आनंद कुमार शर्मा पूर्व आईएएस
सरकारी नौकरी में रहते हुए विदेश यात्रा करना आसान नहीं होता , यदि प्रवास सरकारी है तो आप परिवार साथ नहीं ले जा सकते और बिना जीवनसाथी के विदेश भ्रमण का क्या मज़ा ? यदि यात्रा निजी है और परिवार के साथ जाना है , तो अव्वल तो इतनी छुट्टी ही नहीं मिलेगी , और मिल भी जावे तो अनुमति में ढेरों पेंच । इसी वजह से रिटायर होने के बाद ही मैंने हमख़याल और पारिवारिक परस्पर घुले मिले साथियों का एक समूह बनाया जो विदेश के रोमांच का मज़ा साथ साथ लेना चाहते थे । यात्रा से लौटने के बाद जो एक विशेष बात हमने महसूस की , वे ये थी कि यात्रा के रोमांच का सबसे ज़्यादा लुत्फ हमारी जीवनसंगनियों ने उठाया , यात्रा में एक साथ रहने में जो चर्चाओं का दौर था , एक दूसरे के सहयोग और सुख दुख की ख़बरें साझा करने का जो अनुभव था , उससे वे सब ऐसा रिचार्ज हो जातीं कि देख कर लगता ही नहीं था के ये भाभियाँ वही हैं जो यात्रा आरम्भ होने के पहले थीं । आस्ट्रेलिया की यात्रा के दौरान जब हम फेरी से ग्रीन आइलैंड के लिए जा रहे थे , जो अपने जीवाश्मों के लिए प्रसिद्ध है तो एक जोड़ा जो देखने में हिंदुस्तानी लग रहा था , हमारे पास आया और बातचीत करने लगा । उन्होंने बताया कि वे दोनों भारतीय राजस्व सेवा के अधिकारी थे , उनमें जो महिला थीं , वे मुंबई में कमिश्नर इनकम टैक्स रह चुकीं थीं । बातों बातों में कहने लगे कि वे दोनों ही घूमने निकले हैं पर हमें देख कर ईर्ष्या हो रही है , कि ये कैसे एकसाथ मज़े कर रहे हैं , और वे तो एक साथ फोटो भी नहीं खींचा पाते, मियाँ पहले बीबी की फोटो खींचता है , फिर बीबी मियाँ की , आख़िर किससे कहें के हमारे जोड़े की फोटो ले लो और किसी को फ़ोन दें और वो भाग जाए तो दौड़ के पकड़ भी न पायें । हम सब इस परिहास पर खूब हँसे , और फिर उस समुद्री बीच की यात्रा में वे हमारे आसपास ही रहे , बेशक उनकी कई फोटो हमने खींचीं और एक बात जान गए कि साथियों के ग्रुप में यात्रा का जो आनंद है वो अकेले जोड़े से निकल जाने में नहीं है ।
कुछ दिलचस्प यादें भी हैं , साउथ अफ़्रीका की यात्रा में हमारा पहला पड़ाव था केप टाउन था , जो वहाँ की राजधानी भी है । केपटाउन जाने के लिए हम कतर एयरवेज से यात्रा कर रहे थे और दोहा में हमारा ट्रान्सफर था , यानी यहाँ हवाईजहाज बदलना था । दोहा का हवाई अड्डा तो कोई विशालकाय मेले की तरह था , हम अपना मुंबई , दिल्ली भूल उसकी विशालता को निहारते रहे और अपने गंतव्य तक पहुँचने में ये भूल बैठे कि सब साथ हैं या नहीं ? जब ये ध्यान किया कि बस हवाई जहाज़ के गेट के पास आ पहुँचे हैं तो याद आया , उमा भाभी यानी बीएम शर्मा साहब की धर्मपत्नी तो हमारे साथ हैं ही नहीं । बीएम दादा ये सोच कर आगे बढ़ आए कि वे महिलाओं के ग्रुप में होंगी पर वे तो साथ थीं ही नहीं । हमारे हाथ पांव फूल गए , भाभी के पास मोबाइल फ़ोन था तो सही पर उसकी सिम एक्टिवेट नहीं थी , वो तो केपटाउन पहुँचने पर होती और ये तो मध्य स्थान था । दोहा का हवाई अड्डा मीलों में फैला था , कुछ सूझ ही न पड़े कि कहाँ दौड़ पड़ें , और तभी भाभी जी सामने से आती दिखाई दीं , आते ही उन्होंने बीएम दादा को उलाहना दिया , देखते नहीं हो , ध्यान देना था ना ? हमने चैन की सांस ली और पूछा भाभी आप यहाँ तक पहुँची कैसे , वे सहज भाव से बोलीं , अरे अपने साथ हवाई जहाज के कुछ यात्री यहाँ आ रहे थे तो देखते देखते चली आयीं । हम सबने क़सम खाईं की अब सभी एक दूसरे की गिनती किए बिना पग न धरेंगे । साउथ अफ़्रीका को यात्रा बड़ी रोमांचकारी और दिलकश रही , वहीं हमने बब्बर शेरों के साथ घूमते हुए फोटो खिंचवाईं । लौटने के समय तक हम जोहानसबर्ग तक आ गए थे , और वापसी की फ्लाइट वहीं से थी । आप लोग शायद जानते ही होगे कि अंतर्राष्ट्रीय उड़ानों में हवाई अड्डे पर तीन घण्टे से पहले पहुँचना पड़ता है , और हाँ ये सुविधा भी है कि भारत के बाहर इन हवाई अड्डों पर फ़्री इंटरनेट की सुविधा चार घण्टे के लिए मिल जाती है । मेरी कुशलता इन गैजेट्स को लेकर कुछ अच्छी है तो सामान्यतः मित्र गणों और ख़ास कर भाभी लोगों के फ़ोन को होटलों में इंटरनेट से कनेक्ट करनी की ज़िम्मेदारी मेरी रहती थी , सो हम जब जोहानसबर्ग हवाई अड्डे पर पहुँचे तो चेक इन करने के समय मैंने हमारी एक भाभी से कहा लाइये भाभी आपके फ़ोन पर फ्री वाईफाई कर दूँ। उन्होंने पहले पूछा “ भैया कितना समय है अभी ? “ मैंने कहा बहुत है , अभी तो ढाई घण्टे हैं , वे बोलीं “ तो फिर रहने दो इतना समय तो हम बातें ही कर लेंगी । “ मुझे तब समझ आया कि चाहे अम्बानी के जिओ से या एलन मस्क के स्टार लिंक स्पेस एक्स के डेटा से मिलने वाला मनोरंजन हो , महिलाओं के गप्प करने से मिलने वाले लुत्फ़ के आगे ये कहीं नहीं लगते ।