(हेमंत खण्डेलवाल जी के 3 सितंबर को जन्मदिन पर विशेष)
कृष्णमोहन झा
राजनीति में जन्मदिन पर समर्थकों की भीड़, शुभकामनाओं के पोस्टर और शहर भर में लगे होर्डिंग किसी नेता की लोकप्रियता का सामान्य पैमाना माने जाते हैं। लेकिन मध्यप्रदेश भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खण्डेलवाल ने अपने जन्मदिन से पहले कार्यकर्ताओं से जो आग्रह किया है, वह इस स्थापित राजनीतिक परंपरा से अलग दिखाई देता है। उन्होंने 3 सितंबर को अपने जन्मदिन पर होर्डिंग, बैनर, विज्ञापन अथवा किसी भी प्रकार के कार्यक्रम आयोजित न करने की अपील करते हुए कहा है कि इसके बजाय संगठन के कार्यों को निष्ठापूर्वक आगे बढ़ाया जाए और जनसेवा में सहभागिता सुनिश्चित की जाए। उन्होंने कार्यकर्ताओं के स्नेह, विश्वास और सहयोग को ही अपना सबसे अमूल्य उपहार बताया है। किसी राजनीतिक नेता के व्यक्तित्व को समझने के लिए इससे बेहतर परिचय शायद ही कोई हो सकता है।
हेमंत खण्डेलवाल की राजनीति को समझने के लिए उनके वर्तमान पद से कहीं पीछे जाना होगा। राजनीतिक विरासत उन्हें अपने पिता स्वर्गीय विजय कुमार खण्डेलवाल से मिली, जो बैतूल से चार बार लोकसभा सदस्य रहे, लेकिन विरासत किसी को राजनीति में प्रवेश का अवसर तो दे सकती है, लंबे समय तक स्वीकार्यता नहीं। हेमंत खण्डेलवाल ने इस विरासत को संगठन की जमीन पर अपने श्रम और सक्रियता से आगे बढ़ाया। लोकसभा सदस्य बनने के बाद संगठन में जिलाध्यक्ष की जिम्मेदारी संभालना और फिर प्रदेश भाजपा के कोषाध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पद पर काम करना इस बात का संकेत था कि उनकी राजनीति केवल चुनाव जीतने तक सीमित नहीं थी।
2008 में लोकसभा उपचुनाव जीतकर संसद पहुंचने के बाद 2010 से 2013 तक भाजपा के बैतूल जिलाध्यक्ष के रूप में उन्होंने संगठन को करीब से समझा। 2013 में पहली बार विधानसभा पहुंचे और बाद में प्रदेश भाजपा के कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली। 2023 में दूसरी बार विधानसभा का चुनाव जीतने के बाद उनकी राजनीतिक यात्रा ने एक और महत्वपूर्ण मोड़ लिया और 2025 में उन्हें मध्यप्रदेश भाजपा की कमान सौंप दी गई। इस पूरे सफर में एक बात लगातार दिखाई देती है—पद बदलते रहे, लेकिन संगठन से उनका रिश्ता बना रहा।
शायद इसी वजह से उनके राजनीतिक व्यक्तित्व को केवल उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि से नहीं, बल्कि उनके काम करने के तरीके से समझना अधिक उचित होगा। वे उन नेताओं में माने जाते हैं जो सार्वजनिक बयानबाजी की अपेक्षा संगठनात्मक काम को अधिक महत्व देते हैं। विवादों से दूरी और जरूरतमंदों की सहायता के लिए तत्पर रहने की उनकी छवि ने भी उनके व्यक्तित्व को अलग पहचान दी है। यही कारण है कि उनके जन्मदिन की अपील को महज एक औपचारिक आग्रह मानना उनके व्यक्तित्व के साथ न्याय नहीं होगा। यह उस राजनीतिक सोच का विस्तार है जिसमें व्यक्तिगत प्रचार से अधिक संगठन और जनसेवा महत्वपूर्ण हैं।
हेमंत खण्डेलवाल के संगठनात्मक कौशल की सबसे बड़ी परीक्षा चुनावी मैदान में भी हुई है। 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्हें मध्यप्रदेश में पार्टी के प्रदेश संयोजक की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई थी। उस चुनाव में भाजपा ने मध्यप्रदेश की सभी 29 लोकसभा सीटों पर विजय हासिल कर नया राजनीतिक रिकॉर्ड बनाया। यह उपलब्धि केवल उम्मीदवारों या चुनावी लहर का परिणाम नहीं थी; इसके पीछे बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय रखने और विभिन्न स्तरों पर समन्वय स्थापित करने की भी बड़ी भूमिका थी। हेमंत खण्डेलवाल के लिए यह जिम्मेदारी इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि प्रदेश संगठन के चुनावी प्रबंधन की उनकी क्षमता पहली बार इतने बड़े पैमाने पर सामने आई।
