विदिशा के पूर्व कलेक्टर आनंद शर्मा ने बताए अपने अनुभव
कई बार जिले में पदस्थ प्रशासनिक अधिकारियों को ये भ्रम हो जाता है कि उनकी जिम्मेदारी केवल सरकारी कार्यक्रमों तक ही है , पर सच तो ये है कि कोई भी आयोजन हो , यदि जनसामान्य का समावेश उसमें है , तो प्रशासनिक अधिकारियों का दायित्व अपने आप उसमें समाहित हो जाता है । बात पुरानी है , तब मैं विदिशा जिले में कलेक्टर के रूप में नया नया पदस्थ हुआ ही था , और चूँकि प्रदेश के तत्कालीन माननीय मुख्यमंत्री जी का ये अपना जिला माना जाता था तो हम सभी अतिरिक्त रूप से सतर्क रहा करते थे । विदिशा में बेतवा के किनारे गणेश जी का मंदिर है , जिन्हें बाढ़ वाले गणेश जी के नाम से सब जानते हैं , और इस नाम के पीछे कहानी ये है कि गणेशोत्सव में वर्ष 2005 में बेतवा के तट पर गणेश प्रतिमा की स्थापना हुई और उसी साल विदिशा में ऐसी बाढ़ आई कि हर जगह पानी भर गया । यह स्थान भी जलमग्न हो गया , पर जब बाढ़ का पानी उतरा तो लोगों ने देखा प्रतिमा सुरक्षित थी , बस स्थानीय निवासियों ने इसे एक चमत्कार माना और इसी स्थल पर भगवान गणेश का एक मंदिर बना जिसे बाढ़ वाले गणेश जी के नाम से जाना जाने लगा । हर साल यहाँ नियमित रूप से गणेश प्रतिमा स्थापित की जाती है , विसर्जन के पूर्व होने वाले यज्ञ में मुख्यमंत्री जी सपरिवार पधारते थे । उस बार जब वो अवसर पास आया तो मैंने अपने एसडीएम और तहसीलदार से पूछा कि हमारी इसमें क्या भूमिका रहती है ? दोनों ने समवेत स्वर में कहा “ सर हमें इसमें कुछ नहीं करना होता , मंदिर के ऐसे आयोजन के प्रबंध के लिए एक समिति बनी है वही सब कुछ देखती है । मंदिर में पूजन के बाद एक बड़ा भण्डारा भी होता था जिसमें स्वाभाविक रूप से आसपास के लोग बड़ी संख्या में आते थे । मैंने एसपी साहब से बात की तो उन्होंने भी कहा कि वीआईपी के आगमन और जनसामान्य के भण्डारे में शामिल होने की सारी व्यवस्थाएँ ठीक रहें इसके लिए पार्किंग स्थल , बेरिकेड और आवश्यक पुलिस बल की तैनाती कर दी गई है , और ये तो कई सालों से हो रहा है सब यही लोग सम्भाल लेते हैं , आप निश्चिंत रहें । इतना फ़ीडबैक पर्याप्त था फिर भी मैंने स्थल के इंतिज़ाम और आयोजक समिति के सदस्यों से बात की तो वे अपने औरा में ही मगन लगे “ कहने लगे अरे कलेक्टर साहब आप तो भोजन के लिए पधार जाना बस “ । मैने फिर भी निर्धारित दिन के लिए कुछ स्थानीय अधिकारियों की ड्यूटी लगा दी । सब सही लग रहा था , लेकिन आयोजन के दिन सुबह जब वीआईपी के आने का समय आया और मैं एसपी समेत मंदिर में अगवानी के लिए पहुंचा तो मैंने नोट किया कि जहाँ यज्ञ और पूजन की व्यवस्था थी , वहाँ तो वाटरप्रूफ टेंट था लेकिन भोजन के लिए लगे पांडाल सामान्य टेंट से बने थे । मैंने मन ही मन सोचा कि ये तो स्थानीय समिति का काम है , हम कर भी क्या सकते हैं ? थोड़ी ही देर में वीआईपी का आगमन हो गया , हमने आगे बढ़ कर उन्हें रिसीव किया और स्थानीय समिति के कार्यकर्ताओं ने भी स्वागत किया , इसके बाद वे आयोजन की व्यवस्थाओं का जायज़ा लेने लगे । हम साथ साथ ही थे , थोड़ी देर बाद वे समिति के सदस्यों से अलग होकर चर्चा करने लगे तो मैं और एसपी साहब भी थोड़ा दूर जाकर खड़े हो गए । भाद्र पक्ष चल ही रहा था सो थोड़ी देर में बादल घुमड़ने लगे और देखते ही देखते बारिश शुरू हो गई । मैं कुछ सोच पाऊँ तभी वही सज्जन दौड़ कर मेरे पास आए और बोले “ भाई साब कह रहे हैं , कलेक्टर से पूछो अब क्या करना है ? मैं एक क्षण को तो हतप्रभ रह गया , फिर कहा आप चलिये मैं आता हूँ । हम दोनों तुरत गए और उनसे कहा , सर अभी वैकल्पिक इंतजाम ढूँढते हैं और एसपी साहब के साथ मैं अपनी गाड़ी में बैठ कर निकल पड़ा । मुझे याद आया कि मंदिर से थोड़ी ही दूरी पर भोपाल की ओर एक नया ढाबा खुला था सो मैंने ड्राइवर को वहीं चलने को कहा । हम दोनों उस ढाबे के पास पहुंचे और ढाबे के मालिक से पूछा कि आजकल आपकी दिन भर की कितनी कमाई हो जाती है ? उसने जो कुछ कहा , उस पर मैंने कहा कि आप इससे दोगुना ले लो और दिन भर के लिए ये स्थान हमें इस्तेमाल के लिए दे दो । पहले तो वो कुछ झिझका लेकिन साहब का नाम सुनते ही बोला “अरे पैसों को क्या बात आप तो इस्तेमाल करो आप की ही जगह है “ । मैंने कहा नहीं भाई ऐसा नहीं और समिति के सदस्य सज्जन को फोन कर स्थान बताया और ये भी कहा की आज दिनभर का किराया इन्हें भुगतान कर दीजिएगा । आनन फ़ानन सब कुछ शिफ्ट हुआ और दोपहर के बाद जब भोजन का समय आया तो चारों ओर से बड़े बड़े मंत्री , नेता और अफसर आने लगे , पर हमारा काम हो गया था क्योंकि बाक़ी व्यवस्थायें समिति की थी हीं । हाँ अंत में मेहमानों के जाने के बाद हम सब ने भी उसी ढाबे के फर्श पर बिछी बिछात में बैठ कर प्रेम से प्रसाद ग्रहण किया।