(शशिकांत मिश्र)
किसी प्रदेश की पहचान केवल उसके भूगोल से नहीं बनती। वह उसकी आर्थिक स्थिति, वहां के लोगों की आकांक्षाओं और देश के भीतर उसकी बनी हुई धारणा से भी बनती है। मध्यप्रदेश की पहचान को लेकर भी एक लंबा दौर ऐसा रहा है जब उसकी चर्चा विकास की संभावनाओं से पहले उसकी पिछड़ापन से शुरू होती थी। ‘बीमारू’ शब्द ने प्रदेश के माथे पर एक ऐसा ठप्पा लगा दिया था, जिससे बाहर निकलना केवल आर्थिक चुनौती नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक चुनौती भी थी। आज जब मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव सार्वजनिक मंच से यह कहते हैं कि मध्यप्रदेश ने उस पुराने टैग को पूरी तरह पीछे छोड़ दिया है और अब तेजी से प्रगति करने वाले राज्यों में अपनी जगह बना रहा है, तो यह देखना स्वाभाविक है कि इस आत्मविश्वास के पीछे प्रदेश की विकास यात्रा किस दिशा में आगे बढ़ रही है।
नई दिल्ली में आयोजित ‘द इकॉनामिक टाइम्स वर्ल्ड लीडर्स फोरम-2026’ में मुख्यमंत्री ने जिस तरह मध्यप्रदेश को देश-विदेश के निवेशकों के सामने प्रस्तुत किया, उसमें एक बदलते हुए प्रदेश की तस्वीर दिखाई देती है। कभी जिस प्रदेश की अर्थव्यवस्था में कृषि को ही विकास का मुख्य आधार माना जाता था, वही मध्यप्रदेश अब उद्योग, ग्रीन एनर्जी, टेक्नोलॉजी, इनोवेशन और वैश्विक निवेश की भाषा बोल रहा है। मुख्यमंत्री ने भोपाल की ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट और प्रदेश के विभिन्न अंचलों में हुए रीजनल इंडस्ट्री कॉन्क्लेव का उल्लेख करते हुए निवेशकों को यह भरोसा दिलाने की कोशिश की कि मध्यप्रदेश उनके लिए केवल निवेश का स्थान नहीं, बल्कि दीर्घकालिक साझेदारी का अवसर है।
यह परिवर्तन अपने आप में महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे समझने के लिए उत्साह से थोड़ा आगे जाकर देखने की आवश्यकता है। निवेश के लिए आमंत्रित करना किसी भी सरकार की पहली जिम्मेदारी हो सकती है, लेकिन निवेश को जमीन पर उतारना उसकी वास्तविक परीक्षा होती है। किसी सम्मेलन में कितने निवेशक आए, कितने प्रस्ताव सामने आए और कितनी घोषणाएं हुईं, ये सब महत्वपूर्ण हैं, लेकिन अंततः प्रदेश की जनता यह देखना चाहेगी कि इनमें से कितने उद्योग वास्तव में स्थापित हुए, कितना उत्पादन बढ़ा और कितने युवाओं को रोजगार मिला।
मध्यप्रदेश की नई आर्थिक दिशा में ग्रीन मैन्युफैक्चरिंग का उल्लेख इसलिए विशेष महत्व रखता है क्योंकि यह केवल औद्योगिक विस्तार की बात नहीं है, बल्कि आने वाली अर्थव्यवस्था की प्रकृति को समझने का संकेत भी है। मुख्यमंत्री ने सौर और पवन ऊर्जा की संभावनाओं का उपयोग करते हुए स्वच्छ ऊर्जा आधारित औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने की बात कही है। ऊर्जा, भूमि और अधोसंरचना उपलब्ध कराने के साथ स्वच्छ ऊर्जा आधारित निवेश को प्राथमिकता देने की बात भी सामने रखी गई है।
