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पद की गरिमा और मंत्री की छवि: एक अधिकारी का अनुभव, जिसने सिखाया रिश्तों और जिम्मेदारियों का असली अर्थ..!


आनंद कुमार शर्मा, पूर्व आईएएस 
बड़े पदों पर बैठने के बाद आदमी को अपने आसपास के लोगों पर बड़ा ध्यान रखना पड़ता है, क्योंकि जाने-अनजाने ना जाने उनमें से किसके आचरण से उसकी छवि को धूमिल होने का खतरा उत्पन्न हो जाए। बात पुरानी है, तब मैं मध्यप्रदेश के अनुसूचित जाति कल्याण विभाग में आयुक्त हुआ करता था। तभी चुनाव हुए और सत्ता परिवर्तन के बाद प्रदेश में कांग्रेस पार्टी की सरकार बन गई । विभाग के नए मन्त्री जी ने पदभार ग्रहण किया , तो विभाग के सभी वरिष्ठ अधिकारी उनसे औपचारिक मुलाक़ात के लिये गये । मुझे उनके चेम्बर में अपने स्कूल के दिनों का एक मित्र मिल गया और उसने मंत्री जी से मेरा यह कह के परिचय कराया कि ये भी जबलपुर के ही हैं । मंत्री जी जो जबलपुर विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति के जाने माने चेहरे थे , ये जान कर प्रसन्न हुए कि कॉलेज के दिनों में मैं भी छात्र राजनीति में सक्रिय था । उन के चेम्बर के बाहर उन्हें बधाई देने पहुंचे लोगों में से एक सज्जन ने मुझसे हाथ मिलाते हुए अपना परिचय दिया कि वे मंत्री जी के रिश्तेदार हैं । मैंने भी उनसे हाथ मिलाया और उनके चाहने पर अपना मोबाइल नंबर भी उनसे साझा कर लिया । अगले सप्ताह ही उनका फ़ोन मेरे मोबाइल पर आ गया कि वे मुझसे मुलाक़ात करना चाहते हैं । मैंने उन्हें अपने श्यामला हिल्स स्थित कार्यालय में आने को कह दिया । थोड़ी देर बाद ही वे मेरे चेम्बर में आ गए और औपचारिक अभिवादन के पश्चात मुझसे कहने लगे कि विभाग में किस मद में कितना बज़ट आया है , कितना खर्च हो गया और कितना बचा है इसकी जानकारी उन्हें दे दूँ । मैंने उनसे पूछा कि ये जानकारी उन्हें क्यों चाहिए तो वे कहने लगे मैं मंत्री जी के लिए ये जानकारी इकट्ठी कर रहा हूँ । मैंने उनसे कहा कि इसके लिए तो माननीय मंत्री जी के पीए को विभागीय प्रमुख सचिव को नोटशीट भेज देनी चाहिए , इससे सारी जानकारी विधिवत मिल जाएगी । मेरे इतना कहने पर उन्होंने सुर बदला कि ये सब वे अपनी जानकारी के लिए चाह रहे हैं और थोड़ा नाराज होकर कहने लगे क्या आम आदमी ये सब जानकारी नहीं ले सकता ? । मैंने कहा इसके लिए सूचना के अधिकार का जरिया आम आदमी को सुलभ है आप चाहो तो उसके तहत आवेदन दे सकते हो । वे और नाराज हुए और कहने लगे आप सहयोग नहीं कर रहे हो । मैंने उन्हें समझाने की चेष्टा की कि सरकारी कामकाज के तरीके अलग होते हैं और न जाने कैसे मेरे मुँह से निकल गया कि मंत्री जी ने नया नया पदभार सम्भाला है , और बड़े भले मानुष हैं , तो आप अपने इधर उधर के अनावश्यक कामों से उनकी छवि धूमिल न करो । बस फिर क्या था , वे भड़क कर मेरे कमरे से निकल गए और ना जाने मन्त्री जी को क्या उल्टा सीधा भरा कि दूसरे दिन सुबह ही मेरे जबलपुर वाले मित्र को फ़ोन आ गया कि यार तुमने किसी को कुछ कहा है क्या , मंत्री जी नाराज हो रहे हैं कि आप तो अपने मित्र की तारीफ़ करते थे पर वो तो मेरे बारे में उल्टा सीधा कहता फिरता है । मैं समझ गया कि ये आग उसी बंदे ने लगाई है , पर चूँकि मंत्री जी ने मुझसे सीधा तो कुछ कहा नहीं था सो मैंने भी अपनी सफ़ाई में उनसे कुछ न कहा । थोड़े ही दिनों में मेरे कामकाज को देखकर उनकी ग़लतफ़हमी स्वयं दूर हो गई और फिर एक अजब संयोग आया । हुआ यूँ कि कुछ महीनों बाद मेरा तबादला सागर सम्भाग में आयुक्त के पद पर हो गया और मेरे पदभार ग्रहण करने के एक सप्ताह के अंदर ही उन्हीं मंत्री जी का सागर प्रवास हुआ । चूँकि वे मेरे विभागीय मंत्री रह चुके थे , तो मैं और आईजी श्री सतीश सक्सेना उनसे सर्किट हाउस में औपचारिक मुलाकात के लिये पहुंचे । मंत्री जी हमें देखकर प्रसन्न हुए और हम दोनों से अलग से मिले । मुलाकात के बाद उन्होंने बाहर खड़े एक सज्जन को बुलाया और हमसे कहने लगे “ भाई ये मेरा ममेरा भाई है , और हमार रिश्ता सगे भाइयों से बढ़ कर है । इनकी समस्या ये है कि इनका पुश्तैनी मकान जो सत्तर सालों से इनका है और जिसकी रजिस्ट्री इनके पिता के नामपर है , से लगी हुई खुली भूमि को एक षड्यंत्रकारी बंदे ने जिसके पूर्वजों ने इनके पिता को जमीन बेची थी , किसी और को विक्रय कर दिया है , और उस पर नामांतरण भी तहसीलदार ने इन्हें बिना सूचना दिए कर दिया है । चूँकि जमीन इनकी है और इनका कब्जा भी है, तो अभी तो नहीं पर कोई आगे-पीछे इन्हें परेशान कर सकता है सो इनकी मदद करनी होगी । मैंने उन्हें सलाह दी की इनसे कहें ये आदेश की अपील एसडीओ राजस्व को कर दें , मैं निष्पक्ष पड़ताल के बाद उचित कार्यवाही करने के लिए कह दूँगा और आईजी साहब ये सुनिश्चित कर लेंगे की बलपूर्वक कोई बिना अधिकार इन्हें परेशान न कर पाये। मंत्री जी आश्वस्त हुए और कुछ ही महीनों बाद एसडीओ राजस्व की अदालत ने फैसले में तहसीलदार के आदेश को निरस्त कर दिया और रिकॉर्ड भी दुरुस्त कर दिया। मंत्री जी के वे ममेरे भाई बड़ी कृतज्ञता से मुझसे मिलने आये और शुक्रिया कहने लगे तो मैंने कहा मंत्री जी को बता देना कि आपको न्याय मिल गया है। इस घटना के कुछ दिनों बाद ही सागर से मेरा तबादला उज्जैन हो गया।

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