प्रदेश भाजपा की कमान संभालने के बाद उनके सामने चुनौती और बड़ी हो गई। संगठन की जिम्मेदारी केवल चुनाव के समय सक्रिय होने से पूरी नहीं होती। उसे लगातार जीवंत रखना पड़ता है। सरकार और संगठन के बीच समन्वय बनाए रखना पड़ता है और कार्यकर्ताओं को यह भरोसा देना पड़ता है कि संगठन में उनकी भूमिका केवल चुनाव के समय नहीं, बल्कि हमेशा महत्वपूर्ण है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व वाली सरकार और प्रदेश संगठन के बीच बेहतर तालमेल की आवश्यकता को देखते हुए हेमंत खण्डेलवाल का दायित्व और महत्वपूर्ण हो जाता है।
प्रदेश अध्यक्ष के रूप में उनके कार्यकाल में राज्यसभा की तीनों सीटों पर भाजपा की जीत भी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में सामने आई। यह जीत उनके अध्यक्षीय कार्यकाल में संगठन के खाते में जुड़ी उपलब्धि है और इससे यह संकेत भी मिला कि प्रदेश भाजपा अपने राजनीतिक प्रभाव को बनाए रखने में सफल रही है। आने वाले समय में नगरीय निकायों से लेकर 2028 के विधानसभा और 2029 के लोकसभा चुनाव तक संगठन को तैयार करने की जिम्मेदारी भी उनके सामने होगी। इसलिए प्रदेश अध्यक्ष के रूप में उनकी असली परीक्षा केवल पद संभालने में नहीं, बल्कि उस संगठन को चुनावी परिणामों में बदलने में होगी।
लेकिन हेमंत खण्डेलवाल की राजनीति का एक दूसरा पक्ष भी है, जिसे उनके जन्मदिन की अपील और अधिक स्पष्ट करती है। राजनीति में व्यक्तिगत छवि का विस्तार आज सोशल मीडिया, होर्डिंग और प्रचार के माध्यम से तेजी से होता है। इसके विपरीत वे कार्यकर्ताओं से कह रहे हैं कि उनके जन्मदिन पर खर्च करने के बजाय संगठन के काम और जनसेवा में समय लगाएं। यह संदेश उस कार्यकर्ता संस्कृति की याद दिलाता है जिसमें नेता का सम्मान उसके नाम के पोस्टर से नहीं, उसके विचार और संगठन के प्रति प्रतिबद्धता से होता है।
यही उनके राजनीतिक सफर का सबसे दिलचस्प पक्ष है। उन्होंने सत्ता देखी, संगठन देखा, चुनाव प्रबंधन देखा और अब प्रदेश भाजपा के सबसे महत्वपूर्ण दायित्वों में से एक संभाल रहे हैं। लेकिन जन्मदिन पर भी उनकी प्राथमिकता अपने नाम का प्रचार नहीं, बल्कि संगठन और समाज के लिए काम करने की अपील है। यह विरोधाभास नहीं, बल्कि उनकी राजनीति की निरंतरता है।
हेमंत खण्डेलवाल के सामने अब अवसर भी बड़ा है और चुनौती भी। उन्हें अपने अनुभव को प्रदेश भाजपा की सामूहिक शक्ति में बदलना है। कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं को संगठन की कार्ययोजना से जोड़ना है और सरकार तथा संगठन के बीच उस समन्वय को मजबूत करना है जिसकी आवश्यकता किसी भी राजनीतिक दल के लिए हमेशा रहती है।
शायद इसीलिए हेमंत खण्डेलवाल की राजनीतिक यात्रा को केवल पदों और चुनावी जीत के आंकड़ों में नहीं बांधा जा सकता। उनके सफर में विरासत है, लेकिन उसके आगे अपना अर्जित अनुभव भी है; संगठन है, लेकिन उसके साथ चुनावी परिणाम भी हैं; पद है, लेकिन उसके साथ कार्यकर्ता बने रहने की मानसिकता भी है।
उनके जन्मदिन पर कार्यकर्ताओं से की गई अपील इसी पूरी यात्रा का सबसे संक्षिप्त परिचय है—प्रचार से दूर रहिए, संगठन से जुड़िए और जनसेवा में लगिए।
शायद यही कारण है कि हेमंत खण्डेलवाल की राजनीति को समझने के लिए उनका प्रचार देखना जरूरी नहीं,उनके परिणाम देखना पर्याप्त है।
हेमंत जी को जन्मदिन की अनंत शुभकामनाये भविष्य में भी वे इसी तरह प्रचार-प्रसार से दूर रहकर निरंतर अपने लक्ष्य में आगे बढ़ते रहे |
(लेखक राजनैतिक विश्लेषक है)