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7 साल में केवल 4 शिकायतों की जांच का खेल और प्रभावी कार्रवाई एक पर भी नहीं..!



फर्जी वैद्यों की शिकायतों पर जांच-दर-जांच का खेल, कार्रवाई के नाम पर चेतावनी, मामला बंद या जांच अधूरी...


विदिशा, एमपी धमाका

जिले में कथित फर्जी वैद्यों और बिना वैध योग्यता चिकित्सा करने वालों के खिलाफ शिकायतों पर आयुष विभाग की कार्रवाई का एक दस्तावेजी रिकॉर्ड सामने आया है। 25 अगस्त 2026 को जिला आयुष अधिकारी कार्यालय से जारी पत्र में वर्ष 2019 से अब तक प्राप्त शिकायतों और उन पर की गई जांच का ब्यौरा दिया गया है। दस्तावेज को देखने पर सवाल उठता है कि करीब सात साल के दौरान  केवल 4 शिकायतों की जांच हुई।
जांच दल भी बनते रहे, लेकिन किसी मामले में निर्णायक और प्रभावी कार्रवाई का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता।
दस्तावेज में शिकायतों के क्रमवार विवरण के अनुसार, मामलों में जांच दल गठित किए गए, निरीक्षण किए गए और प्रतिवेदन तैयार हुए। लेकिन कहीं पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने की बात सामने आई तो कहीं संबंधित व्यक्ति मौके पर नहीं मिला। जिला आयुष अधिकारी ने एक भी मामले में पुलिस कार्रवाई की अनुशंसा नहीं की जो कि आश्चर्य का विषय है?

2020 : योग्यता नहीं मिली, फिर भी मामला कार्रवाई तक नहीं पहुंचा

5 अगस्त 2020 की शिकायत में गंजबासौदा क्षेत्र में एक संस्था द्वारा अस्पताल के नाम से स्वास्थ्य सेवाएं संचालित किए जाने की शिकायत की जांच का उल्लेख है। दस्तावेज के अनुसार जांच में संबंधित व्यक्ति के पास आयुर्वेद चिकित्सा से संबंधित मान्य शैक्षणिक योग्यता नहीं मिली। उसके पास अन्य प्रकार का पंजीयन उपलब्ध होने का उल्लेख भी किया गया है।
जांच रिपोर्ट में इसे आयुर्वेद चिकित्सा के लिए वैधानिक नहीं माना गया और आवश्यक कार्रवाई के लिए प्रकरण आगे भेजने की बात कही गई। लेकिन कार्रवाई न होने से उक्त फर्जी अस्पताल आज भी संचालित हो रहा है।

2021 : तीन सदस्यीय टीम बनी, लेकिन वैद्य ही गायब

16 मार्च 2021 की शिकायत में वैद्य राहुल बाबा द्वारा कथित रूप से अनधिकृत चिकित्सा कार्य किए जाने का मामला सामने आया। तीन चिकित्सकों की जांच टीम बनाई गई। 19 और 22 मार्च को जांच के लिए टीम मौके पर पहुंची, लेकिन दस्तावेज के अनुसार शिविर बंद मिला और संबंधित वैद्य वहां मौजूद नहीं था।
नतीजा—जांच में ठोस निष्कर्ष नहीं निकल सका और प्रतिवेदन प्रस्तुत कर दिया गया।

2022 : जांच में ठोस साक्ष्य नहीं मिले, मामला बंद

2 अगस्त 2022 की शिकायत में एक कथित वैद्य के खिलाफ शिकायत की गई। तीन चिकित्सकों की टीम ने निरीक्षण कर प्रतिवेदन दिया। दस्तावेज के अनुसार जांच में शिकायत के समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य नहीं मिला।
इसके बाद संबंधित व्यक्ति को चेतावनी देकर प्रकरण को नस्तीबद्ध किए जाने की अनुशंसा की गई।

2024 : फिर वही कहानी, फिर जांच और फिर मामला खत्म

23 जुलाई 2024 की शिकायत में फर्जी वैद्य शेर सिंह तथा मेडिकल स्टोर संचालक के खिलाफ कथित धोखाधड़ी और लूटपाट से संबंधित शिकायत का उल्लेख है। तीन वरिष्ठ आयुर्वेद चिकित्सकों की टीम गठित की गई। दस्तावेज के अनुसार जांच में संबंधित कथित वैद्य और मेडिकल स्टोर संचालक के विरुद्ध ठोस साक्ष्य प्राप्त नहीं होने की बात कही गई और प्रकरण नस्तीबद्ध कर दिया गया।
शिकायतकर्ता ने इस कार्रवाई से असंतोष जताते हुए आरटीआई सहित अन्य माध्यमों से जानकारी मांगी और वरिष्ठ अधिकारियों के समक्ष भी शिकायतें प्रस्तुत कीं—ऐसा भी विभागीय पत्र में दर्ज है।
सवाल वही—जांच हुई, कार्रवाई कहां हुई?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर शिकायतें लगातार आती रहीं, जांच दल बनते रहे और प्रतिवेदन तैयार होते रहे, तो सात साल में प्रभावी कार्रवाई का परिणाम क्या निकला?
25 अगस्त 2026 के पत्र में जिला आयुष अधिकारी ने 12 दिसंबर 2019 से अब तक की निरीक्षण एवं प्राप्त शिकायतों की जांच रिपोर्ट आवश्यक कार्रवाई के लिए वरिष्ठ अधिकारी को भेजी है। अब यह दस्तावेज विभागीय कार्रवाई की पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े करता है।
शिकायत → जांच दल → निरीक्षण → प्रतिवेदन → पर्याप्त साक्ष्य नहीं → मामला बंद/आगे भेजा गया—क्या यही पूरी कार्रवाई बनकर रह गई?

एमपी धमाका का सवाल

यदि कोई व्यक्ति वास्तव में बिना वैध योग्यता आयुर्वेद चिकित्सा कर रहा था, तो उसके खिलाफ अंतिम वैधानिक कार्रवाई का रिकॉर्ड कहां है? और यदि शिकायतें गलत थीं, तो शिकायतों की जांच के बाद शिकायतकर्ताओं को स्पष्ट और अंतिम निष्कर्ष क्यों नहीं मिला? एक भी मामले में एफआईआर दर्ज क्यों नहीं कराई गई?

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