रिटायर्ड आईएएस आनंद कुमार शर्मा के दो सच्चे संस्मरण, जो बताते हैं कि पद का प्रभाव सीमित होता है, लेकिन विनम्रता और व्यवहार जीवनभर याद रहते हैं!
अफसरों को अक्सर ये गुमान बना रहता है कि उनके करे से ही सबकुछ हो रहा है और यदि वे चले जाएँ या दृश्य से अलग हो जाएँ, तो सब कुछ ठप्प पड़ जाएगा । अपनी ट्रेनिंग में मैंने पाया कि कई ऐसे महानुभाव जो कलेक्टर रहते हुए ट्रेनिंग में बुला लिए गए थे , रोज़ शाम , जिले में होने वाली गतिविधियों की रिपोर्ट लेते और दूसरे दिन क्या कामकाज करने हैं इसके निर्देश भी देते । साहबों को ये भी गुमान रहता है कि वो जो कुछ कर रहे हैं वह हमेशा याद रखा जाएगा । इसी खुशफहमी का शिकार हो कई अफ़सर कुर्सी के कारण हुई आवभगत को अपनी लोकप्रियता समझ बैठते हैं , और सेवानिवृति के बाद अपनी लोकप्रियता भुनाने चुनाव के मैदान में कूद जाते हैं । अपवाद स्वरुप कुछ एक मूर्धन्य मूर्तियों को छोड़ दें , जो अपने विशिष्ट वोट बैंक के कारण सफलता पा लेते हैं , पर अधिकांश अफ़सर इन चुनावों में अपनी जमानत तक जब्त करा बैठते हैं । मेरी समझ में तो सरकारी कामकाज में शायद ही किसी का किया कोई याद रखता है, और ये समझना तो निहायत ही भ्रम है कि हमारे ना रहने से व्यवस्था में कोई अंतर आ जाएगा । जीवन से जुड़े इन्ही प्रसंगों को लेकर आज कुछ यादें साझा कर रहा हूँ ।
बहुत बरस पहले की बात है, तब मैं उज्जैन तहसील का एसडीएम होने के साथ-साथ महाकाल मंदिर का प्रशासक भी था । मंदिर में अपना कामकाज मैं सुबह ही निपटा लिया करता था । एक दिन मंदिर का काम समाप्त कर मैं मुख्य द्वार से वापस ऊपर जा रहा था तभी मुझे सामने से एक सज्जन आते दिखे , जो मेरे वरिष्ठ थे । मैंने अभिवादन किया और औपचारिक बातचीत के बाद कहा “सर दर्शनों के लिये मैं किसी को साथ कर दूँ ?”वे बोले अरे इसकी ज़रूरत नहीं है,मैं यहाँ उज्जैन में पदस्थ रहा हूँ, यहाँ भला मुझे कौन नहीं जानता ? पीछे धर्मशाला के सामने वाला प्रवचन हॉल मैंने ही तो खड़े होकर बनवाया था । मैंने उन्हें नमस्कार किया और अपनी जीप की ओर बढ़ते हुए सोचने लगा कि मेरे तीन साल के कार्यकाल में एक बार भी इनका का ज़िक्र किसी ने नहीं किया था ।
लेकिन कुछ लोग इस वास्तविकता को भी समझ लेते हैं की इस अफसरी का विस्तार कहाँ तक है । उज्जैन में जब मैं खाचरौद में बतौर एसडीएम पदस्थ था , तब उज्जैन में श्री आरसी सिन्हा कलेक्टर हुआ करते थे । सिन्हा साहब गोरखपुर के रहने वाले थे । उन दिनों उज्जैन से गोरखपुर के लिए कोई सीधी ट्रेन नहीं थी , इसलिये नागदा जंक्शन से गाड़ी पकड़नी पड़ती थी जो कि खाचरोद अनुविभाग की तहसील हुआ करता था । एक दिन मुझे खबर मिली कि कलेक्टर श्री सिन्हा परिवार सहित अपने घर गोरखपुर जा रहे हैं तो मैं उन्हें नागदा रेलवे स्टेशन पर विदा करने पहुँच गया । सिन्हा साहब के परिवार में कुल मिला कर चार सदस्य थे और उनके तीन टिकट ही कन्फर्म हो पाए थे , मुझे देखकर वे बोले भाई कुछ उपाय कर ये एक वेटिंग टिकट भी कन्फ़र्म करा दो । तब रेलवे में उतना कम्प्यूटरीकरण नहीं हुआ था , और टीटीई के हाथ में बहुत कुछ पावर हुआ करते थे । मैंने अपने स्टाफ को लगाया और रेलवे स्टेशन पर स्टेशन मास्टर को भी अनुरोध किया । तभी प्लेटफार्म पर ट्रेन आ गई । मैंने ट्रेन की उस बोगी में जाने वाले टीटीई को अपना परिचय दिया और बताया कि हमारे कलेक्टर साहब इस ट्रेन से गोरखपुर तक जा रहे हैं , एक टिकट वेटिंग में है जिसकी बर्थ मिल जाए तो ठीक होगा । टीटीई ने कहा कि अभी तो कोई बर्थ खाली नहीं है , लेकिन जैसे ही कोई बर्थ खाली होगी वह प्राथमिकता से उन्हें ही आबंटित करेगा । मैंने सिन्हा साहब से बताया कि साहब, आप ट्रेन में बैठें, टी.सी ने कहा है कि वह आगे इंतज़ाम करेगा । उन्होंने कहा “यार जो हो यहीं करा दो आगे का क्या भरोसा? “ मैंने कहा नहीं , सर मैंने उसे समझा दिया है और आपका परिचय भी दे दिया है कि आप कलेक्टर हैं । उन्होंने कहा आनंद मैं कलेक्टर यही प्लेटफार्म तक ही हूँ , ट्रेन मैं चढ़ने के बाद तो असली कलेक्टर , टिकेट कलेक्टर ही है । मैं फिर वापस टीटीई के पास गया और किसी तरह इधर उधर से चार्ट दिखवा कर सिन्हा साहब को चारों टिकेट कन्फर्म करा कर विदा किया ।