अध्यक्ष के पत्र पर कार्रवाई जानने लगाई आरटीआई, जवाब नहीं मिला तो लगानी पड़ी प्रथम अपील; फिर आरटीआई पर आरटीआई—20 दिन बाद मिला ‘जानकारी निरंक’ का जवाब
जिला पंचायत अध्यक्ष के पत्र को भी नहीं मिली तवज्जो?
सीईओ से कार्रवाई की जानकारी मांगने पर सामने आया प्रशासनिक उदासीनता का मामला
विदिशा। जिला पंचायत विदिशा में कामकाज और जवाबदेही को लेकर एक ऐसा मामला सामने आया है, जो सरकारी व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। जिला पंचायत अध्यक्ष द्वारा मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) को लिखे गए पत्र पर क्या कार्यवाही हुई, इसकी जानकारी जानने के लिए सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत आवेदन लगाया गया। लेकिन समय पर जानकारी नहीं मिली। दोबारा आरटीआई दाखिल करना पड़ी हर जवाब नहीं मिला तो इसके बाद आवेदक को प्रथम अपील का सहारा लेना पड़ा। प्रथम अपील के बाद भी सूचना की राह आसान नहीं हुई और अंततः लोक सूचना अधिकारी का जवाब जारी होने के करीब 20 दिन बाद आवेदक के हाथों में पहुंचा।
मामला केवल सूचना मिलने में देरी तक सीमित नहीं है। उपलब्ध दस्तावेजों में लोक सूचना अधिकारी की ओर से कहा गया है कि संबंधित जानकारी के लिए शाखा से जानकारी चाही गई थी, लेकिन शाखा में जानकारी संधारित नहीं होने के कारण जानकारी निरंक है। यानी जिस पत्र पर कार्यवाही की स्थिति जानने के लिए आरटीआई लगाई गई, उसके संबंध में संबंधित शाखा में कोई सूचना उपलब्ध/संधारित नहीं होने की बात कही गई।
अध्यक्ष ने लिखा था सीईओ को पत्र
आरटीआई आवेदन में जिला पंचायत अध्यक्ष द्वारा जिला पंचायत विदिशा के सीईओ को लिखे गए पत्र का उल्लेख है। पत्र क्रमांक 76/26 दिनांक 09 फरवरी 2026 में जिला पंचायत के विषय चिकित्साविहीन औषधालय में चिकित्सकों की ड्यूटी लगाने के संबंध में कार्रवाई किए जाने का उल्लेख बताया गया है।
आवेदक ने आरटीआई के माध्यम से मूल रूप से यह जानना चाहा कि अध्यक्ष के पत्र पर क्या कार्रवाई की गई, संबंधित पत्र पर क्या निर्णय हुआ और कार्रवाई से संबंधित नस्ती/दस्तावेज उपलब्ध कराए जाएं।
लेकिन आरटीआई के जवाब में संबंधित शाखा से जानकारी उपलब्ध नहीं होने की बात सामने आई।
आरटीआई का जवाब भी ‘डाक की चाल’ से पहुंचा
मामले का एक और दिलचस्प पहलू यह है कि जिला पंचायत के लोक सूचना अधिकारी द्वारा जवाब 17 अगस्त 2026 को जारी किया गया, जबकि आवेदक के अनुसार यह पत्र उसे 7 सितंबर 2026 को प्राप्त हुआ। यानी जारी होने और प्राप्त होने के बीच करीब 20 दिन का अंतर रहा।
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब सूचना का अधिकार अधिनियम नागरिकों को समयबद्ध तरीके से सूचना उपलब्ध कराने की व्यवस्था करता है, तो सूचना देने वाला पत्र ही इतने लंबे अंतराल के बाद आवेदक तक क्यों पहुंचा?
जवाब नहीं मिला तो प्रथम अपील का सहारा
आरटीआई आवेदन पर अपेक्षित जानकारी नहीं मिलने के बाद आवेदक को प्रथम अपील दायर करनी पड़ी। प्रथम अपील में स्पष्ट रूप से संबंधित कार्रवाई की जानकारी उपलब्ध कराने का आग्रह किया गया।
दस्तावेज बताते हैं कि आवेदक ने आरटीआई की प्रक्रिया में पहले सूचना मांगी, फिर जवाब के इंतजार के बाद प्रथम अपील की और उसके बाद भी सूचना मिलने की प्रक्रिया बेहद धीमी रही।
यानी एक सामान्य सूचना प्राप्त करने के लिए—
आरटीआई → जवाब का इंतजार → फिर आरटीआई> प्रथम अपील → फिर जवाब → और जवाब भी देर से प्राप्त।
यह पूरा घटनाक्रम जिला पंचायत की सूचना व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल खड़े करता है।
सबसे बड़ा सवाल—अध्यक्ष के पत्र की जांच क्यों नहीं हुई?
कार्रवाई नहीं हुई, तो जिला पंचायत अध्यक्ष के पत्र को लंबित रखने का कारण क्या था?
‘जानकारी निरंक’ ने बढ़ाए सवाल
लोक सूचना अधिकारी के जवाब में यह कहना कि संबंधित शाखा में जानकारी संधारित नहीं होने के कारण जानकारी निरंक है, मामले को और गंभीर बनाता है।
जिला पंचायत की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवाल
यह मामला अब सिर्फ एक आरटीआई आवेदन का नहीं रह गया है। यह जिला पंचायत की जवाबदेही, पत्रों के निस्तारण, रिकॉर्ड संधारण और पारदर्शिता से जुड़ा सवाल बन गया है।
खास तौर पर तब, जब मामला जिला पंचायत अध्यक्ष द्वारा स्वयं सीईओ को लिखे गए पत्र पर हुई कार्रवाई से जुड़ा हो।
क्या सीईओ ने संबंधित अधिकारियों को कोई निर्देश दिए?
क्या जांच के लिए कोई समिति या अधिकारी नियुक्त हुआ?
क्या कार्रवाई की कोई नस्ती तैयार हुई?
अगर नहीं हुई तो अध्यक्ष के पत्र का क्या हुआ?
और अगर हुई तो आरटीआई में उसका रिकॉर्ड क्यों नहीं मिला?
इन सवालों के जवाब अब जिला पंचायत प्रशासन से अपेक्षित हैं।
आरटीआई पर आरटीआई लगाने की नौबत क्यों?
सूचना मांगना नागरिक का अधिकार है, लेकिन जब एक साधारण प्रशासनिक कार्रवाई की जानकारी हासिल करने के लिए नागरिक को बार-बार आवेदन, प्रथम अपील और फिर पत्राचार करना पड़े, तो यह व्यवस्था की कार्यकुशलता पर सवाल जरूर खड़ा करता है।
विदिशा जिला पंचायत में आखिर रिकॉर्ड और जवाबदेही का सिस्टम कौन संभाल रहा है?
अध्यक्ष के पत्रों पर कार्रवाई होती है या वे भी फाइलों के बीच दबकर रह जाते हैं?
इस मामले में जिला पंचायत प्रशासन की ओर से स्पष्ट जवाब सामने आना जरूरी है।