढ़ में रिपोर्टिंग कर रहा था। लेकिन हम क्या ही खबरें कर रहे थे, जले, कटे, मरे और रैली-जुलूस । उधर विजय सर कभी तमिलनाडु के किसी मंदिर की चमत्कारी स्टोरी करते तो कभी डूबते हरसूद पर मार्मिक स्टोरियों की झड़ी लगा देते । अगले दिन श्रीलंका में नयी अयोध्या ढूंढ निकालते। उन्होंने बताया कि ‘पाँच साल की अपनी रोमिंग पत्रकारिता के दौरान मैं क़रीब आठ बार पूरा देश घूम चुका और शायद ही ऐसा कोई एयरपोर्ट बचा होगा, जहां मैं नहीं उतरा।‘ अपनी यात्राओं के नॉस्टेल्जिया के बारे में वे कहते हैं कि ‘मैं अजीब तरह की मनोदशा में चला गया गया था, मदुरै की सातवीं यात्रा के बाद जब मैं भोपाल वापस जाने के लिए होटल पहुँचा तो लगा कि मैं क्यों लौट रहा हूँ, यहीं क्यों नहीं रह जाता।‘ वे बताते हैं कि इस स्थिति से उबरने के लिए उन्हें मनोविज्ञानी दोस्त से बात करनी पड़ी। पाँच साल के बाद भास्कर प्रबंधन से उन्होंने इस यायावरी से अवकाश देने का आग्रह किया और ब्रेक के लिए गाँव चले गए। डेढ़ बर्ष में उन्होंने अपने खेतों को सँभाला और उन्हें इस लायक बना दिया कि आज अमरूद की सबसे अच्छी क़िस्म उनके यहाँ होती है और वे टनों अमरूद देश के बाजारों में सप्लाई करते हैं । पर उनकी पत्रकारिता खत्म नहीं होनी थी । उन्हें भास्कर प्रबंधन ने फिर एक बार अयोध्या के राम मंदिर स्थापना से पहले वहां की विशेष रिपोर्टिंग का टॉस्क दिया। वे क़रीब डेढ़ महीने अयोध्या रहे और दिल को छू लेने वाली स्टोरीज़ की । इस दौरान उन्होंने राजा दशरथ की समाधि से लिखा कि ‘ श्री राम पूरे संसार के हुए लेकिन अपने पिता के हिस्से सबसे कम आए।’
बहरहाल विजय सर कल IBC24 के स्टूडियो आए और देर तक हम उनके क़िस्सों में डूबे रहे। मैंने हेडिंग में उन्हें फील्ड रिपोर्टिंग के शहंशाह इसलिए लिए लिखा है क्योंकि इसी समय मुझे उनकी कर्नाटक में की गई एक रिपोर्ट ‘शब्दों के शहंशाह ‘ याद आ गई।
(विजय सर माखनलाल यूनिवर्सिटी के छात्र रहे हैं और अब वहीं कुलगुरु हैं। ख़ुशक़िस्मती से मैं उसी यूनिवर्सिटी में उनका जूनियर रहा हूँ)
डॉ विश्वेश ठाकरे की फेसबुक पोस्ट