पत्रकार दीपक तिवारी की आरटीआई अपील क्रमांक 5825/2022 पर 28 जुलाई 2026 को आयोग ने दिया फैसला
भोपाल | एमपी धमाका
मध्यप्रदेश में एक ओर मुख्यमंत्री के निर्देश पर मिलावटी खाद्य सामग्री के खिलाफ "मिलावट से मुक्ति" व्यापक अभियान चलाया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर खाद्य निरीक्षण और अधिकारियों की शासकीय कार्यप्रणाली से जुड़े रिकॉर्ड को लेकर मध्यप्रदेश राज्य सूचना आयोग के एक फैसले ने पारदर्शिता और निजता के बीच बहस छेड़ दी है।
मामला आरटीआई अपील प्रकरण क्रमांक 5825/2022 का है। इस प्रकरण में पत्रकार दीपक तिवारी द्वारा खाद्य निरीक्षण तथा संबंधित अधिकारियों से जुड़ी विभिन्न जानकारियां सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत मांगी गई थीं। इस मामले में मध्यप्रदेश राज्य सूचना आयोग ने 28 जुलाई 2026 को आदेश पारित किया।
आयोग ने पदस्थापना संबंधी जानकारी देने के निर्देश दिए
आयोग के आदेश में संबंधित विभाग को अधिकारियों की पदस्थापना से संबंधित जानकारी उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं। इसके साथ ही आवेदक को उपलब्ध अभिलेखों के अवलोकन तथा चिन्हित दस्तावेजों की निर्धारित शुल्क पर प्रमाणित प्रतियां उपलब्ध कराने की बात कही गई है।
हालांकि, आरटीआई में मांगी गई कुछ अन्य जानकारियों को लेकर आयोग के निर्णय ने सवाल खड़े किए हैं। आयोग ने कुछ सूचनाओं को व्यक्तिगत जानकारी अथवा तीसरे पक्ष की सूचना की श्रेणी में मानते हुए उन्हें उपलब्ध कराने से इनकार किया है।
खाद्य नमूना रिपोर्ट और पंचनामे पर सबसे बड़ा सवाल
मामले का महत्वपूर्ण पहलू खाद्य निरीक्षकों द्वारा लिए गए खाद्य नमूनों की रिपोर्ट, पंचनामा, न्यायालय में दायर प्रकरण तथा निरीक्षण से संबंधित रिकॉर्ड को लेकर है।
सवाल यह है कि खाद्य पदार्थों की जांच और निरीक्षण से संबंधित ये रिकॉर्ड आखिर किस सीमा तक किसी अधिकारी की निजी जानकारी माने जा सकते हैं? क्योंकि प्रथम दृष्टया इनका संबंध अधिकारी की निजी जिंदगी से ज्यादा सरकारी निरीक्षण, खाद्य सुरक्षा और आम जनता के स्वास्थ्य से दिखाई देता है।
ऐसे में यह बहस महत्वपूर्ण हो जाती है कि क्या शासकीय कार्य के दौरान तैयार किए गए प्रत्येक रिकॉर्ड को केवल ‘Employer-Employee Relationship’ यानी नियोक्ता-कर्मचारी संबंध के आधार पर व्यक्तिगत सूचना की श्रेणी में रखा जा सकता है?
टूर प्रोग्राम और डेली डायरी भी सवालों के घेरे में
आरटीआई में अधिकारियों के टूर प्रोग्राम और डेली डायरी जैसी जानकारियां भी मांगी गई थीं। निश्चित रूप से यदि इन अभिलेखों में किसी अधिकारी की निजी अथवा संवेदनशील व्यक्तिगत जानकारी शामिल है, तो उस हिस्से की निजता का संरक्षण किया जाना समझ में आता है।
लेकिन यदि उन्हीं अभिलेखों में सरकारी दौरे, खाद्य निरीक्षण, बैठक, विभागीय कार्यवाही या अन्य शासकीय गतिविधियों का विवरण दर्ज है, तो यह सवाल उठता है कि क्या उस हिस्से को अलग करके सार्वजनिक किया जा सकता है?
यही वह बिंदु है जहां सूचना के अधिकार और निजता के अधिकार के बीच संतुलन का सवाल सामने आता है।
विभागीय कार्रवाई और संपत्ति संबंधी जानकारी अलग प्रकृति की
दूसरी ओर, शो-कॉज नोटिस, विभागीय जांच, दंड संबंधी कार्रवाई और कुछ सेवा संबंधी रिकॉर्ड सामान्य तौर पर व्यक्तिगत सूचना के दायरे में आ सकते हैं। ऐसे मामलों में निजता से जुड़े कानूनी प्रावधानों का परीक्षण आवश्यक होता है।
इसी तरह अधिकारियों की संपत्ति संबंधी जानकारी भी परिस्थितियों और लागू कानूनी प्रावधानों के आधार पर निजी सूचना के दायरे में आ सकती है। हालांकि आरटीआई कानून में व्यापक लोकहित भी एक महत्वपूर्ण कसौटी है।
मिलावट के खिलाफ अभियान के बीच पारदर्शिता का सवाल
यह पूरा मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि प्रदेश में मिलावटी खाद्य सामग्री के खिलाफ अभियान चल रहा है। खाद्य सुरक्षा से जुड़े मामलों में सरकारी निरीक्षण, नमूना परीक्षण, पंचनामे और न्यायालयीन कार्रवाई का सीधा संबंध आम जनता के स्वास्थ्य और उपभोक्ता हितों से हो सकता है।
ऐसे में सवाल केवल एक आरटीआई आवेदन का नहीं, बल्कि यह है कि खाद्य सुरक्षा से जुड़े सरकारी कामकाज में पारदर्शिता की सीमा क्या होनी चाहिए?
यदि किसी दस्तावेज में निजी जानकारी और सरकारी कार्यवाही दोनों मौजूद हैं, तो क्या निजी हिस्से को हटाकर शेष शासकीय रिकॉर्ड उपलब्ध कराया जा सकता है? आरटीआई कानून में उपलब्ध पृथक्करण (Severability) के सिद्धांत के संदर्भ में भी यह पहलू चर्चा का विषय बन सकता है।
आयोग के आदेश के बाद आगे की राह
फिलहाल आयोग के आदेश के बाद पदस्थापना संबंधी जानकारी उपलब्ध कराने का रास्ता साफ हुआ है। वहीं खाद्य नमूना रिपोर्ट, पंचनामा, न्यायालयीन प्रकरण, विभागीय कार्रवाई, टूर प्रोग्राम, डेली डायरी और अन्य सूचनाओं को लेकर कानूनी व्याख्या और आगे की समीक्षा का रास्ता खुला हुआ है।
अब देखना यह होगा कि अपीलार्थी इस निर्णय के संबंध में आगे क्या कानूनी कदम उठाते हैं और शासकीय कार्य से जुड़े रिकॉर्ड को लेकर पारदर्शिता तथा निजता के बीच संतुलन पर आगे क्या स्थिति सामने आती है।
एमपी धमाका का सवाल
क्या किसी सरकारी कर्मचारी का निजी सेवा रिकॉर्ड और उसके द्वारा जनता के हित में किए गए शासकीय कार्यों का रिकॉर्ड एक ही श्रेणी में रखा जा सकता है?
और जब मामला सीधे खाद्य सुरक्षा तथा आम जनता के स्वास्थ्य से जुड़ा हो, तो क्या ऐसे सरकारी रिकॉर्ड में निजता और सार्वजनिक हित के बीच संतुलन बनाना जरूरी नहीं है? यही सवाल अब इस पूरे प्रकरण को महत्वपूर्ण बना रहा है।