विदिशा नगर से सैकडों की संख्या में भक्त पहुंचे श्री सम्मेद शिखर एवं भगवान नेमीनाथ स्वामी के निर्वाण महोत्सव पर श्रद्धापूर्वक निर्वाण लाडू चडाया
एमपी धमाका
गुणायतन प्रणेता राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ससंघ के सानिध्य में श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान का शुभारंभ होने जा रहा है। श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए मुनि श्री ने कहा कि मनुष्य जीवन स्वयं में एक दुर्लभ अवसर है। मनुष्य जन्म, भारतभूमि में जन्म, जैन कुल, स्वस्थ शरीर, सद्बुद्धि, उत्तम संस्कार, परिवार, संपन्नता तथा देव-गुरु-धर्म में श्रद्धा—ये सभी भाग्य के प्रतीक हैं। किंतु जब इन सबके साथ श्री सम्मेदशिखर जैसे सिद्धक्षेत्र में सिद्धों की आराधना का अवसर प्राप्त हो जाए, तब भाग्य सौभाग्य में परिवर्तित हो जाता है।मुनिश्री ने कहा कि संसार में असंख्य लोगों को जीवनभर श्री सम्मेदशिखर की वंदना का अवसर भी नहीं मिल पाता, जबकि यहाँ उपस्थित प्रत्येक श्रद्धालु सिद्धों की आराधना का दुर्लभ सौभाग्य प्राप्त कर रहा है। इसलिए इस अवसर का पूर्ण सदुपयोग करना चाहिए। उन्होंने कहा, "भाग्य से मिले अवसरों पर गर्व मत करो, उनका सदुपयोग कर उन्हें सौभाग्य में बदलो।"उन्होंने स्पष्ट किया कि जो संचित कर्मों के फलस्वरूप प्राप्त होता है, वह भाग्य है; जबकि जो पुरुषार्थ, साधना और सत्कर्मों से अर्जित किया जाता है, वही सौभाग्य है। स्वस्थ शरीर सेवा, परोपकार, व्रत और संयम में लगे; बुद्धि ज्ञान और धर्म-प्रभावना में लगे; संपत्ति दान और धर्मकार्य में लगे तथा सामर्थ्य लोकमंगल में समर्पित हो—यही भाग्य को सौभाग्य में बदलने का वास्तविक मार्ग है।
अपने प्रवचन में मुनिश्री ने महारानी दुर्गंधा की प्रेरक कथा का उल्लेख करते हुए बताया कि एक क्षण की निंदा और पापकर्म ने राजरानी को अनेक दुःखद योनियों में भटकाया, जबकि धर्म, अनुव्रत और सत्पुरुषार्थ ने उसी दुर्भाग्य को सौभाग्य में परिवर्तित कर दिया। उन्होंने कहा, "पाप दुर्भाग्य को जन्म देता है और धर्म सौभाग्य को बढ़ाता है।"राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन 'विद्यावाणी' ने बताया कि मुनिश्री ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे जीवन में प्राप्त प्रत्येक अनुकूल अवसर का उपयोग धर्म, दान, सेवा और साधना में करें। उन्होंने कहा कि दान, पूजा, शील और उपवास धर्म के चार ऐसे आधार हैं, जिनसे जीवन पवित्र, सफल और सार्थक बनता है। भगवान की पूजा में कभी पीछे नहीं रहना चाहिए तथा संयम और तप के साथ जीवन को धर्ममय बनाना चाहिए।श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान की व्यवस्थाओं के संबंध में मुनिश्री ने कहा कि भगवान के समक्ष सभी समान हैं। आराधना में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होगा। जिन श्रद्धालुओं को विशेष धार्मिक दायित्व सौंपे गए हैं, वे अपने निर्धारित स्थान पर रहेंगे, जबकि अन्य स्थानों का निर्धारण निष्पक्ष व्यवस्था के अनुसार किया जाएगा। उन्होंने समिति के सदस्यों को सेवा में विनम्रता और त्याग का संदेश देते हुए कहा कि सेवा का अर्थ अधिकार नहीं, बल्कि समर्पण है। "भगवान के समवसरण में कोई आगे-पीछे नहीं होता, सच्ची प्राथमिकता केवल आराधना की होती है।"मुनिश्री ने श्रद्धालुओं को बताया कि विधान मंडप को अत्यंत भव्य एवं आध्यात्मिक स्वरूप प्रदान किया गया है। गुणायतन की पूरी टीम ने श्रद्धा, समर्पण और परिश्रम से इसकी सज्जा की है, जिससे प्रत्येक साधक को दिव्य आध्यात्मिक अनुभूति होगी। उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से विधान की आराधना में पूर्ण श्रद्धा, अनुशासन और समर्पण के साथ सहभागी बनने का आह्वान किया। राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन 'विद्यावाणी' ने बताया कि इस अवसर पर भगवान नेमीनाथ स्वामी के निर्वाण महोत्सव पर गिरनार (उर्जयन्तगिरि) पर्वत का स्मरण करते हुए श्रद्धा एवं भक्ति के साथ निर्वाण लाडू अर्पित किया गया। मुनि श्री संधान सागर महाराज ने पर्वत वंदना कर कूट पर पहुँचकर श्रद्धालुओं के साथ भगवान नेमीनाथ स्वामी के चरणों में निर्वाण लाडू चढ़ाया। इस अवसर पर मुनि श्री सारसागर जी, मुनि श्री समाधर सागर जी एवं मुनि श्री रूप सागर जी महाराज उपस्थित रहे।
उन्होंने बताया कि 21 जुलाई से 29 जुलाई तक गुणायतन परिसर (निहारिका के समीप) में 108 श्रीजी के विमानों के साथ श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान का भव्य आयोजन मंगलवार से प्रारंभ होंगे।ध्वजारोहण एवं मंडप उद्घाटन के साथ श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान का विधिवत शुभारंभ हो जाएगा। 29 जुलाई तक यह विधान चलेगा तथा इसी दिवस चातुर्मास कलश की स्थापना हो जायेगी।