आरटीआई के जवाब में जानकारी देने के बजाय आवेदन ही संबंधित शाखा को भेजा, आवेदक को मूल सवालों का नहीं मिला समाधान
एमपी धमाका
विदिशा। प्रदेश सरकार द्वारा पारदर्शी एवं जवाबदेह प्रशासन को प्राथमिकता देने और आमजन की समस्याओं के त्वरित निराकरण के लिए मुख्यमंत्री जनविश्वास अभियान चलाया जा रहा है। वहीं दूसरी ओर विदिशा कलेक्टर कार्यालय से सामने आया एक आरटीआई प्रकरण प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल खड़े कर रहा है। सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत मांगी गई जानकारी के मामले में आवेदक को अपेक्षित जानकारी उपलब्ध कराने के बजाय आवेदन को संबंधित शाखा को भेजे जाने की सूचना दी गई है।
मामला आवेदक द्वारा प्रस्तुत आरटीआई आवेदन से जुड़ा है। दस्तावेज के अनुसार आवेदन 13 जुलाई 2026 को प्रस्तुत किया गया था। इसके जवाब में कलेक्टर कार्यालय के लोक सूचना अधिकारी द्वारा 11 अगस्त 2026 को पत्र जारी किया गया। यह पत्र आवेदक को 17 अगस्त 2026 को प्राप्त हुआ।
जानकारी के बजाय आवेदन ही आगे भेज दिया
पत्र में लोक सूचना अधिकारी की ओर से बताया गया है कि आवेदक द्वारा चाही गई जानकारी संबंधित होने के कारण आवेदन पत्र की प्रति संबंधित शाखा को भेजी जा रही है। साथ ही संबंधित शाखा को आवेदन में मांगी गई जानकारी समयसीमा में निराकरण कर आवेदक को उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं।
यानी आवेदक ने जिस सूचना के लिए आरटीआई लगाई थी, उस सूचना का स्पष्ट एवं बिंदुवार उत्तर उसे नहीं मिला। इसके बजाय आवेदन को संबंधित शाखा तक पहुंचाने की प्रक्रिया ही पूरी की गई। ऐसे में सवाल यह है कि आरटीआई आवेदन के लगभग एक माह बाद भी आवेदक को वास्तविक जानकारी कब और किस अधिकारी से मिलेगी?
जवाब प्राप्ति में देरी ने भी खड़े किए सवाल
दस्तावेज पर दर्ज तारीख के अनुसार जवाब 11 अगस्त को जारी हुआ, जबकि आवेदक को यह पत्र 17 अगस्त को प्राप्त हुआ। इससे जवाब की वास्तविक प्राप्ति को लेकर भी सवाल उठते हैं। आरटीआई कानून में सूचना उपलब्ध कराने की निर्धारित समयसीमा को लेकर गंभीरता अपेक्षित है। यदि निर्धारित अवधि में मांगी गई सूचना उपलब्ध नहीं होती है तो आवेदक को अपील का अधिकार भी प्राप्त होता है।
मुख्यमंत्री जनविश्वास अभियान के बीच व्यवस्था की परीक्षा
सरकार का जोर इस समय प्रशासन को जनता के प्रति अधिक जवाबदेह और संवेदनशील बनाने पर है। ऐसे में कलेक्टर कार्यालय जैसे महत्वपूर्ण स्थान से जुड़े आरटीआई प्रकरण में यदि आवेदक को मूल जानकारी के बजाय 30 दिन बाद केवल आवेदन आगे भेजे जाने की सूचना मिलती है, तो यह प्रशासनिक पारदर्शिता की व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है।
सवाल सिर्फ एक आरटीआई आवेदन का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है जिसमें आम नागरिक शासन से जानकारी मांगता है और उसे निर्धारित प्रक्रिया के बजाय फाइलों के बीच घूमता आवेदन मिलता है। अब देखना यह होगा कि संबंधित शाखा आवेदक को मांगी गई जानकारी कब उपलब्ध कराती है और क्या प्रशासन इस पूरे मामले की जवाबदेही तय करता है।
एमपी धमाका की नजर:
मुख्यमंत्री जनविश्वास अभियान का उद्देश्य जनता की समस्याओं और शिकायतों का समाधान सुनिश्चित करना है। ऐसे में सूचना के अधिकार के मामलों में भी समयबद्ध, स्पष्ट और बिंदुवार जवाब प्रशासनिक पारदर्शिता की कसौटी होना चाहिए।