– संदीप रिछारिया
पिछले तीन वर्षों से विश्व का परिदृश्य अभूतपूर्व अस्थिरता, संघर्ष और अनिश्चितता से घिरा हुआ है। रूस-यूक्रेन युद्ध से शुरू हुई अशांति की लपटें आज मध्य-पूर्व, अफ्रीका और एशिया के कई क्षेत्रों तक फैल चुकी हैं। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के अनुसार विश्व के पचास से अधिक देश प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से युद्ध, गृहयुद्ध, आतंकवाद अथवा सैन्य संघर्षों से प्रभावित हैं। कहीं मिसाइलें बरस रही हैं, कहीं आर्थिक प्रतिबंधों का दंश है, तो कहीं जातीय और धार्मिक संघर्षों ने सामान्य जनजीवन को तहस-नहस कर दिया है।
जो देश सीधे युद्ध में शामिल नहीं हैं, वे भी इसके दुष्परिणामों से अछूते नहीं रह पाए हैं। वैश्विक सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई है। खाद्यान्न, ऊर्जा, औद्योगिक कच्चे माल और आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता पर संकट गहराया है। महंगाई ने विकसित और विकासशील दोनों प्रकार की अर्थव्यवस्थाओं को झकझोर दिया है। करोड़ों लोग अपने घरों से विस्थापित हुए हैं, लाखों परिवार शरणार्थी जीवन जीने को विवश हैं और अनगिनत बच्चों का भविष्य युद्ध की विभीषिका में धूमिल होता दिखाई दे रहा है।
मानव सभ्यता के इतिहास में यह पहली बार नहीं है जब युद्धों ने संसार को संकट में डाला हो, किंतु आज की वैश्विक व्यवस्था में एक देश का संकट पूरे विश्व को प्रभावित कर रहा है। यही कारण है कि दुनिया के सामने केवल युद्ध रोकने की चुनौती नहीं है, बल्कि स्थायी शांति और वैश्विक विश्वास को पुनर्स्थापित करने की चुनौती भी है।
ऐसे समय में जब अनेक देशों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा मध्यस्थता के प्रयास अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं कर सके, तब विश्व समुदाय की दृष्टि स्वाभाविक रूप से भारत की ओर गई है। अमेरिका, रूस, यूरोप, अरब देशों और एशियाई शक्तियों के शीर्ष नेताओं की भारत यात्राएं बढ़ी हैं। विश्व मंचों पर भारत की भूमिका पहले की तुलना में कहीं अधिक प्रभावशाली और निर्णायक दिखाई दे रही है।
इसके पीछे केवल भारत की आर्थिक या सामरिक शक्ति नहीं है, बल्कि वह नैतिक विश्वसनीयता भी है जिसे भारत ने दशकों की विदेश नीति और सभ्यतागत दृष्टि से अर्जित किया है। भारत ने किसी सैन्य गुट का हिस्सा बनने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों और वैश्विक संतुलन को प्राथमिकता दी। गुटनिरपेक्षता की भावना, जिसे कभी कई लोग अप्रासंगिक मानने लगे थे, आज पुनः विश्व राजनीति में प्रासंगिक होती दिखाई दे रही है।
भारत न तो युद्ध का समर्थक है और न ही किसी राष्ट्र की संप्रभुता के उल्लंघन का। उसने सदैव संवाद, कूटनीति और सहअस्तित्व को प्राथमिकता दी है। यही कारण है कि भारत आज उन कुछ देशों में शामिल है जिनसे लगभग सभी पक्ष संवाद करने को तैयार दिखाई देते हैं। भारत रूस से भी बात कर सकता है और अमेरिका से भी। वह इजरायल के साथ भी संबंध रखता है और अरब जगत के साथ भी। यही संतुलन आज उसकी सबसे बड़ी शक्ति बनकर उभरा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बार-बार दोहराया गया यह कथन कि “यह युद्ध का युग नहीं है”, केवल एक राजनीतिक वक्तव्य नहीं बल्कि भारत की हजारों वर्षों पुरानी सांस्कृतिक चेतना का प्रतिबिंब है। यह वही चेतना है जिसने संसार को “वसुधैव कुटुम्बकम्” का संदेश दिया। यह वही दृष्टि है जो शक्ति और शांति के बीच संतुलन स्थापित करने की बात करती है।
लेकिन जब हम विश्व की इस उथल-पुथल को देखते हैं तो एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या केवल राजनीतिक समझौते और कूटनीतिक प्रयास ही विश्व को स्थायी शांति दे सकते हैं? क्या युद्ध की जड़ें केवल सीमाओं और संसाधनों के विवादों में हैं, या इसके पीछे मनुष्य के भीतर बढ़ता असंतोष, अहंकार, भय और असुरक्षा भी है?
