कृष्णमोहन झा
चित्रकूट में मंदाकिनी का जल उफान पर था। अतिवृष्टि ने जनजीवन को प्रभावित किया था और बाढ़ के बीच प्रशासन तथा राहत-बचाव दल अपने स्तर पर जुटे हुए थे। ऐसे समय में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का दिल्ली से सीधे रीवा पहुंचना और वहां से प्रभावित क्षेत्र की ओर जाना केवल एक प्रशासनिक कार्यक्रम नहीं था। यह उस संवेदना का दृश्य था, जिसमें मुख्यमंत्री के लिए प्रदेश की जनता का संकट राजनीतिक कार्यक्रमों से बड़ा हो जाता है। प्रभावित लोगों के बीच पहुंचकर स्थिति का जायजा लेना, राहत एवं बचाव कार्यों की जानकारी लेना और अधिकारियों को आवश्यक निर्देश देना इस बात का संकेत था कि सरकार की निगाह केवल फाइलों पर नहीं, जमीन पर भी है।
दिलचस्प यह था कि मुख्यमंत्री का यह कार्यक्रम पहले से तय नहीं था। उन्हें दिल्ली से सीधे खजुराहो पहुंचना था और वहां से ओरछा में भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में शामिल होना था। प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के नेतृत्व में नई प्रदेश कार्यसमिति की यह पहली महत्वपूर्ण बैठक थी। संगठन की मजबूती, बूथ सशक्तीकरण, समरसता, विकसित भारत और आगामी कार्ययोजना जैसे विषयों पर व्यापक मंथन होना था। मुख्यमंत्री सहित प्रदेश भाजपा के अनेक वरिष्ठ नेताओं की इसमें उपस्थिति निर्धारित थी।
लेकिन चित्रकूट की परिस्थितियों ने प्राथमिकता बदल दी। मुख्यमंत्री ने अपना कार्यक्रम बदला और दिल्ली से सीधे रीवा पहुंच गए। यह निर्णय अपने आप में बहुत कुछ कहता है। संगठन की महत्वपूर्ण बैठक में मुख्यमंत्री की अनुपस्थिति की भरपाई दूसरे वरिष्ठ नेता कर सकते थे, लेकिन संकट में घिरे लोगों के बीच मुख्यमंत्री की मौजूदगी का कोई विकल्प नहीं था। यही वह क्षण था जब एक मुख्यमंत्री का प्रशासनिक दायित्व उसकी मानवीय संवेदना से जुड़ता दिखाई दिया।
और यह संवेदना केवल प्रभावित लोगों के बीच पहुंचने तक सीमित नहीं थी। बाढ़ की स्थिति की समीक्षा के दौरान अधिकारियों से राहत, बचाव, आश्रय, भोजन और चिकित्सा जैसी व्यवस्थाओं की जानकारी लेना इस बात का संदेश भी था कि संकट की घड़ी में प्रशासनिक मशीनरी की जवाबदेही सर्वोच्च है। मुख्यमंत्री का मैदान में होना अधिकारियों के लिए भी यह स्पष्ट संकेत था कि कागज पर बनी रिपोर्ट से ज्यादा महत्वपूर्ण जमीन पर दिखाई देने वाला परिणाम है।
यही वह बिंदु है जहां मोहन यादव की कार्यशैली को समझने का एक रास्ता दिखाई देता है—जनता के प्रति संवेदना और प्रशासन के प्रति अपेक्षित कठोरता, दोनों साथ-साथ।
लेकिन इस घटनाक्रम को मध्यप्रदेश की हाल की राजनीतिक पृष्ठभूमि से अलग करके भी नहीं देखा जा सकता। दतिया उपचुनाव के बाद पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात हुई। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदत्त शर्मा की प्रधानमंत्री मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से भेंट हुई। विधानसभा अध्यक्ष एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर की प्रधानमंत्री से मुलाकात और कैलाश विजयवर्गीय की अमित शाह से बातचीत ने प्रदेश की राजनीति में चर्चाओं को तेज कर दिया। इन मुलाकातों को जोड़कर नेतृत्व परिवर्तन और नए राजनीतिक समीकरणों तक की अटकलें लगने लगीं।
इसी दौरान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की तीन-चार दिल्ली यात्राएं हुईं, लेकिन प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्री से उनकी मुलाकात नहीं होने को लेकर भी तरह-तरह की व्याख्याएं सामने आईं। राजनीति में मुलाकातों का होना खबर बनता है तो मुलाकात न होना भी अपने आप में कहानी गढ़ने का आधार बन जाता है। लेकिन किसी मुलाकात के अभाव को नाराजगी का प्रमाण मान लेना उतना ही जल्दबाजी भरा है जितना किसी मुलाकात को किसी राजनीतिक परिवर्तन का संकेत मान लेना।