दुनिया की अर्थव्यवस्था तेजी से बदल रही है। उद्योगों के लिए अब केवल जमीन, बिजली और बाजार पर्याप्त नहीं हैं। स्वच्छ ऊर्जा, पर्यावरणीय मानक, तकनीकी दक्षता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो गई है। इसलिए यदि मध्यप्रदेश अपनी ऊर्जा संभावनाओं को आधुनिक उद्योगों के साथ जोड़ पाता है तो उसके पास विकास की एक ऐसी राह बनाने का अवसर है जो पारंपरिक औद्योगिकीकरण से आगे जाती है।
मध्यप्रदेश के लिए यह अवसर इसलिए भी बड़ा है क्योंकि सरकार अब निवेश की तलाश केवल पारंपरिक उद्योगों तक सीमित नहीं रखना चाहती। टेक्सटाइल और गारमेंट, फार्मास्यूटिकल्स, ऑटोमोबाइल और इंजीनियरिंग जैसे स्थापित क्षेत्रों के साथ इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, डेटा सेंटर, खाद्य प्रसंस्करण और नवीकरणीय ऊर्जा को भी निवेश की संभावनाओं वाले क्षेत्र बताया गया है।
इन क्षेत्रों का उल्लेख अपने आप में मध्यप्रदेश की बदलती महत्वाकांक्षा का संकेत है। सेमीकंडक्टर और डेटा सेंटर जैसे क्षेत्र उस अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं जिसमें तकनीक, ऊर्जा और मानव संसाधन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। यदि प्रदेश इस दिशा में आगे बढ़ना चाहता है तो उसे केवल निवेशकों को जमीन उपलब्ध कराने से काम नहीं चलेगा। उसे ऐसा वातावरण भी बनाना होगा जिसमें तकनीकी कौशल विकसित हो, अधोसंरचना विश्वसनीय हो और प्रशासनिक निर्णय निवेश की गति के साथ चल सकें।
यहीं ईज ऑफ डूइंग बिजनेस का प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है। सरकार ने सिंगल विंडो व्यवस्था, डिजिटल प्रक्रियाओं, संस्थागत सुधार और समयबद्ध अनुमोदन को प्राथमिकता देने की बात कही है। यह अच्छी शुरुआत हो सकती है, लेकिन किसी नीति की वास्तविक सफलता उसके कागज पर होने से नहीं, उसके अनुभव में होने से तय होती है। निवेशक के लिए सरकार की सबसे बड़ी पहचान उसका प्रशासनिक व्यवहार होता है। यदि अनुमति समय पर मिले, प्रक्रियाएं सरल हों और परियोजनाओं को आवश्यक सुविधाएं समय पर उपलब्ध हों तो निवेश का भरोसा मजबूत होता है।
मध्यप्रदेश के पास अपनी भौगोलिक स्थिति का भी लाभ है। देश के मध्य में स्थित होने के कारण वह अनेक बड़े बाजारों से जुड़ने की क्षमता रखता है। सरकार सड़क, रेल और हवाई संपर्क के विस्तार के साथ लॉजिस्टिक्स अधोसंरचना को मजबूत करने की बात कर रही है। यह प्रयास सफल हुआ तो मध्यप्रदेश केवल उद्योगों का गंतव्य नहीं रहेगा, बल्कि देश की सप्लाई चेन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
लेकिन विकास की पूरी कहानी में एक शब्द सबसे महत्वपूर्ण है—रोजगार।
किसी प्रदेश में निवेश आए, कारखाने लगें, उत्पादन बढ़े और निर्यात बढ़े, लेकिन यदि वहां के युवाओं के जीवन में उसके परिणाम दिखाई न दें तो विकास की कहानी अधूरी रह जाती है। मुख्यमंत्री ने ‘समृद्ध मध्यप्रदेश 2047’ और ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्यों की चर्चा करते हुए औद्योगिक विकास, रोजगार सृजन, निर्यात वृद्धि और निजी निवेश को महत्वपूर्ण बताया है।
