एक बोतल का नशा, कई परिवारों पर भारी—कहीं शराब मौत का कारण बन रही है तो कहीं प्रशासन की कार्रवाई के बाद भी अवैध कारोबार जारी
एमपी धमाका विशेष
शराब का कारोबार कानून के दायरे में हो तो उसके लिए लाइसेंस, गुणवत्ता की जांच और सरकारी निगरानी जैसी व्यवस्थाएं होती हैं। लेकिन जब यही शराब अवैध तरीके से बनाई और बेची जाने लगे, तो यह सिर्फ कानून-व्यवस्था का मामला नहीं रह जाता, बल्कि सीधे इंसानी जिंदगी के लिए खतरा बन जाता है।
मध्यप्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से समय-समय पर सामने आने वाली जहरीली शराब की घटनाएं इस खतरे की गंभीर तस्वीर दिखाती हैं। सागर में जहरीली शराब पीने से मौतों की घटना ने एक बार फिर सवाल खड़ा किया है कि आखिर अवैध शराब का नेटवर्क इतना मजबूत कैसे हो जाता है कि शिकायतों और घटनाओं के बावजूद लोगों तक शराब पहुंचती रहती है?
जहरीली शराब आखिर जान कैसे लेती है?
अवैध शराब बनाने वाले कई बार शराब में ऐसे रसायन या औद्योगिक अल्कोहल मिला देते हैं जो मानव शरीर के लिए बेहद खतरनाक होते हैं। विशेष रूप से मेथनॉल (मिथाइल अल्कोहल) शरीर में जाने पर गंभीर विषाक्तता पैदा कर सकता है।
इसके सेवन के बाद शुरुआत में नशे जैसे सामान्य लक्षण दिखाई दे सकते हैं, लेकिन कुछ घंटों बाद स्थिति तेजी से बिगड़ सकती है। आंखों की रोशनी प्रभावित होना, उल्टी, पेट दर्द, चक्कर, बेहोशी, सांस लेने में परेशानी और गंभीर स्थिति में मृत्यु तक हो सकती है।
यही वजह है कि अवैध शराब को केवल 'सस्ती शराब' समझना बेहद खतरनाक है।
सवाल सिर्फ शराब बेचने वालों पर नहीं
जब किसी इलाके में लंबे समय तक अवैध शराब बिकती है, तो सवाल केवल उस व्यक्ति पर नहीं उठता जो शराब बेच रहा है। सवाल यह भी है कि—
अवैध शराब वहां तक पहुंची कैसे?
शराब बनाने या बेचने वालों की जानकारी जिम्मेदार विभागों को क्यों नहीं हुई?
शिकायतों पर समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
शराब की अवैध बिक्री के पीछे कौन लोग हैं?
कार्रवाई केवल छोटे विक्रेताओं तक सीमित रही या पूरे नेटवर्क तक पहुंची?
घटना के बाद कार्रवाई होती है या पहले से निगरानी की व्यवस्था भी मजबूत है?
इन सवालों के जवाब इसलिए जरूरी हैं क्योंकि एक व्यक्ति को पकड़ लेने से अवैध शराब का कारोबार खत्म नहीं होता।
गरीब और ग्रामीण इलाकों पर सबसे ज्यादा असर
अवैध शराब का सबसे बड़ा खतरा उन लोगों के सामने होता है जो महंगी लाइसेंसी शराब खरीदने में सक्षम नहीं होते और सस्ती शराब के नाम पर अवैध शराब खरीद लेते हैं।
एक व्यक्ति की मौत केवल एक आंकड़ा नहीं होती। उसके पीछे पूरा परिवार होता है—बच्चे, पत्नी, बुजुर्ग माता-पिता और परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियां।
कई बार कमाने वाले व्यक्ति की मौत के बाद परिवार आर्थिक संकट में चला जाता है। यानी जहरीली शराब की एक घटना का असर अस्पताल से लेकर घर की रसोई तक पहुंचता है।
कार्रवाई घटना के बाद नहीं, पहले जरूरी
जहरीली शराब से होने वाली मौतों को रोकने का सबसे प्रभावी तरीका यह है कि प्रशासन और संबंधित विभाग घटना का इंतजार न करें।
अवैध शराब के संभावित ठिकानों की नियमित जांच, संदिग्ध सप्लाई चेन पर निगरानी, लाइसेंसी दुकानों की जांच, शिकायतों पर तत्काल कार्रवाई और अवैध शराब के स्रोत तक पहुंचना जरूरी है।
साथ ही स्थानीय लोगों को भी जागरूक करना होगा कि बिना लाइसेंस की शराब, संदिग्ध पैकिंग या अज्ञात स्रोत से मिलने वाली शराब जिंदगी के लिए खतरा हो सकती है।
मौत के बाद जांच से आगे बढ़ना होगा
हर जहरीली शराब कांड के बाद जांच बैठती है, गिरफ्तारियां होती हैं और जिम्मेदारों पर कार्रवाई की बात कही जाती है। लेकिन असली सफलता तब होगी जब ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति ही न हो।
अवैध शराब के खिलाफ अभियान का लक्ष्य सिर्फ कुछ बोतलें जब्त करना नहीं, बल्कि उस पूरे नेटवर्क को खत्म करना होना चाहिए जो जहरीली शराब को लोगों तक पहुंचाता है।
सबसे बड़ा सवाल
शराबबंदी हो या नियंत्रित बिक्री—बहस अपनी जगह है। लेकिन एक बात पर कोई विवाद नहीं हो सकता कि जहरीली शराब बेचकर किसी की जिंदगी से खिलवाड़ करने वालों के खिलाफ कठोर और प्रभावी कार्रवाई होनी चाहिए।
क्योंकि अवैध शराब का कारोबार सिर्फ कानून नहीं तोड़ता—
यह किसी परिवार का भविष्य, किसी बच्चे का सहारा और किसी घर की पूरी जिंदगी छीन सकता है।
एमपी धमाका की पड़ताल का सवाल
क्या प्रशासन अवैध शराब के सिर्फ विक्रेताओं तक पहुंचेगा, या उस पूरे नेटवर्क का पता लगाएगा जिसके जरिए जहरीली शराब गांव-मोहल्लों तक पहुंचती है?
यह सवाल कार्रवाई से ज्यादा—जवाबदेही का है।