विजयमनोहर तिवारी
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यह भारत के निर्माण, विध्वंस और पुनर्निर्माण की हैरान कर देने वाली तस्वीरें हैं। मंदिरों का तोड़ा जाना और वापस उसी जगह पर फिर से मंदिरों को खड़ा करने की संघर्ष भरी दुखद कहानी अभी की नहीं है। लेकिन विदिशा जिले की यह जगह ऐसे हर विध्वंस और निर्माण में सबसे अलग और खास है...
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पठारी, जिला विदिशा, मध्यप्रदेश।
विदिशा जिले में दो ढाई हजार सालों के स्मारक आज भी बचे हुए हैं। सहेजे हुए क्या है, किस्मत से बचे रह गए हैं और इतनी संख्या में इतने विशाल हैं कि सदियों के विनाशकारी थपेड़ों के बावजूद खड़े रह गए हैं।
इन तस्वीरों को बहुत ध्यान से देखिए। ये विदिशा से 60 किलोमीटर दूर पत्थर की खदानों से भरपूर पहाड़ी क्षेत्र पठारी की हैं।
24 तीर्थंकरों के ये मंदिर आठवीं सदी के बने हुए बड़े ही भव्य रहे होंगे। चार पाँच सौ सालों तक इलाके में इनकी रौनक रही होगी। ये 11 वीं सदी के परमारकालीन उदयपुर के प्रसिद्ध मंदिर से भी पुराने हैं, जो यहाँ से 20 किलोमीटर ही है।
मिनहाज सिराज की डायरी के अनुसार इस इलाके में पहला भीषण इस्लामी हमला 1234-35 का है। शम्सुद्दीन इल्तुतमिश के लुटेरों ने विदिशा का विजय मंदिर मिटाया और एक लंबी मुहिम के तहत आसपास के मंदिरों को भी तोड़ा। 1291 में अलाउद्दीन खिलजी का विदिशा पर हमला है। हो सकता है कि पठारी के ये मंदिर उसके समय टूटे हों। बाद में मुगलों के अंत तक यह इलाका लगातार पिसा है, क्योंकि दिल्ली-आगरा से लूटमार के लिए उनके जत्थे देवगिरी और वारंगल की लूट के लिए यहीं से गुजरते थे।
इन्हीं में से किसी एक हमले में या बार-बार के हमलाों में इन्हें बुरी तरह तोड़कर मलबे में बदला गया। मलबे के ढेर में ये मंदिर और मूर्तियाँ नामालूम कब तक पड़े रहे होंगे। मगर यहाँ का संपन्न समाज इस तबाही पर चुप तो बैठा रहा मगर अपनी बारी के इंतजार में। बुंदेलखंड का इलाका एक समय जैन संस्कृति से समृद्ध रहा है। यह भी उसी समृद्ध समय के प्रमाण हैं।
हम नहीं जानते कि मलबे के ढेर से किसी सदी में उन्हीं खंडित मूर्तियों को फिर से खड़ा किया गया। सब कुछ खंडित है। दीवारों पर कहीं के टुकड़े कहीं लगे हैं। मूर्तियों के चेहरे और हाथ-पैर जिस ढंग से तोड़े गए हैं, वह पैटर्न बताता है कि ये कारनामे किन्होंने किए।
देश में ऐसे उदाहरण कम हैं। आमतौर पर बीते एक हजार सालों में दिल्ली-लाहौर पर तुुुर्कों के कब्जों के बाद तोड़े जाते रहे मंदिरों के मलबे से इबादतगाहें बनवा दी जाती थीं मगर कई दूरदराज के मंदिरों को मलबों में बदलकर लावारिस छोड़ा भी गया। यह उन्हीं में से एक है, जिस पर बाद में अपना अधिकार स्थापित किया गया।
दुर्भाग्य यह है कि भारत की स्वाधीनता के बाद इन्हें लावारिस समझकर उपेक्षित किया गया। आसपास के लोग भी इनके बारे में कम ही जानते हैं। पठारी में नौंवी सदी का एक शिलालेख बताता है कि यह बस्ती कितनी पुरानी रही होगी। एक पथरीली पहाड़ी के नीचे खंडित मूर्तियों और पत्थरों से खड़ा यह परिसर भारत के निर्माण, विध्वंस और पुनर्निर्माण की कहानी का एक जीता-जागता सबूत है।