जंगल की सुरक्षा पर कितना खर्च हुआ, यह बताने से क्यों बच रहे हैं जिम्मेदार?
विदिशा/एमपी धमाका
जनता के टैक्स के पैसे से चलने वाली सरकारी योजनाओं का हिसाब मांगना यदि अपराध बन जाए, तो सूचना के अधिकार अधिनियम का उद्देश्य ही सवालों के घेरे में आ जाता है। ऐसा ही मामला वन परिक्षेत्र लटेरी (दक्षिण) में सामने आया है, जहां एक साधारण और जनहित से जुड़ी जानकारी मांगने पर विभाग ने तथ्यों के बजाय नियमों और कानूनी प्रावधानों की लंबी-चौड़ी व्याख्या भेजकर जवाबदारी से बचने का प्रयास किया है।
सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत वर्ष 2024-25 और 2025-26 में वन्य प्राणियों की सुरक्षा एवं पानी की व्यवस्था पर किए गए खर्च की राशि, खर्च का ब्यौरा और संबंधित दस्तावेजों की प्रतियां मांगी गई थीं।
यह जानकारी किसी व्यक्ति के बैंक खाते, निजी जीवन या व्यक्तिगत गोपनीयता से जुड़ी नहीं थी, बल्कि सीधे तौर पर सरकारी धन के उपयोग और वन्यजीव संरक्षण योजनाओं पर खर्च से संबंधित थी। इसके बावजूद वन विभाग ने जवाब में डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, निजी जानकारी और न्यायालय के आदेशों का हवाला देकर जानकारी देने से इंकार कर दिया।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सवाल सरकारी खर्च और योजनाओं पर है, तब निजी जानकारी का तर्क कहां से आ गया?
क्या वन्य प्राणियों के लिए बनाई गई पानी की टंकियों, जल स्रोतों, संरचनाओं और सुरक्षा व्यवस्थाओं पर हुए खर्च का विवरण भी अब "निजी जानकारी" की श्रेणी में आ गया है?
सूचना के अधिकार अधिनियम का मूल उद्देश्य शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है, लेकिन यदि अधिकारी हर सवाल के जवाब में तकनीकी प्रावधानों की दीवार खड़ी करने लगें, तो आम नागरिक के हाथ में दिया गया यह अधिकार केवल कागजों तक सीमित होकर रह जाएगा।
क्षेत्र के नागरिकों का कहना है कि जंगलों और वन्यजीव संरक्षण के नाम पर हर वर्ष लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं। ऐसे में जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है कि कितना पैसा आया, कहां खर्च हुआ और उसका वास्तविक लाभ जमीन पर दिखाई भी दिया या नहीं।
अब सवाल यह है कि क्या विभाग वास्तव में जानकारी देने में असमर्थ है, या फिर जनता के पैसे के हिसाब-किताब को सार्वजनिक करने से बचना चाहता है?