(आनंद कुमार शर्मा पूर्व आईएएस)
कल से गणपति घर घर विराजेंगे, और अगले दस दिवस सभी भक्त गण विघ्न विनाशक की सेवा-पूजा में रमे रहेंगे। आम जन में स्वातंत्र्य भाव और देश प्रेम के उद्देश्य से विस्तारित किया गया बाल गंगाधर तिलक का यह प्रयोग आज कितना सफल हो गया है , इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि शायद ही कोई घर ऐसा हो जहाँ गणपति बप्पा ना विराजते हों । आम जन में गणेश शायद इसलिए भी लोकप्रिय हैं कि बिना सिक्स पैक के मोटी मस्त शारीरिक संरचना के साथ वे हमारे जैसे हैं और उनकी आराधना सहज है , उसके लिए कठिन अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं है। उनसे कृपा की उम्मीद आप तब भी कर सकते जबकि आपके आराध्य कोई और हों।
देखिए सूरदास गणपति की अर्चना करते हैं , जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा , माता जिनकी पार्वती पिता महादेवा..और आख़िर में क्या माँगते हैं “ सूर श्याम शरण आये सफल कीजे सेवा “ । इसी तरह तुलसीदास जब लिखते हैं “ गाइये गणपति जगवन्दन , शंकर सुवन भवानी जी के नंदन “ तो आख़िर में क्या कहते हैं ? माँगत तुलसीदास कर जोरे, बसहु राम सिय मानस मोरे । तो ऐसे सहज सरल देवता भला किसको न भायेंगे ? प्रशासनिक और पुलिस के अधिकारियों के नौकरी में इन दिनों पाण्डालों की व्यवस्था और भीड़ नियंत्रण की ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है पर सबसे बड़ी समस्या होती है प्रतिमा के निर्बाध विसर्जन की । हर ज़िले में हम ख़बरों में पढ़ते हैं कि प्रतिमा विसर्जन के समय कुछ दुर्घटनाओं में हम अपने नवजवान साथियों को खो बैठते हैं , ये तो एक पहलू है , पर दूसरी ओर नदियों या तालाबों में विसर्जन से जल प्रदूषण की समस्या भी सामने आती है । मैंने पाया कि प्रशासन यदि सबको साथ लेकर कोशिश करे तो इन समस्याओं का भी हल है । जब मैं राजगढ़ में कलेक्टर था तो इस विषय में एक प्रयोग किया गया । मुख्यालय में एसडीएम के पद पर रामप्रकाश पदस्थ थे , जो बड़े उत्साही अधिकारी हैं । उन्होंने नगर पालिका के अमले के साथ मिल कर नेवज नदी के किनारे के एक कुण्ड बनवाया , उसमें जल नेवज का ही था , पर नदी से बाउंड्री बना कर उसे पृथक कर रखा था । जन भावनाओं को सहेजने का काम किया गया अख़बारों के माध्यम से , जिसमें भानू ठाकुर , सत्येन्द्र भारिल्ल , प्रकाश विजयवर्गीय जैसे नवजवान पत्रकारों ने बढ़चढ़ कर सहयोग किया । नतीज़ा सारी प्रतिमाएँ नदी में ना विसर्जित कर कुण्ड में सिरायी गईं और उस साल से इस प्रयोग के कारण नेवज का जल निर्मल बना रहा । इसी तरह जब मैं सागर में कमिश्नर था, तो रामप्रकाश तब सागर नगर निगम में आयुक्त हो चुके थे , और कमिश्नर होने के नाते शासन ने मुझे निगम का प्रशासक नियुक्त किया हुआ था । उस वर्ष बड़े तालाब में विसर्जित होने वाली प्रतिमाओं के लिए इसी तरह तालाब में एक खण्ड बनाया गया और प्रतिमाओं को विसर्जित करने के लिए एक क्रेन और एक जेसीबी मशीन लगाई गई । मैंने देखा तालाब के किनारे मण्डल वाले भक्त आते और प्रतिमाओं के विसर्जन पूर्व पूजन अर्चन की औपचारिकताएँ कर उसे निगम के अमले के हवाले कर देते फिर मशीनों के माध्यम से बिना इंसानों दख़ल के सीधे प्रतिमा विसर्जित कर दी जातीं । उस साल का रिकार्ड था प्रतिमा विसर्जन बिना दुर्घटना संपन्न हुआ।