यही वह बिंदु है जहां मध्यप्रदेश की वर्तमान आर्थिक रणनीति की सबसे बड़ी कसौटी सामने आती है। निवेश केवल पूंजी का आगमन नहीं है। वह तब विकास बनता है जब उससे उत्पादन बढ़ता है, उत्पादन से रोजगार पैदा होता है, रोजगार से आय बढ़ती है और आय से स्थानीय बाजार मजबूत होते हैं। यही वह चक्र है जो किसी प्रदेश की अर्थव्यवस्था को वास्तव में गति देता है।
मुख्यमंत्री ने मध्यप्रदेश की पहचान को कृषि और प्राकृतिक संसाधनों से आगे आधुनिक उद्योग, ग्रीन एनर्जी, टेक्नोलॉजी, इनोवेशन और वैश्विक निवेश के केंद्र के रूप में विकसित करने की इच्छा व्यक्त की है। बड़े उद्योगों के साथ स्टार्टअप, एमएसएमई और नए उद्यमों को अवसर देने की बात भी इसी व्यापक सोच का हिस्सा है।
मध्यप्रदेश के सामने इसलिए अवसर भी बड़ा है और जिम्मेदारी भी। प्रदेश के पास कृषि की शक्ति है, ऊर्जा की संभावनाएं हैं, देश के मध्य में होने का भौगोलिक लाभ है और औद्योगिक विस्तार के लिए पर्याप्त गुंजाइश है। अब चुनौती इन सभी शक्तियों को एक ऐसी आर्थिक रणनीति में बदलने की है जो केवल बड़े निवेशकों को आकर्षित न करे, बल्कि छोटे उद्यमी, स्टार्टअप, किसान, कामगार और युवा—सभी को विकास की प्रक्रिया का सहभागी बनाए।
नई दिल्ली के मंच से मुख्यमंत्री ने निवेशकों को आमंत्रित करते हुए कहा है कि मध्यप्रदेश उनके निवेश, उद्योग और सपनों के लिए तैयार है। यह निमंत्रण जितना निवेशकों के लिए है, उतना ही प्रदेश सरकार के लिए भी एक तरह की प्रतिबद्धता है।
क्योंकि अब मध्यप्रदेश को केवल यह साबित नहीं करना है कि वह ‘बीमारू’ नहीं रहा। उसे यह साबित करना है कि वह किस तरह का प्रदेश बन रहा है।
क्या वह ऐसा प्रदेश होगा जहां केवल बड़े निवेश की घोषणाएं होंगी, या ऐसा प्रदेश जहां निवेश के साथ स्थानीय उद्योग मजबूत होंगे? क्या नए उद्योग केवल उत्पादन करेंगे या युवाओं के लिए नए अवसर भी पैदा करेंगे? क्या ग्रीन एनर्जी केवल नीति दस्तावेजों का हिस्सा रहेगी या वास्तव में मध्यप्रदेश की औद्योगिक पहचान बनेगी? और क्या प्रदेश देश के मध्य में स्थित होने के अपने भौगोलिक लाभ को वैश्विक आर्थिक अवसर में बदल पाएगा?
इन सवालों के जवाब आने वाले वर्षों में मिलेंगे।
इतिहास किसी प्रदेश की पहचान उसके बारे में कही गई बातों से नहीं, उसके परिणामों से तय करता है। मध्यप्रदेश ने एक पुराने ठप्पे से बाहर निकलने की घोषणा कर दी है। अब उसे एक नई पहचान अर्जित करनी है।
बीमारू’ से बाहर निकलना अतीत से मुक्ति है; लेकिन आधुनिक, आत्मनिर्भर और रोजगार-सृजक मध्यप्रदेश बनाना भविष्य की असली परीक्षा है। इस परीक्षा का परिणाम भाषणों में नहीं, उस दिन दिखाई देगा जब प्रदेश का युवा अपने भविष्य के लिए दूसरे शहर की ओर देखने के बजाय अपने ही मध्यप्रदेश में अवसर तलाशेगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनैतिक विश्लेषक है)