आनंद कुमार शर्मा, पूर्व आईएएस
इन दिनों पर्युषण पर्व चल रहे हैं , श्रमण परम्परा में विश्वास रखने वाले जैन धर्म के लोग इस पर्व पर अपनी श्रद्धा और क्षमता के अनुरूप उपवास रखते हैं । पर्व के समापन पर क्षमा माँगने का क्रम शुरू होता है ।अहिंसा पर विश्वास रखने वाले धर्मों में जैन धर्म दुनिया के सभी धर्मों से आगे है क्योंकि वे यह मानते हैं कि वाणी से भी हिंसा हो सकती है । जैन धर्म का सिद्धांत अनुरुप वे ये कभी नहीं कहते “कि ये ही सही है “ यानी अपनी बात को सही कहने का दंभ भी हिंसा ही है और इतिहास गवाह है , की महान वैज्ञानिकों की सिद्धांत भी भविष्य में नई जानकारी आने पर ग़लत सिद्ध हुए हैं इसलिए वे यह कहते है कि “मेरी राय में यह सही लगता है , “ यानी हो सकता है ग़लत भी हो और आप सही कह रहे हों । मित्रों की आती क्षमा याचनाओं के बीच मुझे मेरे एक मित्र के साथ गुज़रे वाक़ये की याद आ रही है, थोड़ी मजेदार है , सो आपको भी सुनाता हूँ । मेरे बैच मेट्स में एक जैन साहब हैं , वे पक्के धार्मिक आस्था वाले थे , और चित्त से भी एक दम सीधे सरल और ईमानदार । प्रोबेशन पीरियड में जब भी हमारा ग्रुप कहीं ट्रेनिंग पर बाहर जाता , रुकने की जगह पर वे सबसे पहले ये पता करते कि जैन मंदिर कहाँ है , और सुबह सुबह सबसे पहला काम उनका मंदिर जाने का ही होता । बात पुरानी है , विधान सभा के आम चुनाव के बीच उन साहब की और मेरी दोनों को ऑब्ज़र्वर ड्यूटी गोहाटी में लगी । मुझे गोहाटी देहात और उनको गोहाटी शहर मिला , सो मैं देहात के रेस्ट हाउस में और वे आईआईटी गोहाटी के गेस्ट हाउस में ठहरे हुए थे । मैंने सुन रखा था कि तब तक स्थापित आईआईटी संस्थानों में आईआईटी गोहाटी सबसे सुंदर कैंपस है , सो मेरे मन में उत्सुकता हुई कि देखा जाए कैंपस कैसा है और दोस्त के साथ कहीं लंच किया जाये । मैंने उन्हें फ़ोन किया तो वे बड़े प्रसन्न हुए , बोले बिलकुल ठीक है , तुम आ जाओ । अगले दिन इतवार था , छुट्टी का माहौल था , मैंने सुबह नाश्ता किया और आईआईटी कैंपस के लिए निकल गया । रंगिया , जहाँ मैं रुका था , वहाँ से गोहाटी का आईआईटी कैंपस पास ही था सो ग्यारह बजे तक पहुँच गया । जैन साब मिल कर प्रसन्न हुए , कहने लगे कहाँ खाने चलना है ? मैंने कहा यार यहाँ का तो रोज़ रोज़ खा रहे हैं , कहीं बाहर चलते हैं , वे बोले सही कह रहे हो और उन्होंने अपने लायजन अफ़सर को बुलाया जो अमूमन जिला स्तर का कोई होशियार अफसर होता है । लायजन अफसर आए तो उससे उन्होंने कहा कि कोई वेज रेस्टोरेंट ढूँढो , वेज यानी “प्योर वेज” , उस रेस्टोरेंट में नान वेज बनता ही न हो बस शुद्ध शाकाहारी भोजन मिलता हो । उस जमाने में गोहाटी में ऐसा रेस्टोरेंट मिलना मुश्किल ही था , पर ऑब्ज़र्वर साहब का हुकुम था , तो क़रीब एक घण्टे बाद लायजन अफ़सर लौट कर आया और उसने एक कागज का टुकड़ा आगे बढ़ाते हुए कहा सर पूरे गोहाटी शहर में तलाश कर ली है , बस यही दो रेस्टोरेंट हैं , जो शुद्ध शाकाहारी भोजन परोसते हैं । जैन साहब ने पर्चा हाथ में लिया और बोले इनमे से किसके पास जैन मंदिर पड़ेगा ? लायजन अफ़सर की शक्ल देखने लायक़ थी , उसने आधा घंटा और मशक्कत की और बोला सर जैन मंदिर तो इनमे से किसी के पास नहीं है । तब तक दोपहर के डेढ़ बज चुके थे, मैंने अनुरोध किया की खाना यहीं गेस्ट हाउस में खा लें क्योंकि ये तो इतने दिनों से आपको सात्विक भोजन ही करा रहे होंगे और मंदिर आप अलग से हो आना । जैन साहब बोले ये ठीक है , क्षमा करें आपको बाहर भोजन नहीं करा पाए , मैंने मुस्कुरा कर कहा कोई बात नहीं चलो खाना खाया जाए , और उस दिन हमने आईआईटी गोहाटी के गेस्ट हाऊस में ही खाना खाया । सबको पर्युषण पर्व की बधाइयाँ और उत्तम क्षमा।