पहले जानकारी देने से इनकार, फिर प्रथम अपील में तारीखों का खेल और आखिर में अपील खारिज; 15 दिन बाद मिला आदेश
आरटीआई पंजी को बताया व्यक्तिगत जानकारी, धारा 8(1)(ज) का हवाला देकर जनवरी 2014 से अब तक का रिकॉर्ड देने से इनकार
दीपक तिवारी, विदिशा
सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया था, लेकिन विदिशा जिला पंचायत में इस कानून के क्रियान्वयन को लेकर सामने आए दो मामलों ने पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां एक ओर जनवरी 2014 से अब तक की आरटीआई पंजी मांगने पर लोक सूचना अधिकारी ने उसे व्यक्तिगत जानकारी बताकर देने से इनकार कर दिया, तो दूसरी ओर इसी सूचना संबंधी विवाद में प्रथम अपील के दौरान आवेदक को बार-बार तारीखें मिलीं और अंततः अपील निरस्त कर दी गई। हैरानी की बात यह भी है कि 19 अक्टूबर 2026 को पारित आदेश की प्रति आवेदक को करीब 15 दिन बाद प्राप्त हुई। अब आवेदक ने इस पूरे मामले को मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयोग के समक्ष द्वितीय अपील में चुनौती देने की तैयारी शुरू कर दी है।
आरटीआई पंजी भी हो गई व्यक्तिगत जानकारी!
आवेदक ने जिला पंचायत से जनवरी 2014 से आवेदन के निराकरण तक की आरटीआई पंजी उपलब्ध कराने की मांग की थी। लेकिन जिला पंचायत के लोक सूचना अधिकारी ने 3 नवंबर को जारी पत्र में सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8(1)(ज) का हवाला देते हुए जानकारी देने से इनकार कर दिया। तर्क दिया गया कि मांगी गई जानकारी व्यक्तिगत सूचना है और उसका लोक क्रियाकलाप अथवा लोकहित से संबंध नहीं है।
अब सवाल यह है कि सरकारी कार्यालय में प्राप्त आरटीआई आवेदनों, उनके निराकरण और प्रशासनिक कार्यवाही का रिकॉर्ड आखिर किस आधार पर पूरी तरह व्यक्तिगत जानकारी की श्रेणी में रखा जा सकता है? यदि पंजी में किसी व्यक्ति की निजी या संवेदनशील जानकारी है, तो क्या धारा 10 के तहत ऐसे अंश हटाकर शेष रिकॉर्ड उपलब्ध कराने की संभावना पर विचार नहीं किया जा सकता था?
पहले तारीखों का खेल, फिर प्रथम अपील खारिज!
एक अन्य मामले में
जानकारी नहीं मिलने पर आवेदक ने प्रथम अपील प्रस्तुत की। जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी एवं प्रथम अपीलीय अधिकारी के समक्ष पहुंचे इस मामले में 28 सितंबर, 12 अक्टूबर और 19 अक्टूबर 2026 को सुनवाई की तारीखें निर्धारित की गईं। आखिरकार 19 अक्टूबर को प्रथम अपील प्रकरण निरस्त कर दिया गया।
आदेश में लोक सूचना अधिकारी के लिखित कथन का उल्लेख करते हुए कहा गया कि चाही गई जानकारी कार्यालय में संधारित नहीं है। इसी आधार पर अपील निरस्त कर दी गई।
लेकिन आवेदक का सवाल है कि जब विवाद का मूल विषय ही मांगी गई जानकारी की उपलब्धता और उसके संधारित होने से जुड़ा था, तो आदेश में इस पर विस्तृत विवेचना कहां है? क्या केवल लोक सूचना अधिकारी के कथन को आधार बनाकर अपील निरस्त करना पर्याप्त था? यदि रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है तो उसके कारणों और संबंधित अभिलेखों की स्थिति की पड़ताल क्यों नहीं की गई?
15 दिन बाद मिला आदेश, द्वितीय अपील का भी उल्लेख नहीं!
आवेदक का आरोप है कि 19 अक्टूबर को आदेश पारित होने के बावजूद उसकी प्रति करीब 15 दिन बाद उपलब्ध कराई गई। इतना ही नहीं, आदेश में द्वितीय अपील के अधिकार और आगे की प्रक्रिया का स्पष्ट उल्लेख भी नहीं किया गया।
सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 19(6) के अनुसार प्रथम अपील का निराकरण 30 दिनों में किया जाना चाहिए। विशेष परिस्थितियों में लिखित कारण दर्ज कर अधिकतम 45 दिनों में निर्णय दिया जा सकता है। वहीं धारा 19(3) के तहत प्रथम अपील के निर्णय के विरुद्ध 90 दिनों के भीतर संबंधित राज्य सूचना आयोग में द्वितीय अपील की जा सकती है।
अब उठेंगे जवाबदेही और पारदर्शिता के सवाल
दोनों घटनाओं को साथ रखकर देखें तो सवाल सिर्फ एक आरटीआई आवेदन का नहीं रह जाता, बल्कि जिला पंचायत में सूचना के अधिकार के प्रति अपनाए जा रहे रवैये का बन जाता है। एक तरफ आरटीआई पंजी को व्यक्तिगत जानकारी बताकर रोकने का निर्णय और दूसरी तरफ प्रथम अपील में तारीखों के बाद अपील निरस्त करने की कार्रवाई, दोनों ही अब सवालों के घेरे में हैं।
आवेदक का कहना है कि वह प्रथम अपीलीय आदेश को मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयोग में चुनौती देंगे। द्वितीय अपील में आरटीआई पंजी उपलब्ध नहीं कराने, लोक सूचना अधिकारी के तर्क, अपील की सुनवाई की प्रक्रिया, आदेश की विषय-वस्तु और आदेश की प्रति मिलने में हुई देरी जैसे मुद्दे उठाए जाएंगे।
एमपी धमाका की पड़ताल : कानून जनता के लिए है या फाइलों में बंद रखने के लिए?
सूचना का अधिकार कोई अधिकारियों की कृपा से मिलने वाली सुविधा नहीं, बल्कि नागरिकों का कानूनी अधिकार है। सरकारी कार्यालयों में आरटीआई से जुड़े अभिलेखों को लेकर पारदर्शिता के बजाय निजता का हवाला देकर जानकारी रोकने और अपील प्रक्रिया में आवेदकों को राहत नहीं मिलने जैसी परिस्थितियां निश्चित रूप से गंभीर सवाल खड़े करती हैं।
अब जिला पंचायत विदिशा के जिम्मेदार अधिकारियों से सवाल है कि आरटीआई पंजी को व्यक्तिगत जानकारी मानने का ठोस कानूनी आधार क्या है? प्रथम अपील में उठाए गए मूल सवालों का समुचित परीक्षण क्यों नहीं हुआ? आदेश की प्रति देने में करीब 15 दिन क्यों लगे?
कानून में समय-सीमा तय है, अधिकार भी तय हैं और जवाबदेही भी। ऐसे में सवाल यही है कि क्या सरकारी कार्यालयों में नियम-कायदों का पालन होगा या सूचना मांगने वाले नागरिकों को तारीखों और आदेशों के बीच ही उलझाकर रखा जाएगा?
एमपी धमाका इस पूरे मामले पर नजर बनाए हुए है।