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जंगल का हिसाब जंगल में ही दफन..?


क्या भुगतान के बिल और देयक भी वन्यजीव सुरक्षा के दायरे में आते हैं?

जंगल की सुरक्षा के नाम पर खर्च, लेकिन हिसाब देने से इंकार!

वन विभाग ने RTI में रोकी जानकारी, देयकों और भुगतान का ब्यौरा देने से किया मना

एमपी धमाका, विदिशा

पारदर्शिता और जवाबदेही की बात करने वाला वन विभाग अब सूचना के अधिकार (RTI) के सवालों से बचता नजर आ रहा है। वन विभाग से वर्ष 2024-25 और 2025-26 में वन्य प्राणियों की सुरक्षा और पानी की व्यवस्था पर किए गए खर्च की राशि तथा उससे संबंधित देयकों की सत्यापित प्रतियों की जानकारी मांगी गई थी, लेकिन विभाग ने जानकारी देने से साफ इंकार कर दिया।
आवेदक द्वारा सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के तहत यह जानकारी मांगी गई थी। इसके जवाब में सामान्य वनमंडल विदिशा ने पत्र जारी कर कहा कि यदि वन्य प्राणियों की सुरक्षा संबंधी जानकारी सार्वजनिक की गई तो शिकार होने की संभावना बढ़ सकती है, इसलिए सूचना नहीं दी जा सकती।
हैरानी की बात यह है कि आवेदन में जंगलों में सुरक्षा और पानी की व्यवस्था पर हुए खर्च और भुगतान के देयकों की जानकारी मांगी गई थी, न कि वन्य जीवों की लोकेशन, गश्त के मार्ग या संवेदनशील सूचनाएं। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि आखिर खर्च का हिसाब छिपाने के लिए वन्यजीव सुरक्षा का तर्क क्यों दिया जा रहा है?
वन विभाग ने अपने जवाब में सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8(1) का हवाला देते हुए जानकारी देने से इनकार कर दिया। जबकि जानकारों का मानना है कि सार्वजनिक धन से किए गए खर्च और भुगतान के रिकॉर्ड सामान्यतः सार्वजनिक सूचना की श्रेणी में आते हैं और इन्हें साझा किया जाना चाहिए, जब तक कि उनमें कोई संवेदनशील परिचालन विवरण शामिल न हो।
अब इस मामले में यह बहस तेज हो गई है कि क्या वास्तव में यह वन्यजीव सुरक्षा का मामला है या फिर खर्च के रिकॉर्ड को सार्वजनिक होने से रोकने का प्रयास?

जनता के सवाल

जंगल में खर्च हुए लाखों रुपये का हिसाब आखिर क्यों छिपाया जा रहा है?

क्या भुगतान के बिल और देयक भी वन्यजीव सुरक्षा के दायरे में आते हैं?

क्या RTI कानून की धारा 8 का उपयोग जानकारी रोकने के लिए किया गया?

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