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डीएफओ के स्टेनो ने टूर डायरी देने से किया इनकार, बताए अजीबोगरीब तर्क..!


जनता के पैसों से मिलता है सरकारी अमले को वेतन-वाहन, फिर जनता को जानकारी देने से परहेज क्यों?

आरटीआई में मांगी थी डीएफओ की पदस्थापना से आवेदन निराकरण तक की टूर डायरी और वाहन लॉगबुक की प्रमाणित प्रतियां

विदिशा, एमपी धमाका 
वन विभाग में अधिकारियों के दौरे और सरकारी वाहनों के उपयोग से जुड़ी जानकारी मांगने पर सूचना के अधिकार के तहत एक ऐसा जवाब सामने आया है, जिसने पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। विदिशा वनमंडल के डीएफओ कार्यालय के स्टेनो शाखा प्रभारी ने आरटीआई आवेदन में मांगी गई टूर डायरी और वाहन लॉगबुक की जानकारी देने से इनकार कर दिया है।
आरटीआई के माध्यम से आवेदक ने वर्तमान जिला वनमंडलाधिकारी की पदस्थापना से लेकर आवेदन के निराकरण तक की टूर डायरी एवं वाहन लॉगबुक का अवलोकन तथा चिन्हित दस्तावेजों की प्रमाणित छायाप्रतियां मांगी थीं।

सुरक्षा का हवाला देकर रोकी जानकारी

30 सितंबर 2026 को जारी जवाब में कार्यालय की ओर से कहा गया कि मध्यप्रदेश राज्य सूचना आयोग के आदेश क्रमांक A-3524/22 दिनांक 17 जनवरी 2023 में वन अपराधों, आरोपियों और मुखबिरों से संबंधित जानकारी को अधिकारी की सुरक्षा से जोड़ते हुए सार्वजनिक नहीं करने की बात कही गई है।
पत्र में यह भी तर्क दिया गया कि सरकारी वाहनों की लॉगबुक सार्वजनिक करने से अवैध उत्खनन, अवैध कटाई एवं अतिक्रमण के विरुद्ध की जा रही कार्यवाही पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है और वन अपराधियों तक संवेदनशील जानकारी पहुंच सकती है।

सवाल यह कि पूरी टूर डायरी में आखिर ऐसी कौन-सी गुप्त जानकारी?

आरटीआई जवाब का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि आवेदक ने अधिकारियों की सुरक्षा से जुड़ी किसी संवेदनशील सूचना की मांग नहीं की थी, बल्कि टूर डायरी और सरकारी वाहन की लॉगबुक का रिकॉर्ड मांगा था।
पत्र में कहा गया है कि टूर डायरी और वाहन लॉगबुक में वन निरीक्षण से संबंधित अत्यंत संवेदनशील जानकारी दर्ज होती है। साथ ही सूचना के सार्वजनिक होने से वन अपराधों में शामिल असामाजिक तत्वों को विभाग की कार्यप्रणाली तथा अधिकारियों की गतिविधियों की जानकारी मिल सकती है।
लेकिन अब बड़ा सवाल यह है कि सरकारी अधिकारी कब और कहां शासकीय वाहन से दौरे पर गए, इसका रिकॉर्ड भी क्या पूरी तरह गोपनीय माना जाएगा?

धारा 8(1)(g) का हवाला

जवाब में सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 8(1)(g) का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि ऐसी सूचना, जिसके प्रकटन से किसी व्यक्ति के जीवन या शारीरिक सुरक्षा को खतरा हो अथवा विधि प्रवर्तन या सुरक्षा प्रयोजन के लिए विश्वास में दी गई सूचना का स्रोत उजागर होता हो, उसे देने से छूट प्राप्त है।
इसी आधार पर मांगी गई जानकारी उपलब्ध नहीं कराने की बात कही गई है। पत्र के अंत में यह भी उल्लेख है कि “इस शाखा से संबंधित कुल पृष्ठ संख्या निरंक है।”

जनता के पैसे से चलने वाले सिस्टम में पारदर्शिता कितनी?

वन विभाग के अधिकारियों को मिलने वाला वेतन, सरकारी वाहन, ईंधन और अन्य सुविधाएं आखिरकार सरकारी बजट से आती हैं। ऐसे में सरकारी कामकाज से संबंधित रिकॉर्ड को लेकर पारदर्शिता और जवाबदेही का सवाल स्वाभाविक है।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां सवाल केवल एक आरटीआई आवेदन का नहीं, बल्कि यह तय करने का है कि सरकारी अधिकारियों की आधिकारिक यात्रा और सरकारी वाहन के उपयोग का कितना हिस्सा सार्वजनिक रिकॉर्ड माना जा सकता है और किस हिस्से को सुरक्षा कारणों से रोका जा सकता है।

अब उठेंगे कई सवाल

क्या पूरी टूर डायरी को धारा 8(1)(g) के तहत रोकना उचित है?
क्या संवेदनशील अंश हटाकर बाकी रिकॉर्ड उपलब्ध कराया जा सकता था?
सरकारी वाहन की लॉगबुक में दर्ज सामान्य प्रशासनिक विवरण को भी सुरक्षा संबंधी सूचना माना जाएगा?
क्या विभाग इस जानकारी के लिए कोई वैकल्पिक पारदर्शी व्यवस्था उपलब्ध कराता है?
और सबसे अहम—जनता के पैसे से संचालित सरकारी व्यवस्था में जवाबदेही की सीमा आखिर कहां तक है?
आरटीआई में मांगी गई जानकारी पर वन विभाग द्वारा दिया गया यह जवाब अब पारदर्शिता बनाम सुरक्षा के अधिकार के बीच संतुलन का विषय बन गया है। मामले में प्रथम अपील या सूचना आयोग के समक्ष आगे की कार्यवाही होने पर यह स्पष्ट हो सकेगा कि मांगी गई सूचना का कौन-सा हिस्सा वास्तव में अपवाद के दायरे में आता है और कौन-सा रिकॉर्ड सार्वजनिक किया जा सकता है।

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