आशुतोष राणा
एक बार चर्चा के दौरान मैंने परमपूज्य गुरुदेव दद्दाजी से प्रश्न किया- गुरु के कल्याणकारी निर्देशों के बाद भी शिष्य कभी-कभी वे ग़लतियाँ कर बैठते हैं जो उन्हें नहीं करनी चाहिए, तब गुरु क्या करते हैं ?
परमपूज्य दद्दाजी आनंद से मुस्कुराते हुए बोले- बेटा, समर्थ गुरु पूरा प्रयास करते हैं की शिष्य गड्ढे में ना गिरे किंतु इसके बाद भी यदि शिष्य गड्ढे में गिर ही जाए तो वे उसका साथ नहीं छोड़ते बल्कि वे भी उसके साथ गड्ढे में उतर जाते हैं जिससे वे उस शिष्य को उस खोह से बाहर निकाल सकें। गुरु-शिष्य दोनों गड्ढे में होते हैं अंतर मात्र इतना रहता है की शिष्य गड्ढे में गिरता है और गुरु उसमें उतरता है। शिष्य का गड्ढे में गिरना एक घटना है और गुरु का उसमें उतरना एक योजना है, एक बेहोश चित्त की भाव दशा का परिणाम होता है तो दूसरा जागृत चित्त का उद्यम।
गुरु का दायित्व बहुत गहरा होता है बेटा, गुरु ऐसी घोषणाएँ नहीं करते जिससे मनुष्य का चित्त आशंकित हो जाए ! गुरु अपने स्नेहियों को आशंकित नहीं नि:शंक करते हैं, अपने शिष्य को भययुक्त नहीं भयमुक्त करते हैं, वे जीवन के प्रति अविश्वास नहीं विश्वास के भाव का संचार करते हैं, वे समस्या के उल्लेख में नहीं, उन्मूलन के लिए उद्यम करते हैं।
परमपूज्य गुरुदेव लौकिक रूप से इस जगत् में नहीं हैं किंतु पारलौकिक रूप से वे आज भी हम शिष्यों के चित्त में विद्यमान हैं, परमपूज्य गुरुदेव भगवान दद्दाजी के श्रीचरणों में दण्डवत प्रणाम उनकी कृपा हम सभी पर बनी रहे।
“गुरु को सर पर राखिए, चलिए आज्ञा माही।
कह कबीर ता दास को तीन लोक भय नाहीं॥”