प्रशासन का एक सिद्धांत है , इसमें जो दायित्व आपको सौंपे गए हैं , वे आपको ही निभाने होते हैं । चाहे जितने भी वरिष्ठ अधिकारी आपके ऊपर हों , वे केवल मशवरे और आदेशों के लिए होते हैं , फील्ड की मुश्किलों से तो आपको ही निज़ात पाना होगा । अभी हाल ही में रक्षा बंधन के पर्व के साथ ही हम उत्तर भारतीयों का श्रावण मास समाप्त हो गया है , इसी पवित्र मास में नागपंचमी का त्योहार आता है , और इस दिन महाकालेश्वर मंदिर का सबसे ऊपरी खण्ड साल भर में केवल एक बार चौबीस घण्टे के लिए खुलता है , जहाँ भगवान शिव नागचंद्रेश्वर के रूप में बिराजे हैं । आज इसी अवसर से जुड़ी एक पुरानी घटना याद आ रही है । बात बड़ी पुरानी है तब मैं उज्जैन तहसील के एसडीएम के साथ-साथ , महाकाल मंदिर में प्रशासक के दायित्व का निर्वहन भी किया करता था । मंदिर में प्रशासक के रूप में मुझे अपने कलेक्टर विनोद सेमवाल से पूरी छूट मिली हुई थी , यानी कोई भी विधिसम्मत कार्य हो मैं बेझिझक करता था । वक़्त बदला और कलेक्टर का तबादला हो गया , नए कलेक्टर के रूप में सीपी अरोरा ने पदभार ग्रहण कर लिया। अरोरा साहब फ़ौज से प्रशासन में आए थे और अब भी उनमें फ़ौजी प्रकृति का कड़कपन था । उनके उज्जैन पदस्थ होने के सप्ताह भर के अंदर ही नागपंचमी का त्यौहार आ गया। नागपंचमी में चूँकि एक दिन के लिए ही नागचंद्रेश्वर के पट खुला करते थे इसलिए तब भी दर्शनों के लिए भारी भीड़ उमड़ा करती थी । कलेक्टर श्री अरोरा ने त्यौहार के दो दिन पहले मुझे फ़ोन कर मंदिर पहुँचने को कहा ताकि मंदिर की व्यवस्थाएँ देखी जा सकें। मैं समय से मंदिर पहुँच गया और कुछ समय बाद कलेक्टर श्री अरोरा एसपी श्री डीएम अवस्थी के साथ मंदिर में पहुँच गए । चूँकि त्यौहार दो दिन बाद ही था , इसलिये सभी तैयारियाँ कर ली गईं थीं । मैंने दोनों अधिकारियों को मंदिर में पूरा भ्रमण करा कर सभी तैयारियों की जानकारी दी। कलेक्टर साहब ने प्रवेश और निर्गम के द्वार देखे और मुझसे बोले “ आपने जूता स्टैंड मंदिर के प्रवेश द्वार पर रखा है , जबकि निर्गम द्वार दूसरी ओर है , ऐसी स्थिति में लोगों को जूते वापस लेने नंगे पाँव वापस आना होगा , इसलिए बेहतर होगा कि निर्गम पर भी जूता स्टैंड बनाया जाये और लोगों के जूते प्रवेश द्वार से उठा का निर्गम पर उनके आने के पहले रखवा दिए जाएँ ताकि बिना कष्ट के लोगों को जूते मिल सकें “। मैंने अपना विरोध दर्ज किया कि यह लंबे समय से व्यवस्था है और लोग इसके अभ्यस्थ हैं , यदि नए सिरे से व्यवस्था बनाई गई तो बड़े भ्रम की स्थिति निर्मित हो जायेगी, क्योंकि मंदिर में जूता स्टैंड पर काम करने वाले इतने चतुर नहीं हैं कि वे इसे निर्बाध रूप से अंज़ाम दे सकें । बातचीत में कुछ गर्मागर्मी हो गई और अरोरा साहब नाराज़ हो बैठे और मुझसे कहने लगे “ आप उतना ही करो जितना मैं कह रहा हूँ “। एसपी साहब ने मुझे एक तरफ़ किया और समझाया कि ये कलेक्टर हैं , तुम्हारे बॉस , अभी जैसा कह रहे हैं कर दो , बाक़ी न सम्हले तो व्यवस्था पहले जैसी कर लेना । मैंने हामी तो भर दी पर मंदिर में पहली बार किसी ने मेरी राय से नाइत्तिफ़ाक़ी ज़ाहिर की थी तो मैं मन ही मन अप्रसन्न भी था । नागपंचमी का त्यौहार आ गया , रात भर की थकान के बाद दोपहर पश्चात जब भीड़ कुछ कम हुई तो मैं अपने कार्यालय में आकर बैठ गया । मंदिर में जूता स्टैंड की नई व्यवस्था शुरू होते ही ध्वस्त हो गई थी और बड़ी मशक्कत से उसे दुरुस्त किया गया था । इस बीच कलेक्टर साहब भी आ गए तो मैंने उनके लिए अपनी कुर्सी खाली की और बाहर आकर ऑफिस की सीढ़ियों पर बैठ गया , तभी मंदिर के कर्मचारी और दर्शनों के लिए लगे अन्य स्वयंसेवक मेरे पास आए और कहने लगे “ ऊपर नागचंद्रेश्वर के मंदिर में नीचे से कोई पुजारी अपने यजमान को लेकर आरती कराने ले गया सो महन्त जी नाराज हो गये हैं और पूजा के लिए जाने से मना कर रहे हैं “। महंत पूजा के लिए ना जाएं तो नागचंद्रेश्वर मंदिर में दर्शन बंद हो गए समझो , भीड़ बढ़ रही थी । मेरे मन में परसों का गुस्सा भरा था सो मैंने कहा जाओ अंदर कलेक्टर बैठे हैं उनसे ये समस्या बताओ वे ही समाधान करेंगे । मेरे सामने की भीड़ अंदर ऑफिस में कलेक्टर के पास चली गई । समस्या की जटिलता सुनते ही अरोरा साहब ने अपने जूते पहने और कर्मचारियों से कहा “जाकर प्रशासक को बताओ “ और मंदिर से बाहर चल दिये । मैं समझ गया कि अब मुझे ही ये समस्या हल करनी होगी । मैं महन्त जी के कक्ष में जाकर उनके समक्ष नीचे बैठ गया और उनसे निवेदन किया “ गुस्सा थूक दें , मंदिर में पूजा का समय हो रहा है और भीड़ बढ़ रही है “ । महन्त जी रिसाए हुए थे कहने लगे आप पुजारी पर क्या कार्यवाही करेंगे ? मैंने कहा अभी शो काज नोटिस जारी करता हूँ और गलती हुई तो दण्ड भी दूँगा पर अभी तो चलो । मंदिर का प्रशासक गादी के समक्ष बैठ निवेदन करे ये महन्त जी के लिए भी बड़ी बात थी , उनका गुस्सा पिघल गया और बगल में लगे पर्दे को हटा अंदर झाँक कर बोले पूजा की थाली लगाओ , प्रशासक की बात तो माननी ही पड़ेगी । मैंने हँस कर उनके चरण स्पर्श किए और बाहर आ गया , समस्या सुलझ चुकी थी और मैं भी जान गया था कि कोई भी आ जाए मंदिर की व्यवस्था तो प्रशासक को ही संभालनी होगी ।