यहीं पर भारत की आध्यात्मिक परंपरा और विशेष रूप से चित्रकूट जैसे तपोभूमि का महत्व सामने आता है।
चित्रकूट केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है। यह भारतीय चिंतन की एक जीवंत प्रयोगशाला है। यह वह भूमि है जहां मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने वनवास का एक महत्वपूर्ण काल बिताया। यह वह धरती है जहां महर्षि अत्रि, माता अनसूया, महर्षि वाल्मीकि, महर्षि मार्कण्डेय और असंख्य ऋषि-मुनियों ने तपस्या और चिंतन के माध्यम से मानव जीवन के गहन प्रश्नों के उत्तर खोजे।
चित्रकूट का इतिहास हमें बताता है कि जब-जब समाज संकट में पड़ा, तब-तब यहां के चिंतन ने नई दिशा प्रदान की। श्रीराम स्वयं राजसत्ता के संघर्षों और पारिवारिक संकटों के बीच चित्रकूट आए। यहां उन्होंने शक्ति नहीं, बल्कि धैर्य को चुना। प्रतिशोध नहीं, बल्कि मर्यादा को चुना। संघर्ष नहीं, बल्कि समन्वय का मार्ग अपनाया।
भरत और राम का मिलन चित्रकूट में हुआ। यह केवल दो भाइयों की भेंट नहीं थी, बल्कि सत्ता और त्याग, अधिकार और कर्तव्य, भावनाओं और मर्यादा के बीच संतुलन का एक अद्वितीय उदाहरण था। आज जब विश्व सत्ता की होड़ में उलझा हुआ है, तब चित्रकूट हमें सिखाता है कि वास्तविक नेतृत्व अधिकार से नहीं, बल्कि त्याग और सेवा से उत्पन्न होता है।
चित्रकूट का चिंतन यह भी बताता है कि बाहरी संघर्षों का समाधान तभी संभव है जब मनुष्य अपने भीतर की अशांति को शांत करे। युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं होते, वे पहले मनुष्य के मन में जन्म लेते हैं। ईर्ष्या, भय, लोभ और अहंकार जब सामूहिक रूप लेते हैं, तब वे युद्ध का रूप धारण कर लेते हैं।
आज विश्व में तकनीकी प्रगति अपने चरम पर है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष अनुसंधान, डिजिटल क्रांति और आधुनिक विज्ञान ने मानव जीवन को अभूतपूर्व सुविधाएं प्रदान की हैं। लेकिन इसके बावजूद मनुष्य के भीतर असुरक्षा और तनाव बढ़ता जा रहा है। इसका कारण यह है कि भौतिक विकास के साथ आध्यात्मिक और नैतिक विकास का संतुलन नहीं बन पाया है।
चित्रकूट इसी संतुलन का संदेश देता है। यहां तप है, लेकिन पलायन नहीं। यहां त्याग है, लेकिन निराशा नहीं। यहां आध्यात्मिकता है, लेकिन समाज से दूरी नहीं। यहां जीवन को समग्रता में देखने की दृष्टि है।
विश्व के अनेक विचारक आज यह स्वीकार करने लगे हैं कि केवल आर्थिक समृद्धि से शांति संभव नहीं है। समाज को नैतिक मूल्यों, करुणा और मानवीय संवेदनाओं की भी आवश्यकता है। यही वे तत्व हैं जो भारतीय संस्कृति और विशेष रूप से चित्रकूट की परंपरा में सहज रूप से विद्यमान हैं।
जब दुनिया युद्ध की आग में झुलस रही हो, तब चित्रकूट का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। यह संदेश है—संवाद का, समन्वय का, आत्मचिंतन का और मानवता के प्रति करुणा का। यह संदेश बताता है कि शक्ति का उद्देश्य विनाश नहीं, संरक्षण होना चाहिए। नेतृत्व का उद्देश्य प्रभुत्व नहीं, लोककल्याण होना चाहिए।
आज आवश्यकता इस बात की है कि विश्व केवल भारत की आर्थिक और सामरिक शक्ति को ही न देखे, बल्कि उसकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक चेतना को भी समझे। क्योंकि भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसके हथियारों में नहीं, बल्कि उसके विचारों में निहित है। और उन विचारों की सबसे सशक्त अभिव्यक्तियों में से एक चित्रकूट है।
संभव है कि आने वाले वर्षों में विश्व व्यवस्था और अधिक परिवर्तनशील हो। नई चुनौतियां सामने आएं, नए संघर्ष जन्म लें और नए शक्ति केंद्र उभरें। लेकिन यदि मानवता को स्थायी शांति का मार्ग खोजना है, तो उसे केवल युद्ध विराम से आगे बढ़कर आत्मचिंतन की दिशा में भी कदम बढ़ाने होंगे।
चित्रकूट की धरती हमें यही सिखाती है कि बाहरी विजय से पहले आंतरिक विजय आवश्यक है। संसार को जीतने से पहले स्वयं पर विजय प्राप्त करनी होगी। और शायद यही वह संदेश है जिसकी आज के युद्धग्रस्त विश्व को सबसे अधिक आवश्यकता है।
युद्ध की विभीषिका के बीच यदि मानवता को कोई स्थायी प्रकाश दिखाई देता है, तो वह शक्ति और शांति के संतुलन, विकास और मूल्यों के समन्वय तथा चिंतन और करुणा की उस परंपरा में है, जिसका प्रतिनिधित्व भारत और विशेष रूप से चित्रकूट सदियों से करता आया है।
यही कारण है कि जब विश्व युद्ध की आग में झुलस रहा है, तब चित्रकूट का चिंतन केवल भारत की धरोहर नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता की आवश्यकता बनकर उभर रहा है।