ऐसे माहौल में 29 अगस्त को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह से उनके निवास पर हुई मुलाकात स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है। मुख्यमंत्री ने मध्यप्रदेश की विकास एवं कल्याणकारी योजनाओं, सहकारिता क्षेत्र में किए जा रहे नवाचारों और उपलब्धियों तथा महत्वपूर्ण विकास कार्यों की जानकारी दी। प्रदेश की विकास यात्रा को और गति देने के लिए उन्होंने केंद्रीय नेतृत्व से मार्गदर्शन और सहयोग भी मांगा।
इस मुलाकात को किसी राजनीतिक अटकल का औपचारिक उत्तर मानना उचित नहीं होगा, लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि घटनाक्रम ने उन चर्चाओं को नए संदर्भ में देखने का अवसर दिया जिनमें मुख्यमंत्री और केंद्रीय नेतृत्व के बीच दूरी की बातें की जा रही थीं। संवाद हुआ, प्रदेश के विकास पर चर्चा हुई और मुख्यमंत्री ने केंद्रीय नेतृत्व के मार्गदर्शन को महत्व दिया।
मोहन यादव की कार्यशैली का एक दूसरा पक्ष नक्सलवाद के विरुद्ध मध्यप्रदेश की उपलब्धियों में भी दिखाई देता है। बालाघाट सहित नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा बलों की रणनीति, बेहतर समन्वय और हॉक फोर्स की प्रभावी भूमिका ने परिस्थितियों को बदलने में योगदान दिया है। इस अभियान को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर सराहा जाना केंद्र और राज्य के बीच सुरक्षा के मोर्चे पर बेहतर तालमेल का संकेत है।
यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि सुरक्षा और विकास एक-दूसरे के पूरक हैं। जहां भय कम होता है, वहां विकास की संभावनाएं बढ़ती हैं। मध्यप्रदेश को निवेश, उद्योग, तकनीक और रोजगार के नए अवसरों से जोड़ने की कोशिश इसी व्यापक सोच का हिस्सा है। मुख्यमंत्री के सामने चुनौती केवल सरकार चलाने की नहीं, बल्कि प्रदेश को बदलती अर्थव्यवस्था के अनुरूप आगे ले जाने की भी है।
इस पूरी तस्वीर में ओरछा की प्रदेश कार्यसमिति का प्रसंग भी महत्वपूर्ण है। संगठन भाजपा की ताकत है और मुख्यमंत्री का संगठन से जुड़ाव उसकी राजनीतिक कार्यशैली का अनिवार्य हिस्सा है। इसलिए एक ओर संकट के समय जनता के बीच पहुंचना और दूसरी ओर संगठन के महत्वपूर्ण कार्यक्रम में अपनी भूमिका निभाना—दोनों को साथ देखना होगा। यही समन्वय किसी भी राजनीतिक नेतृत्व को व्यापक बनाता है।
पिछले दिनों मध्यप्रदेश की राजनीति में मुलाकातों और उनके अर्थों को लेकर बहुत कुछ कहा गया। लेकिन राजनीति का अंतिम मूल्यांकन अटकलों से नहीं, घटनाओं और परिणामों से होता है। चित्रकूट में बाढ़ के बीच जनता के बीच खड़ा मुख्यमंत्री, अधिकारियों से जवाब मांगता प्रशासनिक मुखिया, ओरछा की संगठनात्मक बैठक से जुड़ा भाजपा नेता और दिल्ली में केंद्रीय नेतृत्व से मार्गदर्शन लेता मुख्यमंत्री—मोहन यादव की तस्वीर इन सभी रूपों को एक साथ समेटती है।
शायद नेतृत्व की सबसे बड़ी पहचान यही है कि वह सत्ता के केंद्र में रहकर भी अपने केंद्र को जनता से दूर न होने दे।
29 अगस्त का घटनाक्रम इसी अर्थ में उल्लेखनीय है। दिल्ली में केंद्रीय नेतृत्व से मुलाकात हुई, लेकिन उसके बाद मुख्यमंत्री की दिशा मध्यप्रदेश की ओर थी। संगठन का कार्यक्रम महत्वपूर्ण था, लेकिन बाढ़ से घिरे नागरिकों की चिंता उससे बड़ी थी। केंद्रीय नेतृत्व से मार्गदर्शन लेना जरूरी था, लेकिन प्रदेश की जनता के बीच पहुंचना उससे भी जरूरी था।
मुलाकात दिल्ली में थी, लेकिन मन मध्यप्रदेश में था।
(लेखक राजनैतिक विश्लेषक है)